न्यायमूर्ति गोगोई ने यह न्याय तो नहीं किया

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न्यायमूर्ति गोगोई ने यह न्याय तो नहीं किया

संजय कुमार सिंह 

पूर्व मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने जनवरी 2018 की अपनी प्रेस कांफ्रेंस से एक उम्मीद बनाई थी और मेरे मन में उनकी अच्छी छवि बनी थी. यौन उत्पीड़न का आरोप लगने के बाद मुझे लगा कि उन्हें फंसा दिया गया है पर मेरा मानना था कि हिन्दी फिल्मों के हीरो की तरह वे भी बेदाग निकलेंगे और गंदी राजनीति की पोल बस खुलने वाली है. राजनीतिकों द्वारा फंसा लिए जाने की संभावना होने के बावजूद मेरा मानना था कि उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस ऐसे ही नहीं की होगी और अपने बचाव (कम से कम गलत न फंसाया जाए) का उपाय जरूर किया होगा और इतना सक्षम आदमी ही पंगे लेता है. पर बाद में जो सब हुआ वह बहुत निराशाजनकरहा. मुख्य न्यायाधीश की लाचारी के साथ यह भी साफ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट में भी कार्यस्थल पर यौन शोषण से बचाव या शिकायत पर निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था नहीं है.


मुझे नहीं लगता कि अपनी बात कहने के लिए मुझे उनके फैसलों और उन मुकदमों की चर्चा करने की जरूरत है जिससे मैं निराश हूं. अगर उन्होंने राज्यसभा का मनोनयन स्वीकार नहीं किया होता तो मेरी राय में उनकी स्थिति वो नहीं होती जो अब है. मैं उन्हें व्यवस्था का शिकार मानता और समझता कि वे चाहकर भी मन लायक काम नहीं कर पाए. यौन शोषण मामले में क्लीन चिट मिलना इसके लिए पर्याप्त था. लेकिन शिकायतकर्ता को नौकरी से हटाने के बाद फिर काम पर रख लिया जाना – पूरे मामले को संदिग्ध बना देता है. रही सही कसर उनके मनोनयन ने पूरी कर दी. हालांकि, जब उन्होंने कहा कि वे शपथ लेने के बाद बोलेंगे तो मुझे फिर उम्मीद बनी थी. मैंने समझा था कि वे पूरा मामला खोल कर रख देंगे. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. ऐसा वे कर सकते थे. और कोई कारण नहीं है कि उनकी बात पर यकीन नहीं किया जाता. ना उन्हें डरने की जरूरत है ना उन्हें रिटायरमेंट के बाद राज्यसभा का सदस्य बनने से मिलने वाले लाभ की. ऐसे में उन्हें अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए थी.

मुख्य न्यायाधीश पर यौन शोषण का आरोप साधारण नहीं है. क्लीन चिट मिलना भी नहीं. कार्रवाई के संबंध में शिकायतकर्ता के आरोप और फिर उसे काम पर वापस रख लिया जाना. शक की सुई को मुख्यन्यायाधीश की तरफ मोड़ता है. अगर वे मनोनयन का लाभ नहीं लेते तो मैं मानता कि उन्हें फंसा लिया गया था. मन लायक काम कराया गया और इसमें शिकायकर्ता का भी उपयोग किया गया. लेकिन मनोनयन स्वीकार करने से लगता है कि सरकार तो उनकी समर्थक है और उसी सरकार ने शिकायतकर्ता को लगभग पूरे सम्मान से काम पर रख लिया है. मतलब उसकी शिकायत भी सही ही थी. देश का मुख्यन्यायाधीश रहा कोई व्यक्ति इस स्थिति को कैसे स्वीकार कर सकता है? अगर उन्होंने पद स्वीकार नहीं किया होता तो लगता कि सरकार मनमानी कर रही है पर राज्यसभा में मनोनयन और उसे स्वीकार करना मनमानी नहीं हो सकती. अगर उन्होंने सही स्थिति बताई होती तो अच्छा लगता.


शपथग्रहण की खबर के साथ आज के अखबारों में कहा गया है, "गोगोई की 'शपथ', एक दिन मेरा स्वागत करेंगे आप" (दैनिक जागरण). मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं. पर लगता नहीं है कि वह दिन आएगा. गोगोई ने कल टाइम्स ऑफ इंडिया से बात की. सत्य हिन्दी ने उसके अंश प्रकाशित किए हैं. उसके अनुसार गोगोई ने कहा - न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लॉबी से ख़तरा. पर इसमें कुछ खास नहीं है. लॉबी कौन है, खतरा है तो दूर कैसे होगा – यह सब उनकी चिन्ता होनी चाहिए. लेकिन इसपर वे शांत लगते हैं. उन्होंने कहा है, न्यायपालिका की आज़ादी को ख़तरा उस लॉबी से है, जो अपनी मनमर्जी का फ़ैसला नहीं आने पर न्यायपालिका को बदनाम करने लगता है. पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, 'न्यायपालिका की आज़ादी का मतलब है आधा दर्जन लोगों की लॉबी की पकड़ को तोड़ना. इस लॉबी की जकड़न को तोड़े बिना न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं हो सकती. वे जजों को बंधक बनाए हुए हैं.' गोगोई ने कहा : 'यदि किसी मामले का फ़ैसला उनके मुताबिक़ नहीं हो तो वे न्यायपालिका को हर मुमकिन तरीक़े से बदनाम करते हैं.’


मुझे नहीं लगता कि यह इतना बड़ा मुद्दा है. या कोई नई बात है. और फैसले सही होते हुए दिखें तो इस तरह बदनाम करना संभव नहीं होगा. सुधांशु रंजन की किताब, ”जस्टिस, जुडोक्रेसी एंड डेमोक्रेसी इन इंडिया : बाउंड्री एंड ब्रीचेज” के अनुसार, 14 जुलाई 1997 को न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने भरी अदालत में कहा था, मुझपर और मेरे साथी जजों पर 1993 की रिट याचिका संख्या 340-43 को नहीं सुनने के लिए भारी दबाव है. उन्होंने यह भी कहा था कि उनपर ऐसे दबावों का असर नहीं होगा. यह मशहूर जैन हवाला मामला था और 115 अभियुक्तों वाले इस मामले में किसी को सजा नहीं हुई. यह मामला हवाला के जरिए आतंकवादियों को धन पहुंचाने से भी जुड़ा था पर यह नहीं कहा जा सकता है कि इसका पूरी तरह विश्लेषण हुआ और आवश्यक कार्रवाई हुई. अभी मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता के लिए कार्रवाई नहीं है. इसलिए मैं न्यायमूर्ति गोगोई की ही बात करूंगा.

उन्होंने कहा है, मुझे डर स्थिति जस का तस बनाए रखने वाले जजों से है, जो इस लॉबी से टकराना नहीं चाहते और चुपचाप रिटायर हो जाना चाहते हैं.' इससे लगता है कि वे चुप नहीं हैं पर अभी तक उन्होंने कुछ बोला नहीं है और अब बोललेंगे इसकी उम्मीद ही की जा सकती है. उन्होंने कहा, 'जब मैं जनवरी 2018 में प्रेस कॉन्फ्रेंस में गया, मैं इस लॉबी का चहेता बन गया. पर वे लोग चाहते थे कि जज किसी मामले पर फ़ैसला उनकी इच्छा के अनुसार करें, ऐसा करने पर ही वे उस जज को निष्पक्ष होने का सर्टिफ़िकेट देंगे.' गोगोई ने कहा कि किसी और के विचारों की परवाह न उन्होंने पहले कभी की और न ही अब करते हैं. यदि वे आलोचना की परवाह करते तो जज के रूप में काम नहीं कर पाते. उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या और रफ़ाल के मामलों के फ़ैसले बेंच की आम सहमति से लिए गए थे. लेकिन स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया या आगे क्या योजना है, इस बारे में उन्होंने अभी तक कुछ नहीं कहा है.फोटो साभार 


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