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ओपी के सिर पर भाजपा की टोपी
राजकुमार सोनी 
रायपुर .अपने ओपी ने भाजपा की टोपी पहनने की पूरी तैयारी कर ली है.हालांकि जानकारों का मानना है कि जब वे भारतीय प्रशासनिक सेवा ( आईएएस ) के अफसर थे तभी उनका झुकाव भगवा रंग के प्रति हो गया था.आम आदमी पार्टी के संयोजक संकेत ठाकुर का कहना है कि ओपी के भगवा प्रेम के चलते ही उन्हें और उनके साथियों को बिलावजह पन्द्रह दिनों तक जेल में रहना पड़ा था.उनके भगवा प्रेम के और भी कई किस्से अब हवा में तैर रहे हैं.बहरहाल ओपी के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में यह चर्चा चल पड़ी हैं कि राजनीति में उनका प्रवेश सही है या गलत? बहरहाल उनके फेसबुक वॉल पर जो  टिप्पणियां आ रही है उन्हें देखकर तो लग रहा है कि ज्यादातर लोग उनके फैसले से खफा हैं.लोगों का मानना है कि नेता तो हर गली-मुहल्ले में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो जाते हैं, लेकिन कोई भी शख्स कलक्टर या एसपी बड़ी मेहनत के बाद बनता है सो उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा का पद नहीं छोड़ना चाहिए था.भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए तैयारी कर रहे एक विद्यार्थी की प्रतिक्रिया है- जब आगे चलकर  मुझे नेता ही बनना है तो फिर आईएएस की तैयारी क्यों करूं? लोग यह मान रहे हैं कि ओपी साहब प्रशासनिक सेवा में रहते हुए ज्यादा बेहतर ढंग से समाज की सेवा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने लोगों की भावनाओं के खिलाफ जाकर उस राजनीति में जाना जरूरी समझा जिस पर से लोगों का भरोसा उठ गया है.लोगों को लग रहा है कि उन्होंने अपने मां-बाप के सपनों का भी गला घोंट दिया है.टिप्पणीकारों ने लिखा है- ओपी साहब ने गलत किया.राजनीति एक दलदल है और वे जानबूझकर दलदल में चले गए हैं.
 
बहुत से लोग इन टिप्पणियों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं कि उन्हें राजनीति में नहीं आना चाहिए था.बहुत से लोग यह मानते हैं कि राजनीति में तो आना ही चाहिए.लेकिन किस तरह की राजनीति में? और किस दल की राजनीति में? राजनीति में प्रतिबद्धता और कमिटमेंट का एक मतलब होता है.यह तो तय करना ही होगा कि आप कहां खड़े होने जा रहे हैं? और आपकी अपनी प्रतिबद्धता किसके साथ है? प्रदेश में माओवाद के खात्मे के नाम पर बेगुनाह आदिवासियों और बच्चों को मौत के घाट उतारा जा रहा है.असहमति दर्ज करने वाले जेल में ठूंसे जा रहे हैं.सत्ताधारी दल से जुड़े हर व्यक्ति ने अकूत संपत्ति अर्जित कर ली है.किसी का विदेश में खाता है तो किसी ने मुबंई, कलकत्ता और बैंगलोर में बेहिसाब संपत्ति खड़ी कर ली है.प्रदेश के ढ़ाई सौ से ज्यादा पत्रकारों पर जुर्म दर्ज है.असहमति प्रकट करने का मतलब अपराधी हो जाना हो गया है.खनिज संसाधनों की लूट मची है.प्रदेश में भूख है.गरीबी है.बीमारी है.नौजवानों के हाथों में काम नहीं है.आखिरकार कहां है आप? किसके साथ है? अगर आप लूटतंत्र का हिस्सा बनने जा रहे हैं तो क्या आपका ढोल- मंजीरा बजाकर स्वागत होना चाहिए?
 
इन सबके बावजूद भी बहुत से लोग आशावादी है.आशावादी होने की उनकी मजबूरी है क्योंकि वे भक्त है.जो थोड़े बहुत तटस्थ है और सुबह से लेकर शाम तक फेसबुक और वाट्स अप विश्वविद्यालय की विशेष कक्षाएं अटैंड करते हैं वे यह मानकर चल रहे हैं कि अगर देश की राजनीति  गंदी और उसमें शामिल ज्यादातर लोग टुच्चे किस्म के हैं तो ऐसे व्यक्ति को नाले में अवश्य उतरना चाहिए जो फावड़ा लेकर गंदगी साफ कर सकें.ऐसे लोगों को लगता है कि ओपी साहब एक न एक दिन राजनीति में फावड़ा जरूर चलाएंगे.फावड़ा नहीं तो कम से कम बेलचा अवश्य चलाएंगे.बहुत से लोग उन्हें नाले में उतरते हुए देखना चाहते हैं.बहरहाल यह देखना तो दिलचस्प तो होगा ही कि वे नाले की सफाई किस तरह से करते हैं? नाला साफ करते-करते कहीं वे यह न कह बैठे- बहुत हो गया यार... गंदगी नथुनों में घुस गई है.
 
बहुत से लोग यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि जो नेता सड़क- पानी- बिजली की समस्या को लेकर ओपी साहब  के कलक्टर कार्यालय में ज्ञापन देने आते थे अब खुद ओपी साहब पान-गुटखा चबाने और रात को देसी ठर्रा चढ़ाने वाले मंडल अध्यक्षों के साथ आंदोलन करते नजर आएंगे.अगर पानी के लिए आंदोलन हुआ तो लोग उन्हें खाली मटकों के साथ देखना चाहते हैं.अगर आंदोलन सड़क के लिए हुआ तो डामर के साथ देखेंगे.भाई... अगर राजनीति करनी हैं तो मंडल अध्यक्षों- वार्ड पार्षदों, दरी बिछाने और दरी लपेटने वाले कार्यकर्ताओं को खुश रखना ही होगा.इस बात से खुश होना चाहिए कि अब ओपी साहब जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ पसीना बहाते हुए नजर आने वाले हैं.वहीं पसीना जो पूर्व आईएएस अजीत जोगी की सालों से बहा रहे हैं।
 
 मजे की बात यह है कि कुछ लोग उनमें अजीत जोगी की छवि भी देख रहे हैं.लोगों को लग रहा है कि वे नए ढंग के अजीत जोगी बन सकते हैं.अजीत जोगी ने अपने कार्यकाल में कभी फसल चक्र परिवर्तन कार्यक्रम चलाया था.कहीं जोगी डबरी बनवाई थी.लोगों को लगता रहा कि ओपी साहब भी डबरी-शबरी तो बनवाएं ही.फिलहाल उनके धरातल से जुड़कर काम करने की सोच  पर लोग गंभीर सवाल उठा रहे हैं और स्वागत भी कर रहे हैं.उनके बारे में यह प्रचारित है कि वे नया-नया प्रयोग करते रहे हैं सो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि हिन्दुत्व की प्रयोगशाला के रूप में विख्यात भाजपा और उसकी  राजनीति में ओपी साहब भी कुछ ने ढंग का अनुष्ठान करेंगे।
 
फेसबुक पर एक टिप्पणी देख रहा था.लिखने वाले ने लिखा है- एक  कलक्टर नेता बन सकता है मगर... एक नेता आईएएस नहीं बन सकता है.बात तो सही है, लेकिन लिखने वाले को शायद यह नहीं मालूम है कि एक नेता दस- बीस आईएएस को अपने बगल में दबाकर घूमता है.ज्यादा दूर मत जाइए... छत्तीसगढ़ को ही देख लीजिए.यहां के अधिकांश अफसर.... नेताओं के तलवे चाटकर और गलत- सलत काम करके  किस ढंग से बिल्डिंग पर बिल्डिंग खड़ी कर रहे हैं यह किसी से छिपा हुआ नहीं है.कोई लड़कियों से बलात्कार कर रहा है तो कोई दहेज मांग रहा है.छत्तीसगढ़ के बारे में यह भी मशहूर है कि यह प्रदेश सेवानिवृत्त अफसरों का गढ़ बना दिया गया है.कुछ लोग छत्तीसगढ़ को सेवानिवृत्त अफसरों का वृद्धाश्रम भी कहते है.भाड़ में जाए युवा....उन्हें नौकरी मिलती हैं तो ठीक और नहीं मिलती हैं तो क्या सरकार ने उनके पुनर्वास का ठेका ले रखा है? पुर्नवास तो उनका करना है जो लंबे समय से पदस्थ थे और मलाई खाने- खिलाने की कला जानते है.वे अफसर भी यहां फल-फूल रहे हैं जो हत्या को हलाल में बदलने की कला जानते हैं.लोग कह रहे हैं कि ओपी साहब ने वक्त की नजाकत को भांपकर समय से पहले ही अपना पुर्नवास कर लिया है.
 
फेसबुक पर एक नारा देख रहा था- छत्तीसगढ़ का कौन खेवइया... ओपी भैया-ओपी भैया.पहले यह नारा विद्या भैया के लिए लगता था.अब ओपी के पीछे भैया जुड़ गया है .लिखने वाले तो यह भी लिख बैठे हैं कि ओपी को मुख्यमंत्री चाहिए.टिप्पणियों को देखकर लग रहा है कि लोग नया मुख्यमंत्री चाहते हैं और जनता ओपी को छत्तीसगढ़ का अरविन्द केजरीवाल बनते हुए देखना चाहती है।
 
 किसी ने फेसबुक पर यह खुलासा भी किया है कि कुछ राजनेताओं और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों ने मिलकर ओपी को बलि का बकरा बना दिया है.कुछ ने लिखा है कि उनका निर्णय खुद को बम लगाकर उड़ा देने वाला है.बहुत से लोगों का मानना है कि जब ओपी साहब ने टोपी पहन ही ली तो उन्हें कुछ दिन टोपी पहनकर ठीक ढंग से नाचने का मौका  देना ही चाहिए.नए छोकरे और खासकर युवा जब टोपी पहनते हैं तो स्मार्ट लगते हैं.आपको याद होगा जब अन्ना हजारे ने आंदोलन किया था तो कितने मस्त-मस्त युवा- मैं हूं अन्ना के स्लोगन वाली टोपी पहनकर सड़कों पर आ गए थे.अब अन्ना किसी एजेंडे के तहत गन्ना खाने चले गए हैं, लेकिन टोपी पहनने और पहनाने का फैशन अभी भी खत्म नहीं हुआ है.ओपी साहब ने अपने मन से टोपी पहनी है या किसी मूर्धन्य ने उन्हें टोपी पहनाई हैं इसका पता तो देर- सबेर चल ही जाएगा, लेकिन लोग टोपी पहनने वाले से इस सवाल का उत्तर तो जानना चाह ही रहे हैं कि भैया... जब पहले से आपने अपनी राजनीतिक निष्ठा जनता के बजाय भगवा रंग के साथ कर ली थी तो काहे लोकसेवक होने का ढोंग करते फिर रहे थे?
 
 ओपी साहब के भगवा चयन से प्रदेश के बहुत से अफसरों की निष्ठा संदेह के दायरे में आ गई है.राजनीति के कुछ धुरंधर खिलाड़ियों का कहना है कि ओपी के चुनाव समर में उतरने से भाजपा के दिग्गज नेताओं की तकलीफें बढ़ गयी है.खबर तो यह भी है कि खरसिया के कई भाजपा नेता नाराज हो गए हैं.इसमें एक दिग्गज मंत्री भी शामिल हैं.अंदरखाने से यह आवाज़ भी उठ रही है कि क्या पार्टी में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कमी हो गयी है? जो भी पैराशूट पहनकर उतरेगा... क्या वही नेता बन पाएगा?
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