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राजनीतिक नेतृत्व कहां है?

 शेखर गुप्ता

पिछले दो सप्ताह से मेरे पास पाकिस्तानी टीवी चैनलों से कई फोन आए। वे सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर के उस बयान पर मेरी टिप्पणी चाहते थे, जिसे वे ‘उकसाने वाला’ बयान कहते हैं। मैंने सभी को बहुत ही कम शब्दों में एक ही जवाब दिया : एक सेमी-एकेडेमिक चर्चा के दौरान यह एक भारतीय जनरल का व्यक्तिगत विचार है। समस्या यह है कि आप पाकिस्तानी के तौर पर एक जनरल को सुन रहे हैं। आप भूल गए हैं कि वे भारतीय जनरल हैं, पाकिस्तानी नहीं। 
जटिलता इस बात में है कि हम अपने सैन्य अफसरों को उतनी गंभीरता से नहीं लेते हैं, जितनी गंभीरता के साथ पाकिस्तानी लेते हैं क्योंकि व्यापक रणनीतिक नीतियों पर हमारे अफसरों का कोई नियंत्रण नहीं होता है। लेकिन वहीं दूसरी ओर हम अपने सैन्य अफसरों को कहीं अधिक सम्मान देते हैं, उनसे कहीं अधिक प्यार करते हैं और ऐसा करने की एक वजह यह है कि हमें उनके किसी संविधानेतर गतिविधियों में शामिल होने या कोई अन्य हरकत करने की आशंका नहीं रहती है। 
यही कारण है कि इस पर भारत और उसकी सेनाएं गर्व करती हैं। इसीलिए पत्रकारों से भरे सभाकक्ष में सेना प्रमुख द्वारा सैन्य अथवा रणनीति के बारे में बहुत अधिक बात न करके घोटाले के बारे में बातचीत करना दुर्भाग्यपूर्ण था। यह और भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी था क्योंकि ऐसा सेना दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित प्रेस वार्ता में हुआ था और सुबह भारत सेना में उच्च स्तर पर हुए भूमि ‘घोटाले’की सुर्खियों के साथ जागा। 
सिलीगुड़ी के पास सुकना कैंटोनमेंट में हुए तथाकथित भूमि घोटाले के बारे में मेरी जानकारी इतनी कम है कि मैं उस पर कोई राय जाहिर नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी बगैर किसी संकोच के साथ कह सकता हूं कि हमारी व्यवस्था (सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व) द्वारा इस मामले को स्पष्ट करने में देरी से हमारे सबसे बेहतरीन राष्ट्रीय संस्थान (सेना) का नाम बदनाम हुआ है। 
हम यह कभी नहीं चाहते हैं कि हमारे सैन्य अधिकारी रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दें, फिर चाहे वे शत्रुओं का सामना कर रहे हों या मीडिया का। लेकिन ऐसा तो वर्षो से होता आ रहा है। पिछली बार कब हमने एक जनरल को व्यापक रणनीति या सेना के आधुनिकीकरण की बात करते हुए अथवा सेना का विजन प्रकट करते हुए सुना? ऐसा 80 के दशक के मध्य में तभी हुआ था, जब जनरल सुंदरजी ने सेना की कमान संभाली थी और यह सुखद संयोग ही था कि उस समय नौसेना की कमान एडमिरल ताहिलियानी के हाथों में थी। 
उस वक्त वायुसेना में 1965 से 1971 के दौरान के कई दिग्गज योद्धा उच्च पदों पर विराजमान थे। इन तीनों सेनाओं ने मिलकर नई अस्त्र प्रणालियां पेश कीं, नए सिद्धांत लिखे और आत्मविश्वास व नैतिक बल जगाया। इससे भी ज्यादा वे जोश, साहस और उत्साह का बोध पैदा करने में सफल रहे जिससे कई प्रतिभाशाली युवा सेना में शामिल होने को प्रेरित हुए। 
हाल के वर्षो में सेना के उच्च अधिकारी सार्वजनिक रूप से वेतन आयोगों में उनके साथ हुए अन्यायों के बारे में शिकायत करते हुए (ये शिकायतें न्यायसंगत भी थीं) अथवा असैन्य संबंधी बेकार की बातों में या अब भूमि घोटालों की बात करते हुए दिखाई दिए हैं। मैंने पिछली बार जिस एक भारतीय सैनिक को सैनिकों जैसी बात करते हुए सुना था, वे जनरल पद्मनाभन थे जिन्होंने ऑपरेशन पराक्रम के दौरान तनाव के चरम पर पहुंचने के समय मीडिया से बात की थी। 
यदि बीते दो दशकों के दौरान सेनाएं भी अन्य सरकारी विभागों की तरह ही दिखाई देने लगी हैं तो इसके लिए स्वयं सेना का नेतृत्व, उन्हें ‘नियंत्रित’ करने वाले सिविल अफसर और उनका नेतृत्व करने वाले नेता जिम्मेदार हैं। वेतन आयोग से संबंधित शिकायतों को न तो चरम पर पहुंचने देना चाहिए था और न ही राजनीतिक नेतृत्व को उस समय तक का इंतजार करना चाहिए था कि वरिष्ठ अधिकारी (तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल सुरीश मेहता की अगुवाई में) सार्वजनिक रूप से इसका प्रदर्शन करने लगें।
सवाल यह है कि आखिर राजनीतिक नेतृत्व ऐसा क्यों होने देना चाहता है? हम अपनी नौकरशाही शैली के बर्ताव से अपने सैनिकों को इतना उद्वेलित कर देते हैं कि वे अपनी शिकायतों को उसी तरह से सार्वजनिक करने को विवश हो जाते हैं, जैसा कि समाज के अन्य पीड़ित वर्ग करते हैं। सुकना ‘घोटाले’ को लेकर भी यही हो रहा है। 
इस स्थिति में रक्षा मंत्री या रक्षा सचिव को आगे आकर देश को बताना चाहिए था कि उसकी सेना और उसके रक्षा मंत्रालय में ऐसे मसले से निपटने के लिए पर्याप्त संगठनात्मक ताकत और नैतिक बल व आधार है। भारत में सेना प्रमुख को विवादों से ऊपर रखने की परंपरा रही है। जब भी कोई समस्या उत्पन्न हुई, उसका समाधान सार्वजनिक तौर पर कोई तमाशा खड़ा करने के बजाय आंतरिक तौर पर ही कर लिया गया, केवल कृष्णमेनन के गड़बड़ियों भरे दौर को छोड़कर जिसकी वजह से हमें 1962 के चीन युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा था, उसे हमने भुला दिया। 
हाल के कुछ बातूनी प्रमुखों से हमें कोई मदद नहीं मिली है। लेकिन राजनीतिक नेतृत्व कहां है? मैं माफी चाहूंगा यदि मेरी बातें किसी को हल्की प्रतीत होती हों, लेकिन कोई कह भी क्या सकता है यदि इस देश को अपने सशस्त्र बलों के लिए अप्रेरक राजनीतिक नेतृत्व मिले। इसकी शुरुआत जॉर्ज फर्नाडीज से होती है, जिन्होंने स्वयं को ऐसे सेनापति के रूप में देखा जिसने सिर्फ सियाचिन को अपनी जिम्मेदारी माना। और अब एके एंटनी जिनके नेतृत्व में सेना के अफसर दो बार सार्वजनिक बयानबाजी करते नजर आए। 
दरअसल हमें इन चीजों की बहुत ज्यादा जरूरत है : तोपखाने के लिए नई तोपें, एयर डिफेंस मिसाइलें, नए युद्धक विमान। रक्षा मंत्री और संभवत: यूपीए सरकार का मुख्य लक्ष्य हथियार खरीदी के घोटाले के बगैर एक और कार्यकाल पूरा करना है। यही वजह है कि विवाद की छोटी सी आहट से परीक्षण और यहां तक कि टेंडर्स भी निरस्त कर दिए जाते हैं। यदि आप मेरी उम्र के हैं या फिर पक्के क्रिकेटप्रेमी हैं तो आप बापू नाडकर्णी के प्रसिद्ध रिकॉर्ड के बारे में जानते होंगे।
बाएं हाथ के स्पिनर नाडकर्णी ने एक पारी में 29 ओवरों में 26 मैडन फेंकते हुए बगैर विकेट लिए तीन रन दिए थे। वे बल्लेबाजी भी इसी गति से करते थे। शायद उन दिनों भारतीय क्रिकेट की भावना के अनुरूप वे हमेशा ड्रॉ के लिए खेलते थे। एंटनी भारतीय राजनीति के बापू नाडकर्णी बन चुके हैं। इससे भारतीय सेना की ताकत पर खतरा मंडरा रहा है और संस्थागत तौर पर सशस्त्र बलों को नुकसान पहुंच रहा है।
हमारे कार्यरत सैन्य अफसर कभी भी राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल नहीं उठाएंगे। लेकिन जब वे अपने नेताओं को दुविधा में पाते हैं तो सुरक्षित खेल खेलने लगते हैं। हमारी सेना अब भी दुनिया की शानदार, निष्ठावान और अनुशासित सेनाओं में से एक है। उसे बेहतर नेतृत्व की जरूरत है, अंदरूनी तौर पर भी और निश्चित तौर पर राजनीतिक स्तर पर भी। 
शेखर गुप्ता लेखक द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ हैं। 
 
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