राजकुमार शर्मा
देहरादून,जनवरी । पानी के संकट का असर अब जंगली जानवरों पर दिखने लगा है । ज्यों-ज्यो सर्दी बढ़ रही है,वन्यजीवों के हिंसक होने की घटनाओं में लगातार बृद्धि दर्ज की जा रही है आकड़े बताते है कि अक्टूबर महीने के बाद भालुओं ने सबसे अधिक हमला किया।महाकुम्भ 2010 की भीड़ एंव बढ़ते शोर से वन्य जीव मर्मज्ञों को यह आंशका है कि हरिद्वार - ऋषिकेश से लगे जंगलों से निकल कर अगर हाथियों (गजराजों) ने भीड़ को अपना निशाना बनाया तो क्या होगा? इस सदी के देवभूमि के इस महाआयोजन में जिस तरह मेला के आयोजकों ने मेला को विना किसी सुरक्षा बाडा बनाये लगातार वन से सट कर लोगों को रूकने एंव भीड़-भाड़ का आयेजन करने की छूट दे दी है उससे किसी भी सम्भावित खतरे से सरकार या प्रशासन कैसे निपटेगी इसकों लेकर आने वाले तीर्थयात्रियों भय ब्याप्त है।इन वन्य जीवों के हिंसक हो उठने के प्रमुख तीन कारण है जिसमें पहला कारण बढ़ते मानवीय शोर से उनकी एकान्तवास में खलल पैदा होता है जिसके जलते उनकी नीद पुरी नही हो पाती।दुसरा कारण वन्य क्षेत्र में फल, आहार की लगातार कमी दर्ज की जा रही है। और तीसरा कारण पीने के पानी की कमी भी मानी जा रही है जिसकी खोज में वन्य जीव मजबुर होकर जंगल से निकल कर आवादी वाले इलाके में प्रवेश कर जाते है।
इधर देखने को मिल रहा है कि कड़ाके की ठंढ़ के पड़ने के बाद भी वन्य जीव हिंसक होते जा रहे है।एक वर्ष का आकड़ा इस बात की तस्दीक करता है कि पिछले बारह महीने में केवल गुलदार के हमले से अब तक ढ़ाई दर्जन लोग मारे जा चुके है।इसमें सबसे जादा हमला गुलदारों ने सर्दी के मौसम में किया जिसमें डेढ़ दर्जन लोग उनके हमले के शिकार हुए।लगभग एक दर्जन लोगों को बरसात एंव गर्मी के मध्य अपनस शिकार बनाया।
आकड़े बताते है कि पिछले वर्ष भालुओं ने अपने हमले से दस लोगों को घायल किया।इनमें से केवल एक घटना अगस्त की है बाकि अन्य नौ घटनायें अक्टूबर नवम्बर एंव दिसम्बर महिनें की हैं। वन्य जीवों के जानकारों का मानना है कि इस बार वन क्षेत्र में जंगली फलों के उत्पाद में कमी दर्ज किये जाने के कारण पेट भरने की जुगत में भालु जंगल से निकल कर आवादी की ओर रूख कर रहा है।भालु के हमले से अबतक पौड़ी रेंज में सबसे अधिक लोग हता हत हुए है।पर्यावरण विशेषज्ञ बताते है कि इस बार बरसात एंव बर्फ बारी कम होने से पहाड़ों के जल श्रोत तेजी से सूख रहे है। इससे पानी की तलाश में गुलदार सहित अन्य वन्यजीव आवादी की ओर आ रहे है।कामोबेश हाथियों एंव जंगली सूअर की भी यही स्थिति है।इस सच को वन विभाग के सीसीएफ (प्रशासन)ने भी स्वीकारते हुए कहा कि जंगल में प्र्याप्त आहार न मिलने एंव पानी की कमी के कारण ही वन्य जीव अपनी जंगल की परिधी को लाघ कर हिंसक हो रहा है। जंगली इलाकों के पास मानवी दखल और रोशनी की चकाचैध इन वन्य जीवों को पुरी नी सोने भी नही देती,नीद का पुरा न होना भी इनमें बेचैनी पैदा कर रही है जिससे वे मानव से सीधें भीड़ जा रहे है और हिंसक होकर मानव के साथ संघर्ष को मूर्त रूप् दे रहे है।
महाकुम्भ के शुरू होते ही उत्तराखण्ड में पर्यटकों एंव श्रद्धालूओं की भारी भीड़ जुट रही है।पुरा मेला वन क्षेत्र से लगा हुआ है। कौतुहल वस यात्री दोपहिया एंव चार पहिया मोटर बाहनों से वन की परिधी में घुस कर लगातार वन्य जीवों के साथ छेड़छाड़ करने से नही सुकता। वन क्षेत्र में मानवी दखल भी इनके गुस्सा का कारण बन रहा है।मानवी दखल से तंग वन्य जीव हिंसक हो रहे है। पुरे उत्तराखण्ड में राज्य गठन के बाद से जिस तरह मानव जंगली इलाके में बिजली की रोशनी से जो वन के प्रकृति में खलल पैदा कर रहा है उससे वन्य जीवों में बेचैनी बढ़ रही है।पहली पहाड़ के लोग जिस तरह इन वन्य जीवों से हिल मिल कर रहते थे उसी तरह उन्हें रहने पर ये वन्यजीव उनके मित्र होते थे।विकास की ललक ने पहाड़ के लोगों को उनका शत्रु बना दिया है।महा कुम्भ के आयोजकों को वन्य क्षेत्र में मानवी दखल कम हो की योजना पर कार्य करते हुए हाथियों से मेला के संम्भावित खतरे पर भी होमवर्क करना चाहिए।