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एक थीं जांबाज़ बेगम

फ़िरदौस ख़ान

आज हम आज़ाद मुल्क में रह रहे हैं, जिसे ब्रिटिश हुकूमत की ग़ुलामी से निजात दिलाने के लिए इस सरज़मीं के बाशिन्दों ने अपनी जानें तक क़ुर्बान कर दीं. देश की आज़ादी में महिलाओं का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है. इन्हीं जांबाज़ वीरांगनाओं में से एक हैं बेगम हज़रत महल. वे अवध के नवाब की पहली पत्नी थीं. उन्हें 1857 की क्रांति के क्रांति नेतृत्व के लिए जाना जाता है. बेगम हज़रत महल रानी थीं. दुनिया का हर ऐशो-आराम उन्हें मिला हुआ था, लेकिन जब देश की आज़ादी की बात आई, तो उन्होंने रेशमी लिबास उतारकर फ़ौजी जामा पहन लिया. हीरे-जवाहारात के ज़ेवरों की बजाय हथियारों को चुन लिया. फ़ौजियों की हिम्मत बढ़ाने के लिए वे ख़ुद जंग के मैदान में उतर गईं. उन्होंने दिन-रात मैदाने-जंग में अंग्रेज़ी फ़ौज से लोहा लिया. जंगे-आज़ादी में उनके महत्वपूर्ण योगदान को, उनकी क़ुर्बानी को यह देश कभी नहीं भूल सकता.
बेगम हज़रत महल का नाम मुहम्मदी ख़ानम था. उनका जन्म 1820 में अवध राज्य के फ़ैज़ाबाद में हुआ था. उनके माता-पिता बहुत ग़रीब थे. उन्होंने अपनी बेटी को एक दलाल के हाथों बेच दिया. उसने उन्हें शाही हरम के एक दलाल को बेच दिया. वे नर्तकी के तौर पर शाही हरम में शामिल हुईं. वे ग़ज़ब की नर्तकी थीं. उन्हें परी नाम दिया गया,लेकिन वे महक परी नाम से मशहूर हुईं. एक दिन नवाब वाजिद अली शाह की नज़र उन पर पड़ी. उन्होंने महक परी को अपने शाही हरम में शामिल कर लिया. वे ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ बुद्धिमान भी थीं. नवाब उनके विनम्र स्वभाव, बुद्धिमत्ता और सुंदरता से बहुत प्रभावित थे. यह उनका नसीब था, उनकी क़ाबिलियत ही थी कि वे नर्तकी से बेगम बन गईं. वे वाजिद अली शाह की पहली पत्नी बनीं. वाजिद अली शाह ने उन्हें ’हज़रत महल’ का ख़िताब दिया था. उनके यहां एक बेटा हुआ, जिसका नाम बिरजिस कादिर रखा गया. इस तरह वे राज माता भी बन गई थीं.
 
1857 में वाजिद अली शाह लखनऊ के नवाब बने. उस वक़्त डलहौजी भारत का वायसराय था. उसने नवाब को हटाने के लिए साज़िशें रचनी शुरू कीं. उसने नवाब पर विलासी होने का इल्ज़ाम लगाकर रियासत को अपने क़ब्ज़े में लेने की सोची. ईस्ट इंडिया कंपनी का एक संदेशवाहक एक पत्र लेकर नवाब के पास पहुंचा, जिसके तहत पूरी रियासत कंपनी के अधीन हो जाती. नवाब ने समझौते पर हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया. नतीजतन ईस्ट इंडिया कंपनी ने  नवाब को नज़रबंद करके कलकत्ता भेज दिया. उस वक़्त देश में जंगे-आज़ादी की क्रांति की आग हर तरफ़ फैली हुई थी. लोग अंग्रेज़ी शासन की ग़ुलामी से आज़ादी चाहते थे.
 
 
लखनऊ में 1857 की क्रांति की अगुवाई बेगम हज़रत महल ने की थी.  वे बेहतरीन रणनीतिकार और कुशल योद्धा थीं. विरोधी भी उनकी नेतृत्व क्षमता के क़ायल थे. अपने नाबालिग़ बेटे बिरजिस क़ादिर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेज़ी फ़ौज से ख़ुद मुकाबला किया. उनमे संगठन की अभुतपूर्व क्षमता थी और इसी वजह से उनकी एक आवाज़ पर अवध की फ़ौज,  ज़मींदार, किसान और अवाम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई. 7 जुलाई 1857 से अवध का शासन बेगम हज़रत महल के हाथ में आ गया. उस वक़्त क्रांति मेरठ तक फ़ैली हुई थी. मेरठ के सैनिकों ने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह से मुलाक़ात की. बहादुर शाह और ज़ीनत महल ने उनका साथ दिया और आज़ादी का ऐलान किया गया. बेगम हज़रत महल ने फ़ौज को जौनपुर और आज़मगढ़ पर हमला करने का आदेश दिया, लेकिन फ़ौजी आपस में ही उलझ गए. अंग्रेज़ों ने सिखों और राजाओं को ख़रीद लिया. इसकी वजह से यातायात के संपर्क टूट गए. उधर नाना साहेब यानी नाना राव पेशवा को भी हार का सामना करना पड़ा. अंग्रेज़ों ने 21 मार्च को लखनऊ को अपने अधीन कर लिया. इसके बाद  बेगम हज़रत महल के हुजरे पर भी उन्होंने क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन वे अंग्रेज़ों की हाथ नहीं लगीं. क्योंकि पहले ही वे महल छोड़कर जा चुकी थीं.  रियासत छिन जाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानीं. आलमबाग़ की लड़ाई के दौरान उन्होंने हाथी पर सवार होकर जंग की. उन्होंने कई जगहों पर मौलवी अहमदशाह की भी मदद की थी.
 
 
लखनऊ के पतन के बाद 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया ने ऐलान किया कि  उन्होंने भारत में  ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन ख़त्म करके उसे अपने हाथ में ले लिया है और वह सबको सम्मान देंगी. लेकिन बेगम हज़रत महल ने इसका विरोध किया. वे लखनऊ छोड़कर गांव-देहात में चली गईं और उन्होंने वहीं से जंगे-आज़ादी जारी रखी. उनकी फ़ौज में महिलाएं भी शामिल थीं. लखनऊ में उनकी महिला सैनिक दल की कमान रहीमी के हाथ में थी, जिसने महिलाओं को तोप और बंदूक़ चलाना सिखाया. लखनऊ की तवायफ़ों ने भी उनकी ख़ूब मदद की. तवायफ़ हैदरीबाई के पास अंग्रेज़ अफ़सरों का आना-जाना था. अकसर वे आपस में क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ योजनाओं पर बात किया करते थे. हैदरीबाई अहम ख़बरों को क्रांतिकारियों तक पहुंचाया करती थी. बाद में वह भी रहीमी की फ़ौज में शामिल हो गई थी.
बेगम हज़रत महल ने अपनी पूरी ताक़त से अग्रेज़ों से मुक़ाबला किया, लेकिन विशाल अंग्रेज़ी फ़ौज से जीत न पाईं और 1859 में नेपाल चली गईं. उन्होंने अपनी बाक़ी उम्र वहीं गुज़ारी. 7 अप्रैल 1879 में उनकी मौत हो गई. उन्हें नेपाल की राजधानी काठमांडू में जामा मस्जिद के पास दफ़नाया गया. बाद में उनकी पर एक मक़बरे की तामीर की गई.
 
ग़ौरतलब है कि 15 अगस्त 1962 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हज़रतगंज स्थित पुराने विक्टोरिया पार्क में आज़ादी की पहली लड़ाई में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया गया था. उनकी याद में पार्क का नाम बदलकर उनके नाम पर रखा गया था. नाम बदलने के साथ-साथ यहां एक संगमरमर का स्मारक भी बनाया गया था. बेगम हज़रत महल पार्क में रामलीला, दशहरा और लखनऊ महोत्सव जैसे समारोहों का आयोजन भी किया जाता है. इसके बाद 10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था. केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था 'मौलाना आज़ाद एजुकेशन फ़ाउंडेशन' द्वारा मेधावी छात्राओं के लिए उनके नाम पर 'बेगम हज़रत महल राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना’ चलाई जा रही है. फ़ुटबॊल में उनके नाम पर बेगम हज़रत महल कप भी है, जो विजेता खिलाड़ियों को दिया जाता है.
पिछले साल 7 अप्रैल को उनकी 138वीं पुण्यतिथि पर नेपाल में भारत के राजदूत मंजीव सिंह पुरी ने उनकी क़ब्र पर श्रद्धसुमन अर्पित किए. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बेगम हज़रत महल के योगदान को याद करते हुए कहा कि 1857 का स्वतंत्रता आंदोलन भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और बेगम हज़रत महल जैसी वीरांगनाओं से मिली प्रेरणा के कारण ही हम अब आज़ाद हैं. 
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