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पत्रकारिता का अंतिम सम्पादक

 राकेश कुमार 

‘हिन्दी पत्रकारिता का अंतिम सम्पादक, ‘स्टेट्समैन‘ ‘भारतीय पत्रकारिता के शिखर पुरुष, ‘हिन्दी पत्रकारिता का एक स्तंभ, ‘शोषित-पीड़ित, वंचित और बेजुबानों की आवाज, असाधारण बौद्धिक साहस के धनी, यानी प्रभाष जोशी। इन तमाम सम्बोंधनों से सुशोभित पत्रकारिता का लौहपुरुष अब अंतिम रुप से विदा ले चुका है। इतिहास बन चुके प्रभाश जोशी के नाम पर अब हमारे बीच केवल उनक द्वारा कारे किये गये कागद ही रह गये हैं। प्रभाष जी को उपरोक्त सभी सम्बोधनों से याद करते हुए तमाम वरिष्ठ पत्रकार, राजनेता और बुद्धिजीवी साथियों ने उनके पंचतत्व में विलीन होने से पहले अपने-अपने हिसाब से उनके ऋणों को चुकाने की कोशिश कीे। 
जिस नर्मदा की तलहटी में बसे गाँव मोती (इंदौर) की सरजमीं में जन्में प्रभाष जी पले-बढे़ और अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की, अंततः उसी नर्मदा की गोद में समाहित भी हो गये। नर्मदा नदी जिस तरह अन्य तमाम नदियों की अपेक्षा विपरीत दिशा पश्चिम में बही, उसी नदी के साये में पले-बढे प्रभाष जी पत्रकारिता जगत में एक अलग धारा बनकर आजीवन जनसरोकारी पत्रकारिता के प्रति ईमानदारी से समर्पित रहे। अपने जीवन में उन्होंने पत्रकारिता के लिए इतना कुछ किया, जिसे गिनाना मुश्किल नहीं, तो नामुमकिन जरुर है। अपने सम्पादकत्व में शुरु किये गये अखबार ‘जनसत्ता‘ के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को जो धार, और जो कलेवर प्रभाष जी ने दिया, पत्रकारिता जगत ही नहीं, जनसरोकारों से संबंध रखने वाला हर आदमी इसके लिए, उनका आभारी रहेगा। 5 नवम्बर की रात अकस्मात उनका जाना लोकतंत्र के चैथे खम्भे ‘खबरपालिका‘ के उस सशक्त स्तम्भ का ढहना है, जिसके बिना उसका वजूद अंधकारमय नहीं तो धंुधला तो जरुर रहेगा। 
सर्वोदयी और गांधीवादी आदर्शों में रचे-बसे प्रभाष जी 1972 में जेपी के आंदोलन में हमसफर बने और चम्बल के खूंखार डाकुओं का आत्मसर्पण करवाने से लेकर इन्दिरा गांधी सरकार का तख्तापलट करवाने तक में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1992 में बाबरी मस्ज़िद विध्वंस के समय आरएसएस व कारसेवकों के विरोध में खड़े रहकर उन्होंने जैसे धारदार काॅलम व लेख लिखे, वे आज भी प्रांसगिक हैं। साम्प्रदायिकता रुपी जहर को देश के लिए खतरा 
मानकर उनने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके राजनीतिक मंच भाजपा से भी लोहा लिया और उनकी काली करतूतों को सामने लाने तक का काम किया। भारत की तथाकथित वामपंथी पार्टियों की भी खूब लानत-मलामत की। वे ताउम्र जनसरोकारी पत्रकारिता के प्रति समर्पित रहे। प्रभाष जी ये सब काम बड़े सहज ढंग से कर लेने वाले एक ऐसे मूर्धन्य पत्रकार थे, जिनकी जगह भर पाना शायद मुनासिब नहीं है। वे अपनी कलम के सामने किसी को नहींे बक्शते थे। उनकी कलम जब भी जिसके खिलाफ उठी, उसे लिख कर ही रुकी। इन्हीं आदर्शों ने उन्हें पत्रकारिता की कसौटी पर खरा सोना साबित किया, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।  
इसे प्र्रभाष जी की खूबी ही कही जाय कि उन्होंने जनसत्ता की टीम में कई विचाराधारा के लोगों को शामिल किये थे। वे जिन राजनेताओं, पार्टियों और धर्मावलंबियों की रीति-नीति पर खूब खरी-खोटी लिखते थे, वे भी उनके प्रसंशक के बतौर देखे गये। वे वास्तव में एक असाधारण बौद्धिक साहस के धनी व्यक्ति थे। इंदौर के एक हिन्दी दैनिक ‘नई दुनिया‘ से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी आज कितने पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे थे, इसका भी अनुमान लगा पाना कठिन है। 
यह प्रभाष जी की लेखनी की ही देन थी कि कभी जनसत्ता उनके समय में दो लाख के आकंड़े को पार कर रहा था। इसी से उनके विचारों, आदर्शों और जनसरोकारी पत्रकारिता का पता लगाया जा सकता है। मीडिया में बढ़ रहे बाजारवाद को लेकर वे न केवल चिंतित रहे बल्कि उसके विरोध में संघर्ष छेड़ने से भी पीछे नहीं हटे। पत्रकारिता के गिरते मूल्यों के प्रति न केवल चिंतित रहे बल्कि उसके विरोध में लिखा भी। यहां तक कि उन्होंने अपने रहते जनसत्ता पर बाजारवाद को दूर-दूर तक फटकने नहीं दिया। जनसत्ता से सेवानिवृत्त होने के बाद भी जब तक उनका प्रभाव चलता रहा, उन्होंने जनसत्ता में विज्ञापन तक निकलना मुश्किल कर देते थे। उनका यह प्रभाव जैसे-जैसे कम होता गया वैसे-वैसे आम जन की ‘जनसत्ता‘ में भी विज्ञापनों की भरमार होने लगी, जो सिलसिला निरन्तर जारी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनसत्ता में शुरु हुआ विज्ञापन का यह खेल आखिरकार कहां जाकर थमता है। 
11 नवम्बर की सुबह उठा दरवाजा खोला, तो कुर्सी पर पड़ा अखबार देखा जो कुछ बदला सा नजर आ रहा था। अखबार उठाया और खोला तो आखे एक बार ठहर सी गयी कि ‘जनसत्त‘ का भी ऐसा हस्र हो सकता था, जो कभी सोचा भी नहीं था। 11 नवम्बर के लखनऊ अंक में पूरे पेज पर एक विज्ञापन छपा था जो तमाम अन्य हिन्दी-अंग्रेजी अखबारांे की भांति ‘जनसत्ता‘ में भी फ्रंट में फ्रंट पेज लगाया गया था। विज्ञापन में एक बच्ची हाथों में हवाई जहाज लिये दौड़ रही थी और उसके उपरी हिस्से में बड़े अक्षरों में लिखा था कि ‘90 वर्ष से अधिक समय से एक बैंक दे रहा है प्रेरणा, इंडिया को सपने देखने की‘। ये शब्द साफ तौर पर इस बात को बयां कर रहे हैं कि ‘जनसत्ता‘ भी 15 सालों से इस सपने को सजोये बैठे था जिसे वह प्रभाष जी के निधन के छठे दिन पूरा कर दिखाया। वह चित्र भी इस बात का संकेत दे रहा है कि आमजन के लिए बनाया गया ‘जनसत्ता‘, की अगली जनवादी उड़ान में कुछ ऐसे लोगों की ही आवाज होगी। अच्छी बात तो यह है कि यूनियन बैंक 90 सालो से भारत को सुनहरे सपने देखने की प्रेरणा देता ही रहा लेकिन ‘जनसत्ता‘ के बाजारवादी सम्पदकों ने 15 सालों से सजोये अपने सपने को पूरा कर दिखाया। ‘जनसत्ता‘ के इतिहास में शायद यह पहला दिन था जब इस तरह का कोई विज्ञापन छपा। 
इस बात का स्पष्टीकरण करना चाहा कि ‘जनसत्ता‘ में कभी इस प्रकार के विज्ञापन छपे थे। सुबह-सुबह ‘जनसत्ता‘ से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार से बात की तो वे बड़े दुखी भाव में बोेले कि अब ‘जनसत्ता‘, वो ‘जनसत्ता‘ नहीं रहा जिसे प्रभाष जोशी ने गढ़ा और रचा था। जनसत्ता पर उनका इतना प्रभाव था कि उनके रहते इस तरह का विज्ञापन निकालने की हिम्मत कभी कोई सम्पादक नहीं जुटा सका। एक वो दिन थे और यह भी एक दिन है, जिसे ‘जनसत्ता‘ में बढ़े बाजावादी बर्चस्व के रुप में याद किया जायेगा। उन्होंने यहां तक बताया कि अब इस बदलाव को प्रभाष जी के चहेते भी नहीं रोक सकते हंै चूंकि यह सब दिल्ली के एसी कोठरियों में सालों-सालों तक बाहर न निकलने वाले बुद्धिजीवी लोग डिसाइड करते है कि अखबार का लेआउट आज कैसे बनेगा और पहले पन्ने पर क्या-क्या जायेगा, क्या नहीं ? 
जिस प्रभाष जोशी ने अपना खून-पसीना एक कर ‘जनसत्ता‘ को आमजन का अखबार बनाया और आजीवन बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध रहे उसी प्रभाष जोशी के निधन पर ‘जनसत्ता‘ में एक सम्पादकीय भी नहीं छपा, जबकि उस दिन के लगभग सभी अखबारों में छपा था। पर इससे भी बड़ी दुखद बात तो यह है कि प्रभाष जी अपने जीते जी जनसत्ता में जिस चीज को दूर-दूर तक फटकने नहीं दिये उसी चीज को उनके पंचतत्व में विलीन हुए सप्ताह भी नहीं हुआ होगा कि बाजारु किस्म के संपादकों ने जनता के सामने परोसना शुरु कर दिया। हालांकि बाजारवाद का प्रभाव पिछले कुछ महीनों से बढ़ने लगा था। मई-जून के महीनों में हेड मास्ट के नीचे ‘टोरेक्स‘ कफ सीरप का ऐड निकल रहा था। जो सम्भवतः पहले से ही ‘जनसत्ता‘ के जनवादी पत्रकारों की गले की खिचखिच दूर करने और मानसिक रुप से तैयार रहने के लिए दिया जा रहा था। 
इन सब के बावजूद जीवन के आखिरी साल में कुछ पत्रकार बंधुओं द्वारों पत्रकारिता के इस युगपुरुष को भी कर्मकाण्डी-ब्राह्मणवादी सोच वाला पत्रकार कहकर प्रचारित किया गया। जो बहुत हद तक सही भी है जिसे वे स्वयं स्वीकार भी करते थे कि वे एक कर्मकाण्डीय हिन्दू हैं। लेकिन उनका यहां हिन्दू होने का धर्म त्रिसूल और लाठी चलाने वाले संघियों के समनान्तर ही नहीं उनके खिलाफ भी था। जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक हिन्दू होने के धर्म में व्याख्यायित भी किया है। हालांकि एक कर्मकाण्डीय हिन्दू और गांधीवादी-सर्वोदयी होने की जो राजनैतिक कमजोरियां होती हैं उनसे वे भी मुक्त नहीं थे और समय-समय पर ये कमजोरिया उजागर भी हो जाती थीं। जैसे पिछले दिनों ही वे जनसत्ता में जेपी आंदोलन में संघियों को शामिल करने की ऐतिहासिक ‘भूल’ को जायज ठहराने लगे थे, या भाजपा के वरिष्ठ नेता हृदय नारायण दिक्षित के पुस्तक का विमोचन करने पहुंच गये थे। 
आमजन के मुद्दे की आवाज बनकर जनप्रतिनिधियों और संसद को कठघरे में खड़ा करने के लिए तत्पर रहने वाले प्रभाष जोशी आजीवन बिना रुके बिना थके वंचित, बेजुबान लोगों की आवाज बनने के लिए प्रतिबद्ध रहे। मीडिया में सत्ता प्रतिष्ठानों और बाजारवाद के बढ़ते दखल के खिलाफ लड़ने के लिए बेचैन रहे।  
 उनके इसी स्वभाव के चलते हम पत्रकारिता के छात्रों ने उनको, इलाहाबाद विश्वविद्यायल में हो रहे शिक्षा के निजीकरण के विरोध म,ें चल रहे अपने आंदोलन में बुलाना चाहा। जब हमने उनसे बात की तो उन्होंने पत्रकारिता में बढ़ रहे बाजारवाद के विरोध में अपनी आवाज मुखर करने के लिए हमारे आंदोलन में आने का आमंत्रण सहस्र स्वीकार कर लिया। जबकि प्रभाष जी  हममें से किसी को पहले से नहीं जानते थे। 30 सितम्बर को उनके आने को लेकर हम सभी छात्रों में एक अलग ही प्रकार का माहौल था। हमने तय किया कि इस पूरे आंदोलन का केन्द्र रहा पत्रकारिता विभाग का लान जिसे हमने ‘खबरचैरा‘ का नाम दिया है और जहां मीडिया की ताकत को दर्शाता स्टैचू है, जिसके इर्द-गिर्द हमने आंदोलन से जुड़े झण्डों और खबरों को चिपकाया है, उसका विधिवत उद्घाटन प्रभाष जी से करवायेंगे। और हमने करवाया भी। 
इस समय तक आन्दोलन में कोई सफलता न देख हम छात्रों का उत्साह काफी कम हो गया था। छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा ‘‘पत्रकारिता के जिस मूल्य को बचाने और जिन बाजारवादी शक्तियों के दखल को रोकने की लड़ाई लड़ रहे हो उसमें कभी पीछे मत हटना, चाहे इसके लिये सर कटाने की नौबत ही क्यों न आ जाय।‘‘ ऐसी नौबत आयी तो इसमें कटने वाला पहला सर प्रभाश जोशी का होगा। 72 वर्षीय श्री जोशी की इन बातो को सुनकर छात्रों में आंदोलन के प्रति एक नया उत्साह जागा। उनकी बातों का छात्रों में इतना प्रभाव रहा कि जो छात्र आंदोलन में भाग लेने से कतराते थे वे भी अब आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। पत्रकारिता में खत्म हो रही जनक्षधरता और उसके मूल्य के प्रति वे कितने चिंतित रहते थे उनकी इस चिंता का पता इसी बात से लगा सकता हैं कि अपने उस दिन के पूरे व्याख्यान में कई बार उनकी आखे आंसू से भर आईं। इस दौरान वे एक-एक छात्र, जो उनके पास गया सब से बातें करते रहे, कभी किसी के सर पर हाथ रखते हुए तो कभी किसी के कन्धे पर हाथ फेरते और उनसे पूछते कि पत्रकारिता में आने का मन कैसे हुआ। 
इन सब के साथ-साथ प्रभाष जी के अन्दर अपने पुराने मित्रों के प्रति अगाध प्रेम देखने को मिला। वे अपने जितने अन्य कामों में उत्सुक रहते थे उतने ही अपने मित्रों से मिलने-जुलने में भी उत्सुक दिखे। दोपहर के समय अपने एक अजीज मित्र वरिष्ठ वामपंथी नेता कामरेड जियाउल हक से मिलने उनके घर स्वयं चलकर गये और देर शाम गेस्ट हाउस जाने तक वे उनके साथ रहे। प्रभाष जी की यह विशेषता ही थी कि बच्चे हों या बूढ़े वे सब को अपना दोस्त बना लेते थे। उनका यह पहलू तब देखने को मिला जब हम अपने कुछ साथियों सहित उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने गये। प्रभाष जी को एक दफा सीट पर बैठा दिया गया लेकिन प्रभाष जी थे कि एक दोस्त की तरह बोगी से बाहर निकलकर ट्रेन छूटने तक प्लेटफार्म पर खड़े होकर हम छात्रों से आंदोलन व पत्रकारिता तथा विश्वविद्यालयों के बदलते स्वरुप पर चर्चाएं करते रहे। इसी बीच ट्रेन की सीटी बजी और वे चले गये-----।   
 
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