पत्रकारिता ने सवाल पूछने बंद कर दिये!

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पत्रकारिता ने सवाल पूछने बंद कर दिये!

राजेंद्र तिवारी

दो दिन पहले कश्मीर के सोपोर से फोटो लगभग सभी अखबारों ने पहले पेज पर छापा. दो फोटो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने राजनीतिक निशानेबाजी के साथ ट्वीट किये. फोटो था मृत नाना के पेट पर बैठे तीन साल के आयद का. फोटो सोपोर के मॉडल टाउन चौक का था, जहां आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर फायरिंग की और सीआरपीएफ का कहना है कि इसी फायरिंग में आयद के नाना बशीर अहमद खान मारे गये. डॉ संबित पात्रा ने इस फोटो को प्रश्न चिन्ह के साथ पुलित्जर लवर्स लिख कर ट्वीट किया.

अब सवाल यह है कि हमारे मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर अखबारों ने इन फोटो और ट्वीट को कैसे ट्रीट किया? अधिकतर अखबारों ने अपने मृत नाना के पेट बैठे आयद या फिर उसी सीक्वेंस का दूसरा फोटो छापा है, जिसमें आयद पास में पोजीशन लिये जवान की ओर बढ़ता दिखायी दे रहा है और जवान उसे रोक रहा है. फोटो को लगभग हर किसी ने आतंकवाद के घिनौने चेहरे से जोड़ा है. क्या ये फोटो इतने भर ही थे? क्या ये फोटो कश्मीर के दर्द के फोटो नहीं थे? फिर, किसी ने फोटो को कश्मीरी लोगों की जिंदगी के साथ क्यों नहीं जोड़ा? दूसरी बात, फोटो परिचय में दी गई स्टोरी में भी दोनो पक्ष नहीं हैं. और तीसरी बात, यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि क्या किसी ने आयद को अपने नाना के मृत शरीर पर बैठाया या तीन साल का बच्चा खुद फायरिंग की आवाजों के बीच जाकर बैठ गया. एक फोटो जो कई अखबारों ने छापी है, वह इस संशय को बढ़ाने वाली ही है. यह फोटो है लाश के पास में पोजीशन लिये जवान की जो इस बच्चे को अपने पास आने से रोक रहा है. पेट पर बैठे आयद की फोटो के फ्रेम में वह जवान नहीं दिखायी देता है.

पुलित्जर लवर्स वाले ट्वीट पर भी टेलीग्राफ को छोड़कर बाकी अखबारों ने कोई ध्यान नहीं दिया. यह एक महत्वपूर्ण इश्यू था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्तारूढ़ व सबसे बड़ी पार्टी का महत्वपूर्ण प्रवक्ता इस फोटो में छिपी त्रासदी को लेकर इतना क्रूर और निष्ठुर भी हो सकता है? यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी पार्टी का प्रवक्ता अपने नागरिकों को लेकर इतनी क्रूरता का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहा हो तो इसे देश-समाज के लिए कैसा संकेत माना जाना चाहिए?

पूरी खबर सबको पता है, इसलिए मूल खबर पर नहीं जाते हैं। शुक्रवार को इस घटना का फॉलोअप आया है कोलकाता के अखबार टेलीग्राफ में. श्रीनगर से मुजफ्फर रैना की रिपोर्ट है।  रिपोर्ट में बताया गया है कि सोपोर में मारे गये बशीर अहमद खान की पत्नी फारुका खान पुलिस अधिकारी थीं और 2017 में रिटायर हुईं. फारुका खान की बहन कौशर जहां भी पुलिस इंस्पेक्टर हैं. बशीर का छोटा बेटा सुहैल जामिया में पीजी कर रहा है. इस रिपोर्ट में आयद के वीडियो की चर्चा की गई है। इस वीडियो में आयद से एक आवाज पूछ रही है - बड़े पापा थे ना सुबह आप के साथ?  उनको क्या किया? आयद जवाब देता है - गोली. वह कहता है कि वो मर गिया था. किसने मारा, के जवाब में वह कहता है - पुलिसवाले ने ठक-ठक किया.

बशीर को गोली सामने से सीने पर लगी और पीठ से पार हो गई. जबकि सीआरपीएफ के अतिरिक्त महानिदेशक जुल्फिकार हसन का कहना है कि बशीर जब कार से बच्चे को बाहर निकाल रहे थे, उसी समय आतंकवादी की गोली उनकी पीठ में लगी. हम सब घटनास्थल पर गये थे और वहां जितने एंगल हो सकते थे, उन सब एंगल से देखा. तकनीकी रूप से हमें स्पष्ट है कि बशीर की मौत आतंकवादी की गोली से हुई है.अगर कोई पूरी स्टोरी पढ़ेगा और सोशल मीडिया पर चले फोटो व वीडियो देखेगा तो उसके दिमाग में भी कई सवाल खड़े होंगे? अखबारों में इन बातों की कोई चर्चा न होना क्या साबित करता है? क्या पत्रकारिता ने वाकई सवाल पूछने बंद कर दिये हैं?


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