समुद्र तट पर बरसात

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समुद्र तट पर बरसात

अंबरीश कुमार
सुबह के नौ बजे थे. मौसम ख़ुशगवार था. काले बादल घिर चुके थे. बूंदे भी पड़ रही थीं .रिसार्ट का यह रेस्तरां ठीक सागर के सामने है और जहाज के डेक की तरह लगता है .यह कलंगूट समुद्र तट है .पच्चीस साल पहले भी आना हुआ था. इसी कलंगूट रेजीडेंसी रिसार्ट में रुका था .यह गोवा सरकार के पर्यटन विभाग के अधीन है .पर्यटन विभाग ने हर समुद्र तट के साथ मुख्य शहरों में अपने होटल रिसार्ट खोल रखे हैं. इनमें मीरमार और कलंगूट पर ज्यादा भीड़ रहती है .कलंगूट समुद्र तट भी बहुत बादल गया है. सामने के कैशुरिना के जंगल अब छंट चुके हैं तो काटेज के सामने नारियल, सुपारी और काजू के पेड़ काफी बड़े हो चुके है .पीछे की तरफ लगे आम अब लाल हो रहे थे. सुपारी के फल के गुच्छे नजर आ रहे थे .पहले यह रिसार्ट मध्य वर्ग का
पसंदीदा था. पर अब गोवा सरकार ने इसकी सुविधा बढ़ाते हुये महंगा भी कर दिया है. अब यहां का हर काटेज वातानुकूलित है. अगर पहले से बुकिंग न हो तो यहां जगह मिलना भी मुश्किल है .बाहर निकले तो सामने लाइफ गार्ड लिखी जीप नजर आई तो समुद्र तट पर सैलानियों की निगरानी के लिये बना गार्ड रूम भी. यह दो मंजिला ऊंचाई पर था .यह व्यवस्था पहले नहीं थी. हाल के सालों में सैलानियों के समुद्र में डूबने की बढ़ती घटनाओं के बाद यह पहल हुई है .शाम होते ही गार्ड रूम से सैलानियों को चेतावनी देने का काम शुरू हो जाता है. उन्हें समुद्र में ज्यादा गहरे जाने से मना किया जाता है. बाद में जीप
पर बैठे तैराक भी रुक-रुक कर तट से समुद्र में दूर तक जाने वाले युवको को पीछे ले आते है .अब यह व्यवस्था सभी समुद्र तट पर नजर आती है .यह वही कलंगूट समुद्र तट है जो सत्तर के दशक में हिप्पियों के चलते चर्चा में आया था .विदेशी युवक युवतियों के नशे के शौक के साथ नग्नता के चलते यह तट बदनाम हुआ .जिसके बाद यहां प्रशासन ने कड़ाई बरती और जगह-जगह चेतावनी वाले बोर्ड लगाये गये .न्यूनतम कपड़ों में तो आज भी देसी और विदेशी सैलानी दिख जाते हैं. पर अब कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता .शाम का माहौल जरूर किसी विदेशी समुद्र तट जैसा हो जाता है .झोपड़ीनुमा बड़े बड़े रेस्तरां तट के ठीक सामने अपनी कुर्सियां मेज और आरामदेह इजी चेयर भी सजा देते हैं. .हम भी एक टेबल के सामने रखी कुर्सी पर जम गये .बहुत मोटा सा मीनू देखने की बजाय सीधे वेटर से काफी लाने को कहा तो जवाब मिला ,सर शाम को चाय काफी नहीं मिलता है .हार्ड ड्रिंक देते है .यह अजीब समस्या थी. सामने सूरज डूब रहा था. हवा भी ठंडी थी .काफी का मन था. पर यहां के हिसाब से उसका समय नहीं था.
गोवा के इस समुद्र तट पर दोपहर बाद से ही यह सुविधा शुरू हो जाती है .इसके बाद मीनू पर नजर डाली तो समुद्री व्यंजन ही नजर आये. किंग प्रान ,लोबस्टर से लेकर पाम्फ्रेट और क्रैब यानी केकड़ा तक .उत्तर का हम लोगों का खानपान इस तरह का नहीं है कि सूर्यास्त के समय इस तरह के सामिष व्यंजन ले सके लिहाजा उठ गया. अंबर से कहा कि बाजार की तरफ जा रहा हूं चाय या काफी पीनी है .
कलंगूट का बाजार भी बादल रहा है. पहले स्थानीय लोगों के छोटे-छोटे रेस्तरां थे. पर अब देश के हर बड़े शहर की तरह फास्ट फूड के बहुराष्ट्रीय ब्रांड यहां भी आ गये है. पर गुजराती ,बंगाली और उत्तर भारतीय लोगों अपने अंचल के खानपान वाली जगहों को तलाश लेते हैं. दक्षिण भारतीय और कोंकण के सामिष-निरामिष व्यंजन आसानी से मिल जाते हैं .गोवा के समुद्र तटों पर जो रेस्तरां हैं उनमें समुद्री व्यंजन पर ज्यादा जोर रहता है. विदेशियों के लिए भले ही कांटिनेंटल व्यंजन मौजूद हों पर बाकी खानपान पर कोंकणी और पुर्तगाली असर नजर आता है .सब्जी से लेकर मछली तक में नारियल और खटाई के लिए कोकम का ज्यादा इस्तेमाल होता है .गोवा के लोगों के रहन-सहन और खानपान पर अभी भी कोई ज्यादा बदलाव नहीं दिखता है .पर यह राज्य बदल रहा है.


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