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मै संघी बनते बनते रह गया !

अंबरीश कुमार 

यह एक रोचक किस्सा है .कैसे बच्चों का दिमाग प्रदूषित किया जाता है और क्या से क्या बन जाते है .बहुत छोटा था .साठ का दशक .पापा सीडीआरआई में इंजीनियर थे .मुंबई से भाभा एटामिक एनर्जी जैसे संस्थान की नौकरी दादी के निधन में न पहुंच पाने के ताने की वजह से छोड़ के आये थे .लखनऊ के टैगोर मार्ग पर आर्ट्स कालेज से लगी कालोनी में पहला नंबर का घर अपना था आर्ट्स कालेज के आगे नदवा कालेज था और तब आर्किटेक्ट विभाग होता था आर्ट्स कालेज का .मंकी ब्रिज घुमावदार था और अमलतास के पेड़ों से घिरा था .घर में .आगे लान पीछे किचन गार्डन और बगीचा जिसमे मुझे अक्सर जोत दिया जाता था .जो मेरे पुराने साथी हैं सब उस घर में आये हैं .सामने गोमती और तब मंकी ब्रिज हुआ करता था जिसके नीचे चौदहवी का चांद जैसी फिल्म की शूटिंग हो चुकी थी .अपने घर में महात्मा गांधी की आदमकद फोटो थी शीशे में मढ़ी हुई .इसलिए उसे सीमेंट की खुली आलमारी के सबसे ऊपर के हिस्से में रखा जाता था .वह बड़ी फोटो पापा रेलवे की नौकरी के समय से संभाल कर रखते थे .वैज्ञानिक ,रिसर्च असिस्टेंट ,क्लर्क से लेकर असिस्टेंट डाइरेक्टर तक उस कालोनी में रहते थे .उनमे एक अंकल से करीबी रिश्ता था .अमूमन शाम को आ जाते .अपना परिवार अन्य मध्य वर्ग परिवारों की तरह कांग्रेसी था तब .पर एक अंकल जब भी आते वे गांधी की फोटो देख चिढ़ते और बोलते इसने तो देश बांट दिया ठीक किया गोडसे ने जो मार दिया .बच्चे थे पर बात तो सुनते ही रहते थे .धीरे धीरे दिमाग बन गया और उस फोटो से चिढ पैदा हो गई .सामने एक सरदारजी का बेटा बब्बू अपना साथी था .चिलबिल के बीज निकालने ,जंगल जलेबी तोड़ने से लेकर आम तोड़ने तक साथ देता था .अपने को पापा ने एक खिलौने वाली बंदूक दी थी जिसमे कार्क लगाकर निशाना लगाया जाता था .अपन ने बब्बू से कहा ,हम भी गोडसे बनेंगे और इस शीशे की फोटो को तोड़ देंगे .साजिश बनी और खिड़की के पास से निशाना लिया गया .कार्क की जगह कंचे की गोली डाल दी गई .जैसे ही ट्रिगर दबाया फोटो का शीशा तेज आवाज के साथ टूट कर फर्श पर आ गया .मम्मी भी दौड़ कर आई और देख कर हैरान .पिटाई ठीक से की .शीशा साफ़ किया गया .शाम को आये पापा ,उन्हें बताया गया तो उन्होंने फिर बिना मुरव्वत और ठीक से पीटा.फिर पूछा गया कि यह किया क्यों तो मैंने बताया अंकल ही तो रोज रोज कहते थे ,गोडसे ने ठीक किया .यह सुनकर उनका पारा और चढ़ गया .एक रूल लेकर फिर पिटाई की ,कहा तू गोडसे बनेगा ,मूर्ख ,बौड़म ,वे तो आरएसएस के हैं अफवाह फैलाकर बेवकूफ बनाते है .समझ नहीं आया तो रात में मम्मी से पूछा की ये आरएसएस क्या होता है .वे भी बहुत ज्यादा नहीं जानती थी गोरखपुर के बडहल गंज के पास के गांव मरवट की थी मम्मी .स्कूल तक की शिक्षा हुई .आगे पढ़ाने का कोई प्रचलन भी नहीं था .हालांकि मेरी सारी किताबे पढ़ जाती थी हिंदी वाली .गांव की थी पर ये जानती थी कि गांधी को इन लोगों ने मारा था .बहरहाल अब मै सतर्क था .मै तो पीटा ही गया बब्बू के घर वालों ने उसकी भी पिटाई की .उस घटना के बाद उन अंकल ने बहुत कोशिश की आगे कुछ समझाने की पर मै और बब्बू दोनों तय कर चुके थे इन आरएसएस वालों के चक्कर में फिर नहीं फंसना है .उसके बाद कभी फंसे भी नहीं .शाखा वाले गुरूजी जब आते तो बब्बू पहले ही बता देता ,इनसे दूर रहना है ये फिर फंसा सकते हैं .उस पिटाई ने बचा लिया वर्ना मै भी कोई बड़ा प्रचारक तो बन ही जाता . बहरहाल इस कहानी का सिर्फ एक किरदार मै ही बचा हूं .न वे अंकल रहे ,न पापा रहे न अपना बचपन का मित्र सरदार रहा .बहुत कम उम्र में ही वह दिल के एक वाल्व में छेद होने की वजह से गुजर गया .पर संघ से आगाह कर गया था .
फोटो -उस घर (नीचे वाला )की कुछ समय पहले की फोटो .अब बगीचा पाट दिया गया है और पक्की बाउंड्री बना दी गई है .हरियाली खत्म हो गई .वह लान भी जिसमे होली के मौके पर लोग जुटते थे 
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