राजकुमार सोनी
विभाजन की त्रासदीपूर्ण पीड़ा पर गर्म हवा जैसी बेमिसाल फिल्म बनाने वाले एमएस सत्थ्यू अभी चंद रोज पहले ही जनसंस्कृति मंच भिलाई और भारतीय जन मंच(इप्टा) रायपुर के आयोजन में हिस्सेदारी दर्ज कराने पहुंचे थे। वर्ष 1960 में एक बार पहले भिलाई आ चुके सत्थ्यू को यहां काफी कुछ बदला हुआ सा मिला। उनकी जुबानी कहें तो अब यहां लोग बहुत तेज ढंग से दौड़ रहे हैं। आज की तेज रफ्तार भागती हुई जिन्दगी, सत्थ्यू बेहद चिंतित भी नजर आए। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-
क्या आपको लगता है कि व्यावसायिक सिनेमा के इस दौर में गर्म हवा जैसी फिल्म की कोई प्रासंगिकता बची रह गई है?
लोग ऐसा कहते हैं कि फिल्म ने विभाजन के बाद छाई हुई खामोशी की पड़ताल करने की कोशिश की गई है। अब भी धर्म, जाति और क्षेत्रीयता को लेकर संकीर्णता कम नहीं हुई है, इसलिए लगता है कि गर्म हवा प्रासंगिक हैं।
कई व्यावसायिक फिल्में भी यथार्थ की पक्षधर बनकर उभरीं हैं, ऐसे में क्या आपको लगता है कि गर्म हवा जैसी फिल्म बनाकर मुद्दे की बात कही जा सकती है।
सब जानते हैं कि व्यावसायिक सिनेमा का यथार्थ किस तरह का होता है। वहां आंसू और गरीबी सब चीज की कीमत लगाई जाती है। यदि कोई रो रहा है तो उसके पीछे किसी बड़ी कंपनी का विज्ञापन बोर्ड हो सकता है। व्यावसायिक सिनेमा में समस्याओं को देखने का नजरिया बिल्कुल अलग होता है। इस सिनेमा में कहानी तो देश की होती है लेकिन हीरो-हिरोइन नाचते-गाते विदेश में हैं। हर सिनेमा में पंजाबियों की शादी दिखाई जाती है। क्या केवल पंजाबी ही शादी करते है? यदि हर कोई यह सोचने लगेगा कि कला केवल कला के लिए ही है तो बेड़ा गर्क हो जाएगा। सामाजिक सरोकार का भी अपना महत्व है।
यदि आपने अब गर्म हवा बनाई तो क्या कठिनाई पेश आ सकती है?
जब गर्म हवा को बनाने के बारे में विचार किया गया तब हमें सब कुछ अपने मन के माफिक मिल गया था। सबसे बड़ी बात तो विचार आपस में मिल गए थे। पूरी फिल्म इस्मत चुगताई की एक कहानी से प्रभावित थी, लेकिन राजेंद्र सिंह बेदी का एक पत्र भी हमारी प्रेरणा में शामिल था। वर्ष 1974 में जब फिल्म बननी शुरू हुई तब हमारे पास बहुत ज्यादा पैसे नहीं थे। उस जमाने में लगभग ढाई लाख रुपए तो निगेटिव बनाने में ही लग गया था। फिल्म के निर्माण के दौरान मेरे पास मात्र एक कैमरा और तीन लाइट थी। हम लोग आगरा और फतेहपुर सींकरी में शूटिंग करते थे लेकिन साउंड रिकार्डिग का सामान बम्बई से आता था। पूरी फिल्म दस लाख रुपए में बन गई थी, लेकिन मैं कर्ज में डूब गया था। अभी पुणे की एक कंपनी है जो फिल्म को नए सिरे से रिलीज करना चाहती है। फिल्म की साउंड में थोड़ी दिक्कत है। अब री-लांच करने पर ही एक करोड़ रुपए का खर्च होगा। अब इरादों के साथ वादा निभाने वाले लोग भी नहीं रहे इसलिए लगता है कि यदि गर्म हवा को फिर से बनाने के बारे में सोचा गया तो शायद ज्यादा चुनौतियां पेश आएंगी। वैसे मैं जहां भी जाता हूं यह बात लोगों को जरूर बताता हूं कि कुछ अच्छे लोगों का जुड़ाव था सो गर्म हवा जैसी फिल्म बन गई। ऐसा दोबारा नहीं हो सकता।
आपने व्यावसायिक सिनेमा के निर्माण में रुचि क्यों नहीं दिखाई?
मैं हमेशा इस कोशिश में रहा हूं कि मैं जो कुछ करूं उसका समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। कुछ चीजें कुछ लोगों के नेचर में नहीं होती। मुझे नहीं लगता कि मैं कभी वेलकम बना पाऊंगा। अब तो तकनीक काफी महंगी हो गई है। हर फिल्म का बजट करोड़ों में होता है।
क्या सिनेमा में नए लोगों को मौका मिल रहा है?
दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। अब तो जो पैसा लेकर पहुंच जाता है उसे काम मिल जाता है। यह सिलसिला कब थमेगा कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन थमना चाहिए। पैसा लेकर लांच करने वालों की वजह से दर्शक प्रतिभाशाली लोगों के जौहर से वाकिफ नहीं हो पा रहा है।
अब हर तरह का जन आंदोलन हताशा के करीब दिखाई देता है। इसकी क्या वजह मानते हैं आप?
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हम बदली हुई परिस्थितियों के हिसाब से अपने आपको बदलने में हिचकते हैं। यदि पूरी दुनिया के बेहतर होने का सपना अब भी पल रहा है तो उस सपने की मौत नहीं हो सकती। नए सिरे से जूझने की चुनौतियां यदि सामने है तो जूझना ही होगा।
आपकी सक्रियता रंगमंच में भी बनी रही, यह कैसे संभव हुआ?
देखिए बलराज साहनी थे जो थियेटर के साथ-साथ फिल्म करते थे। उत्पल दत्त सिनेमा के साथ लिटिल थियेटर से जुड़े रहे। मुझे लगता है कि हमेशा नए लोगों का साथ अच्छा रहता है। नए लोग आपको कुछ नया देते हैं। अभी मैंने रायपुर में जो नाटक किया उसमें भी नए लड़के ही थे।
नए लोगों में विचलन भी देखा जा रहा है?
जरूरत नए लोगों को संभालकर रखने की है। गर्म हवा फिल्म की रिलीज के बाद जब बलराज साहनीजी नहीं रहे तो थियेटर में भी शून्यता कायम हुई। उत्पल दत्त के निधन के बाद भी थियेटर खाली हुआ। अब हबीब तनवीरजी हमारे बीच नहीं हैं, देखना है उनकी बिटिया कैसे संभालती है। नए लोग आपको आश्वास्त करते हैं कि वे पुरानों से कुछ बेहतर कर सकते हैं।
आप तो यहां पहले भी आ चुके हैं। क्या फर्क महसूस होता है?
पहले जब यहां आया था तब भिलाई और रायपुर के बीच एक दूरी लगती थी। अब लगता है यह दूरी कम हो गई है। लोग बहुत तेजी में नजर आए। पता नहीं यह तेजी क्यों हैं। (खामोशी)
आप बलराज साहनीजी के काफी निकट रहे हैं। उनके बारे में कुछ बताएं?
वे बहुत जीनियस कलाकार थे। वे अपने काम को बेहद शिद्दत के साथ अंजाम देते थे। वे जितने अनुशासन प्रिय थे उतने ही मिलनसार भी थे। गर्म हवा के एक दृश्य में जब नायिका की मौत हो जाती है तो वे रोते नहीं है। दरअसल साहनी जी की बिटिया ने भी आत्महत्या की थी। जब यह घटना घटी तब मैं वहीं था। वे भीतर से बेहद जज्बाती थे, लेकिन वे उसे आंसुओं से प्रकट नहीं करते थे।
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