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सपा और बसपा गठबंधन क्यों मुश्किल

अंबरीश कुमार 

लोकसभा चुनाव की बात शुरू होते ही उत्तर प्रदेश सामने आ जाता है क्योंकि यहीं से भाजपा को वह भारी बहुमत मिला जिसने उसे प्रतिष्ठा के साथ सत्ता में बैठाया . और सत्ता से बेदखल भी वह तभी हो सकती है जब उत्तर प्रदेश से वह बेदखल हो जाए . इसलिए घूम फिर कर निगाह उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हालात पर ही टिकती है .पिछले करीब दो दशक से प्रदेश की राजनीति समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के ही इर्द गिर्द रही है . अपवाद पिछला विधान सभा और लोकसभा चुनाव था . यह दोनों चुनाव मोदी के हिंदुत्व की लहर के चुनाव थे और जीत भी वैसी ही हुई . पर उस लोकसभा चुनाव की लहर में भी समाजवादी पार्टी के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह का पूरा कुनबा जीता और इनके समर्थन पर कांग्रेस का भी कुनबा जीता था . पर समाजवादी पार्टी और बसपा दोनों अलग अलग लड़े थे तब यह हुआ . राजनैतिक टीकाकार मानते हैं कि अगर सपा और बसपा एक साथ होते तो मोदी की वह लहर बीच में ही कहीं दम तोड़ देती . पुराना नारा भी लोग याद दिला देते हैं ,मिले मुलायम -कांशीराम ,हवा में उड़ गए जय श्रीराम .यह मंदिर आंदोलन के दौर की बात थी . पर फिर विवाद हुआ और सपा बसपा जो अलग हुए तो आज तक नहीं मिले . मुलायम सिंह यादव के पार्टी अध्यक्ष रहते तो कोई उम्मीद भी नहीं थी कि ये दोनों दल साथ आ सकते हैं . पर अखिलेश यादव ऐसा संकेत दे देते है . यह बात अलग है कि वे उत्तर प्रदेश में ऐसी टिपण्णी करने की बजाए  मुंबई में यह टिपण्णी करते है कि उनकी मायावती से कोई नाराजगी नहीं है  .वे तीसरे मोर्चे की भी बात करते हैं .
 यह बात अलग है कि वे मायावती को बुआ जी कहकर एक गंभीर मुद्दे को हल्का भी बना देते है . फिर भी अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सबकी निगाह अखिलेश यादव पर ही है . वजह सबसे बड़े सूबे की ताकतवर पार्टी के वे युवा मुखिया हैं . वे राजनीति में लंबी पारी खेलेंगे यह सभी मानते है . ऐसे में केंद्र के स्तर पर वे विपक्षी एकता की धुरी भी बन सकते हैं . पर सारा मामला तो उत्तर प्रदेश पर ही टिका है .
अखिलेश यादव ने प्रदेश में विपक्षी दलों को साथ लाने का प्रतीकात्मक प्रयास ही किया है . ईवीएम मशीन के मुद्दे पर अखिलेश यादव ने बसपा और कांग्रेस को अपनी बैठक में आमंत्रित किया पर दुर्भाग्य से कोई नहीं आया . इससे पार्टी नेतृत्व आहत हुआ और फिर अपने कदम पीछे खींच लिए . पार्टी का मानना है कि अगर वे बार बार गठबंधन की बात करेंगे तो इसका संदेश यह जाएगा कि समाजवादी पार्टी की ताकत नहीं रह गई है कि वह अकेले चुनाव लड़ सके . इसलिए पार्टी लोकसभा की दो सीटों (जो अब हुकुम सिंह के निधन के बाद तीन सीट में बदल  चुकी है )  के चुनाव में भी अकेले जाने की तैयारी कर रही है . वैसे भी बसपा आमतौर पर कोई उप चुनाव नहीं लडती पर अगर वह समर्थन कर दे  तो भी उसका एक राजनैतिक अर्थ होगा .पर बसपा भी खामोश है . 
सपा भी कई सामाजिक मुद्दों पर खामोश रहती है . दलित नेता चंद्रशेखर के मुद्दे पर वह खामोश रही , पता नहीं यह कौन सा समाजवाद था . इस मुद्दे पर तो पार्टी का दलित आधार बढ़ता ही .खैर सपा और बसपा दोनों के साथ दिक्कत यह है कि दोनों वैचारिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं . उन्हें लगता है जातीय गठजोड़ ही वैचारिक कमी को पूरी कर देगा . बसपा में कांशीराम के बाद यह रिक्त्तता आई तो सपा में धीरे धीरे लिखने पढने और शिविर प्रशिक्षण का दौर ही ख़त्म हो गया .इसलिए वैचारिक मोर्चे पर कई तरह की दिक्कत नजर आती है . जब विचार नहीं होगा तो सिर्फ जातीय गठजोड़ पर ही निर्भर भी रहना पड़ेगा . सपा और बसपा के जातीय गठजोड़ जमीनी स्तर पर एक दूसरे के विरोधी है . खासकर दलित और अहीर . इस वजह से कई क्षेत्रों में दोनों दल एक भी हो जाएं तो वोट ट्रांसफर नहीं होते . यही वह तर्क है जिसकी वजह से गठबंधन में दिक्कत आती है . बावजूद इसके अगर दोनों  दल एक साथ चुनाव में उतरे तो तो बड़ी जीत तय है क्योंकि मुस्लिम और एक दो अगड़ी जातियां भी साथ आ सकती है और दलित अहीर वोट कटने के बाद भी काफी मिलेगा ही . पर यह दोनों दल समझ भी नहीं पा रहे है कि अलग अलग लड़ कर दस पंद्रह सीट जीतने से बेहतर है कि साथ लड़कर आधी से ज्यादा सीट हासिल कर सकते हैं . इन दोनों दलों के बीच पहले अहंकार था तो आज भी कोई गंभीर पहल तो नजर नहीं आ रही . न तो अखिलेश यादव राष्ट्रीय स्तर पर खुद से कोई पहल करते हैं न मायावती . समाजवादी पार्टी ने तो गाजियाबाद के आगे की सीमा राम गोपाल यादव को सुपुर्द कर दी है और उस क्षेत्र में कोई दखल भी नहीं देता . मायावती खुद से कभी विपक्षी एकता को लेकर कोई पहल ही नहीं करती . पता नहीं इसे क्यों वे बहुजन के एजंडा में ही नहीं मानती . 
पर अगला लोकसभा चुनाव बहुत निर्णायक होगा . अगर ये दोनों दल अपनी वैचारिक दृष्टि साफ़ नहीं करेंगे तो खुद भी साफ़ हो सकते हैं . कांग्रेस इन्हें जोड़ने की कवायद कर सकती है पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ही सीट बंटवारें में फच्चर लगा सकती है . दो वजह है . एक तो प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर खुद किसी भी कीमत पर सपा के साथ किसी तरह के समझौते के खिलाफ हैं दूसरे यह पार्टी इतनी सीट की मांग करेगी कि गठबंधन होना मुश्किल हो जाए . प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दो सीट मिली थी वह भी सपा के समर्थन से . बिना समर्थन के कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव में कुछ हासिल कर पाएगी यह संभव लगता नहीं . इसलिए गठबंधन ही वह रास्ता है जिससे विपक्ष को ताकत मिल सकती है . 
 
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