गोगोई जी ,हम शर्मिंदा हैं !

अयोध्या के अध्याय की पूर्णाहुति ! अब आगे क्या ? हिंदी अखबारों में हिंदू राष्ट्र का उत्सव ! केरल में खुला संघ का सुपर मार्केट ! एमपी में कांग्रेस अब ‘भगवान’ भरोसे धर्म-धुरंधर’ फिर भीख पर गुज़ारा करेंगे राजनीतिक इष्टदेव तो आडवाणी ही हैं प्रधान मंत्री द्वारा राम मंदिर के शिलान्यास के खिलाफ भाकपा-माले का प्रतिवाद राममंदिर के भूमि पूजन इनका है अहम रोल राम मंदिर संघर्ष यात्रा की अंतिम तारीख पांच अगस्त यह कर्रा गांव का शरीफा है बदलता जा रहा है गोवा समुद्र तट पर बरसात बाढ़ से मरने वालों की संख्या 19 आखिर वह दिन आ ही गया ! बिहार में कब चुनाव होगा? मंदिर निर्माण का श्रेय इतिहास में किसके नाम दर्ज होगा ? राष्ट्रीय कंपनी अधिनियम पंचाटः तकनीकी सदस्यों पर अनावश्यक विवाद बहुतों को न्यौते का इंतजार ... आत्महत्या की कहानी में झोल है पार्षदों को डेढ़ साल से मासिक भत्ता नहीं मिला

गोगोई जी ,हम शर्मिंदा हैं !

प्रेमकुमार मणि

खबर है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई को भारत के राष्ट्रपति ने राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया है . जहाँ तक कानून की बात है, मेरी जानकारी के अनुसार यह गलत नहीं है . लेकिन कानून के अलावे नैतिकता और लोकलाज भी होता है ,जिसे एक सभ्य सुसंस्कृत समाज को दरकार होती है . कानून सम्मत होना तो आवश्यक है ; लेकिन उससे अधिक समाज- सम्मत होना आवश्यक होता है . समाज की नजर से गिरा हुआ आदमी या संस्था कानूनन होकर भी मर्यादाविहीन होता है . समाज का दंडविधान कानून के दंडविधान से कहीं अधिक भारी होता है . कबीर बानी है ' सबसे दण्ड कबीर का ,चित सो दियो उतार ' चित से उतार देना ,कबीर के अनुसार सबसे बड़ी सजा है . जो समाज के चित्त से उतर जाता है ,गिर जाता है ,कानून की नजर में सही होने के बावजूद भी बाज़ दफा समाज द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है .

गोगोई जो कल तक सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे ,आज संसदसदस्य हैं . वह चुन कर नहीं आये हैं ,सरकार द्वारा मनोनीत किये गए हैं . यह वही गोगोई हैं ,जिन्होंने कुछ समय पहले इस नैतिक सूक्ति का प्रतिपादन किया था - ' There is a strong view point that post- retirement -appointments is a scar on independence of judiciary . तब वह सुर्ख़ियों में थे . आज भी वह सुर्ख़ियों में हैं . लेकिन भिन्न रूप में .


गोगोई उन चार जजों में एक थे ,जिन्होंने 12 जनवरी 2018 को अपने ही मुख्य न्यायाधीश के कार्यकलापों पर ऊँगली उठाते हुए एक प्रेस कांफ्रेंस की थी .तब मैंने इस घटना पर लिखा था . उसे नत्थी कर रहा हूँ . उस वक़्त गोगोई अपनी ही न्यायव्यवस्था पर सवालिया निशान उठा रहे थे . अपने ही मुख्य न्यायाधीश को नसीहत दे रहे थे . उसी वर्ष अक्टूबर में वह मुख्यन्यायाधीश हुए . इसके बाद जितने विरोधाभासों को उनने उठाया शायद ही किसी ने उठाया हो . मुझे स्मरण होता है इसी काल में एक महिला कर्मी ने उनपर यौन-प्रताड़ना के आरोप भी लगाए . एक एंक्वाइरी पैनल बना और जैसा कि ऐसे मामलों में आम तौर पर होता है ,वह बरी कर दिए गए . अनेक मामलों में ताबड़तोड़ फैसलों से उन्होंने हुक्मरानों को इतना खुश किया कि पदमुक्ति के छह माह के भीतर ही वह देश की सबसे बड़ी पंचायत के मेंबर बनाये गए . यह शायद उनके राजनैतिक जीवन का आरम्भ है . संभव है वह मंत्रिमंडल में शीघ्र ही शामिल किये जाएँ और कानून मंत्री के रूप में नजर आएं .


जो हो , गोगोई ने मुझ जैसे आम लोगों की नजर में स्वयं को गिराया है . वह अपनी ' उपलब्धि ' पर चाहे जितने खुश हों , उनके कारनामे से भारत के नागरिक शर्मिंदा हैं . न्यायपालिका के प्रति आमजन का जो सम्मान है ,उसे उन्होंने अपनी उपलब्धियों से ठेस पहुंचाई है . लेकिन ,क्या किया जाय ! जहाँ सब गिर रहे हों ,वहां एक रिटायर्ड जज क्यों नहीं गिरे ? यह उसका साधारणीकरण भी तो हो सकता है ?


क्या वह दिन याद है .तब यह लिखा था .


अदालत में आग

समन्दरि लागि आग, नदिया जल कोइला भई .

देखि कबीरा जागि , मच्छी रुखां चढ़ि गई ..

(समंदर में आग लग गई, नदी जलकर कोयला हो गई, यह सब देख कबीर जागे तब मछली पेड़ चढ़ गई ...)


सचमुच अफरा -तफरी मच गई, जब न्याय करने वाले ही न्याय की गुहार लगाने लगे. यह तो समंदर में आग लगने जैसी ही बात थी. विचित्र,किन्तु सत्य. ऐसे ही किसी प्रसंग पर तो कबीर ने उपरोक्त पद गढ़े होंगे.न्यायपालिका देश के नागरिकोंको न्याय देने केलिए वचनबद्ध है और पूरा देश उसके प्रति विश्वास और सम्मान रखना चाहता है.सुप्रीम कोर्ट अपने मुल्क में न्याय की सबसे ऊँची पीठ है; उम्मीद की आखिरी मंजिल.सेक्युलर व्यवस्था में जनता द्वारा ही स्थापित एक " ईश्वर ", जिसके ऊपर या आगे कुछ नहीं है. लेकिन विगत12 जनवरी('18)को जो हुआ, उससे पूरा देश स्तब्ध रह गया. सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देश के नाम न्याय की गुहार लगाई और बतलाया कि स्वयं न्यायपालिका में न्याय नहीं हो पा रहा है.


यह अत्यंत गंभीर मामला है. इसलिए,बेहतर होगा, मामले को थोड़े विस्तार से समझा जाय. न्यायमूर्ति जे. चेलमेस्वर के नयी दिल्ली स्थित सरकारी आवास 4, तुगलकरोड पर विगत 12 जनवरी को 12 बजे दिन में प्रेस कॉन्फ्रेंस होता है, जिसमे सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज, - सभी न्यायमूर्ति चेलमेस्वर, रंजन गोगोई, मदन वी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने हिस्सा लिया और बतलाया कि सुप्रीम कोर्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. न्यायमूर्तियों के अनुसार दो महीने पहले उनलोगों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था कि महत्वपूर्ण मामले उनसे जूनियर जजों को नहीं दिए जाएँ. इन जजों ने यह भी बतलाया कि शुक्रवार को,यानि उसी रोज, उनलोगों ने मुख्य न्यायाधीश से मिलकर अपनी बातें रखीं,लेकिन वह नहीं माने. इसके बाद, जजों के अनुसार, उनके पास कोई विकल्प नहीं था, और वे तमाम बातें देश के समक्ष रखने को मजबूर हुए. जजों के मुताबिक, उनका प्रेस के समक्ष जाने का यह फैसला इसलिए हुआ कि देश के लोग यह न समझें कि उनलोगों ने अपनी आत्मा बेच दी है. प्रेस वार्ता में दो महीने पूर्व लिखे गए मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र की प्रति भी जारी की गई. मामले की गंभीरता अधिक बढ़ गई जब सवाल-जवाब के क्रम में यह पूछे जाने पर कि क्या यह प्रसंग जस्टिस लोया मामले से भी जुड़ा है? जस्टिस चेलमेस्वर ने जवाब दिया - आप यह मान सकते हैं. अब पूरा देश जानता है कि गैंगस्टर सोहराबुद्दीन मामले के सीबीआई जज जस्टिस बी .एच . लोया की मौत एक पहेली बन चुकी है. यह मामला मुख्य न्यायाधीश ने दसवें नंबर के जज अरुणकुमार मिश्र की पीठ में भेज दिया है. पूरे देश की इस पर नज़र है,क्योंकि इसके तार सत्ता पक्ष से जुड़ते हैं.


वबाल मचना स्वाभाविक था ,क्योंकिमामले की गंभीरता पर तो कोई विवाद ही नहीं है. सरकार भी कठघरे में आ गई. विपक्ष ने मुल्क की चिंता से खुद को जोड़ा तो सरकारी पक्ष बिफर उठा. भूतपूर्व जजों और दूसरे कानूनविदों ने अपनी चिंताएं जाहिर की. सबकी चिंता में कहीं -न -कहीं आम नागरिकों की चिंता भी शामिल थी. और अभी तो यह मामले का आरम्भ है. बात निकली है,तब दूर तक जाएगी. जानी चाहिए.

मैं , उन असंख्य लोगों में हमेशा एक रहा हूँ, जो मुल्क में जुडिशरी की चिंता में शामिल रहे हैं. मैं कोई कानूनविद नहीं हूँ. न ही होना चाहता हूँ. मेरी आज़ाद ख़याली को कानून और व्यवस्था की बंदिशें बहुत रास नहीं आतीं. मैंने हमेशा करुणा को कानून और विचार से अधिक महत्वपूर्ण माना है. लेकिन व्यवस्थाओं का सम्मान करना जानता हूँ,इसकी अहमियत भी समझता हूँ. इसलिए मुझे हमेशा महसूस हुआ है कि व्यवस्था और कानून को जन पक्षधर होना ही चाहिए. सबसे निचले स्तर पर जो जी रहे हैं, व्यवस्था और कानून को उनके साथ होना चाहिए. यदि वह नहीं है, तब इनके होने के कोई अर्थ नहीं हैं. लेकिन यह जाहिर सच्चाई है कि व्यवस्था और कानून दोनों आजआम आदमी से दूर हो गए हैं और दिन -प्रतिदिन और दूर होते जा रहे है. कानून के दायरे में न्याय हासिल करना इतना महंगा और जटिल हो गया है कि आम आदमी इससे दूर ही रहना चाहता है. न्याय पाने की जिद में बर्बाद हुए लोगों की कहानियां,हमारे फ़िल्मी पटकथाओं की पसंदीदा विषय वस्तु रही है.


और यह सब कोई आज से नहीं है. महात्मा गाँधी ने 1909 में ही अपनी विचार पुस्तिका 'हिन्द -स्वराज ' में यूरोपीय तर्ज़ वाली इस न्यायपालिका पर सवाल उठाये थे और इसे भारत की गुलामी का एक कारक बतलाया था. भारत की पारम्परिक न्याय प्रणाली जनता द्वारा निर्वाचित होती थी. पञ्च अथवा न्यायकर्ता में दोनों पक्षों का विश्वास आवश्यक होता था. लेकिन यूरोपीय न्याय व्यवस्था,जो इस मुल्क में अंग्रेजों के द्वारा स्थापित हुई, मनोनयन द्वारा जजों की स्थापना करती थी. ऐसा समझा जाता था कि ये मनोनीत लोग इतनी ऊँची नैतिकता और दृष्टिकोण के होंगे कि संकीर्णताओं की उपेक्षा करेंगे. जिन दिनों देश में समाज सुधार आंदोलन चल रहे थे, इन अदालतों की प्रासंगिकता बढ़ गई थी. समाज सुधार स्वप्नजीवी और भविष्यद्रष्टा सामाजिक दार्शनिकों द्वारा उठाया गया कदम था. लोक मान्यताओं से उनकी कड़ी टक्कर थी. सती प्रथा,विधवा विवाह, बाल विवाह आदि के प्रश्न पर समाज सुधारक प्रचलित लोक मान्यताओं से जूझ रहे थे. यही कारण था जन नेताओं और समाज सुधारकों में भी कई दफा आपसी टकराव हुए. ऐसे में मनोनयन वाली अदालतों की प्रासंगिकता समाज सुधारकों और प्रगतिशील तबकों में बढ़ी. डॉ आंबेडकर पंचायती राज व्यवस्था से इसी कारण सहमत नहीं थे. इन पंचायतों द्वारा आधुनिक विचारों के प्रसार में बाधा होने की आशंका थी. यह दो परस्पर विरोधी मान्यताओं का संघर्ष था, जिसमे न्यायपालिका आधुनिकता और प्रगतिशीलता की पक्षधर मानी जाती थी. उद्देश्य समान कानून से पूरे देश के जनमन को एक सूत्र में बांधना भी था. इस तरह यह हमारे राष्ट्रवाद के आंदोलन में भी सहायक था. इसके द्वारा हमने धीरे -धीरे मनुवादी -मुल्लावादी मिज़ाज़ से भी अपनी दूरी बनाई.


लेकिन स्वतन्त्र भारत में आधुनिकता का लबादा ओढ़कर एक खास तबके ने धीरे -धीरे इस तंत्र पर अपना कब्ज़ा बनाना शुरू किया और अंततः वह सफल हो गए. आम नागरिक और आम जन इससे दूर होते चले गए. यहाँ तक कि इस तंत्र पर वर्गीय -वर्णीय वर्चस्व की भी बात उठी ,और उसमे बहुत हद तक सच्चाई भी है. इसलिए आज समय का तकाज़ा है कि शिद्दत के साथ इस पूरी व्यवस्था पर विचार किया जाए और तदनुरूप आवश्यक सुधार किये जाएँ. कुछ लोग यह मानते हैं कि इस व्यवस्था में आरक्षण का प्रावधान कर देने से इसकी खामियां ख़त्म हो जाएँगी,तो शायद वे सही नहीं हैं. जिन व्यवस्थाओं में सामाजिक आरक्षण के प्रावधान हैं, वहां भी सब कुछ ठीक नहीं है. न्यायपालिका को कहीं अधिक सुधार की दरकार है. मुल्क में जनतंत्र की सलामती के लिए यह आवश्य्क है. इसलिए मैं उनलोगों में शामिल हूँ,जो 12 जनवरी के प्रेस -प्रकरण को सकारात्मक समझ रहे हैं.

(जनवरी 2018 )फोटो साभार 


Share On Facebook
  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :