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दबाव बना रहा है गोरखा मोर्चा

 कुमार प्रतीक, दार्जिलिंग

तेलंगाना मुद्दे पर हालात जटिल होने और केंद्र सरकार की सक्रियता कुछ कम होने से असमंजस में होने के बावजूद अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन करने वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा  सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही आगे बढ़ रहा है। अगर दार्जिलिंग में बीते 21 दिसंबर को केंद्र, राज्य और मोर्चा के बीच आयोजित चौथे दौर की तितरफा बातचीत के नतीजों का संकेत समझें तो मोर्चा को दबाव की अपनी रणनीति के तहत पहली कामयाबी तो मिल ही गई है। इसलिए उसने अब केंद्र व राज्य पर दबाव और बढ़ाने का फैसला किया है। इसी के तहत संगठन ने 28 दिसंबर से दार्जिलिंग में एक बार फिर बेमियादी बंद शुरू किया है। तमाम सरकारी दफ्तरों को भी बंद के दायरे में रखा गया है।
इससे पहले इसी रणनीति के तहत चौथे दौर की बैठक से पहले मोर्चा समर्थकों ने पहाड़ियों में आमरण अनशन शुरू किया था। संगठन ने इलाके में चार दिनों के बंद का भी एलान किया था। लेकिन यह बंद एक दिन बाद ही वापस ले लिया गया। आखिरी मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम की अपील पर मोर्चा ने आमरण अनशन दो दिनों के लिए स्थगित कर दिया। अब उसने लगातार अनशन शुरू किया है। मोर्चा की इस रणनीति का उसे फायदा भी मिला। जिस तितरफा बैठक में अलग गोरखालैंड के एजंडे पर बात ही नहीं होनी थी उसमें वही छाया रहा। विकास और पर्वतीय परिषद को और स्वायत्तता के मुद्दे गौण हो गए। बैठक में 45 दिनों के भीतर अलग राज्य के गठन के सवाल पर राजनीतिक स्तर पर बातचीत शुरू करने का फैसला किया गया। इससे मोर्चा के नेताओं और समर्थकों में भारी उत्साह है। वे इसे अलग राज्य के गठन की ओर एक अहम कदम मान रहे हैं।
मोर्चा के महासचिव रोशन गिरि कहते हैं कि बैठक में अब गोरखालैंड के गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह समस्या प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक है। इसका समाधान भी राजनीतिक स्तर पर ही हो सकता है। इसलिए हमने बैठक में यही मांग उठाई थी। हमारी यह मांग केंद्र ने मान ली है। अब वे 45 दिनों के भीतर हमें इस बारे में सूचित करेंगे।
गिरि कहते हैं कि अब इस मुद्दे पर अगली बातचीत राजनीतिक स्तर पर ही होगी। उन्होंने कहा कि राजनीतिक स्तर पर बातचीत जल्दी शुरू करने का दबाव बनाने के लिए ही हमने 28 दिसंबर से लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू किया है। इसके तहत उस दिन से पहाड़ियों में केंद्र व राज्य सरकार के अलावा पर्वतीय परिषद के तमाम दफ्तर बेमियादी काल तक बंद रहेंगे। बैंक, डाकघरों और जीवन बीमा निगम को इस बंद के दायरे से बाहर रखा गया है। इससे पहले मोर्चा से जुड़े सरकारी कर्मचारी संगठन ने 17 दिसंबर से ही सरकारी दफ्तरों में बेमियादी बंद की अपील की थी। लेकिन 21 दिसंबर की बैठक को ध्यान में रखते हुए तब इसे स्थगित कर दिया गया था।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मोर्चा केंद्र पर दबाव बनाने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ रहा है। चौथे दौर की बातचीत से पहले उसकी इसी रणनीति के तहत गोरखालैंड के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। अब राजनीतिक प्रक्रिया जल्दी शुरू करने के मकसद से ही उसने नए सिरे से आंदोलन और बेमियादी बंद की अपील की है।
 
 
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