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दंगो से मशहूर हुए नए डीजीपी

गिरधारी लाल जोशी

पटना .   यह एक महज संयोग है कि बिहार के बाशिंदें उत्तरप्रदेश के डीजीपी है. और उत्तरप्रदेश के मूल निवासी केएस द्विवेदी बिहार के डीजीपी ओहदे पर .और दोनों ही कड़क. बिहार के पुलिस महानिदेशक के पद पर केएस द्विवेदी की तैनाती की घोषणा से तमाम लगाई जा रही अटकलें ध्वस्त हो गई. उनके नाम की अधिसूचना मंगलवार सुबह पटना में जारी की गई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शनिवार को पुलिस सप्ताह के एक कर्यक्रम में कहा भी था कि सारे कयास फेल होंगे . और वही हुआ. उन्होंने वरीयता का और बिहार में अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने पर  खास गौर किया. केएस द्विवेदी की छवि अपराधियों के लिए काल की रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह फैसला बताता है कि वे बिहार में कानून राज के हिमायती है. ऐसा लोग बोलते है.
          यह दीगर है कि भागलपुर कौमी दंगा इन्हीं के एसपी रहते हुआ. मगर दंगा के पीछे गुंडों पर इनका कसा नकेल न तो  सत्ताधारी राजनेताओं और न ही इनके पोशे हुए शातिर बदमाशों को रास आया. और भागलपुर को दंगा की आग में इन नेताओं और गुंडों ने धकेल दिया. यह बात सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश चंद्र गुप्ता कहते है. इन्हें उम्मीद है कि ये अपनी नई और बड़ी  जिम्मेवारी बखूबी निभाएंगे.
 
         केएस द्विवेदी का पूरा नाम कृपास्वरूप द्विवेदी है. प्यार से इनके आईपीएस मित्र कैस कहकर भी पुकारते है. ये उत्तरप्रदेश के औरैया ग़ांव के मूल निवासी है. इनके पिताश्री नामी वैद्य थे. इनका जन्म 1 फरवरी 1959 में हुआ है. 1984 बैच के बिहार काडर के आईपीएस अधिकारी है. इस दौरान ये  राज्यपाल के एडीसी, सासाराम , भागलपुर , कटिहार बगैरह विभिन्न जिलों के एसपी रहे. आईजी आपरेशन के पद पर पोस्टिंग के वक्त इन्होंने अपने कौशल से नक्सलियों पर नकेल कसी. राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गए. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इनके उत्कृष्ट काम के लिए सम्मानित किया था. फिलहाल ये डीजी ट्रेनिंग के पद पर तैनात है. 28 फरवरी को वर्तमान डीजीपी पीके ठाकुर अवकाश ग्रहण कर रहे है. पहली मार्च को केएस द्विवेदी डीजीपी का पद संभाल लेंगे. इनका कार्यकाल 10 महीने का होगा. ये 31 जनवरी 2019 को रिटायर होंगे. 
 
   इनका भागलपुर से रिश्ता खट्टे मीठे तजुर्वे वाला रहा है. इसलिए   1989 में भागलपुर एसपी ओहदे पर तैनाती और इनके काम की   बात करना जरूरी है. इनकी पोस्टिंग के पहले नीलमणि भागलपुर के एसपी थे. ये भी बिहार के डीजीपी पद पर रहे और अवकाश ग्रहण कर गए. उस वक्त अपराध भागलपुर में चरम पर था. कांग्रेस से जुड़े लोगों ने एक डॉक्टर की बेटी पापरी बोस को दिनदहाड़े अगुआ कर लिया था. उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद थे. इस वाकए से इन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी. मसलन सत्ता पक्ष के लोग भी गुंडई पर उतरे थे. 
         ऐसे हालत में मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिंह ने केएस द्विवेदी की पोस्टिंग बतौर एसपी भागलपुर में की थी.  बरारी इलाके का शातिर समुआ मियां गिरोह पहले से सक्रिय था. इसी गिरोह पर वकील अशोक सिंह की हत्या का आरोप था. बरारी के हरेराम मिश्रा को स्टेशन चौक से रगेदकर जान मारने की कोशिश की थी. इससे भी जघन्य कांड एक 25 साल की लड़की समिया के दोनों स्तन काट डाले थे. गुप्तांग में छुरा भोंक जान ले ली थी. यह वाकया मोजाहिदपुर थाना इलाके और 22 जुलाई 1989 का था. समुआ मियां पर बरारी थाना में चार , कोतवाली में तीन , मोजाहिदपुर में चार , सबौर में एक , और हबीबपुर में चार आपराधिक मामले दर्ज थे. यह दुर्दांत बदमाश था.
 
      पुलिस रेकार्ड के मुताबिक  28 जुलाई 1989 को यह गिरोह चंपानालापुल के नजदीक रेलवे सतपुलिया पर समुआ समेत डेढ़ दर्जन बदमाश बड़ी वारदात को अंजाम देने जुटे. इस बात की जानकारी एसपी द्विवेदी को मिली. इन्होंने फौरन पुलिस बल भेजा. और गिरफ्तार करने की हिदायत दी. मगर गुंडे अपने को घिरा देख पुलिस पर गोलियां दागनी शुरू कर दी. जवाब में पुलिस ने भी गोलियां चलाई. नतीजतन समुआ समेत आठ बदमाश मौके पर ही मारे गए. बाकी भागने में कामयाब रहे. जो मारे गए उनके नाम समुआ , हसन, मनीर, शाहनवाज , इरशाद , शमिया  , जफर और चुन्ना मियां है.
 
      इसके बाद केएस द्विवेदी दोनों कौम के हीरो बन गए. यहां के ललित भवन में एक समारोह हुआ. जिसमें दोनों कौम के लोगों ने इन्हें सम्मानित किया. अपराधियों को ठिकाने लगाने पर वाहवाही की और पीठ थपथपाई. 
 
        मगर शातिर गुंडों के दूसरे गिरोह इनायतुल्ला अंसारी और सल्लन मियां और इनके राजनैतिक आकाओं को यह बात हजम नहीं हुई. इन्हें भी मौत का डर सताने लगा. और इन सबने मिलकर कौमी रंग देकर इन्हें बदनाम करने की कोशिश की. और भागलपुर पर काला धब्बा लगा. 
 
       दंगे के दौरान इनके काम और गुंडों पर लगाम व ईमानदारी को भांप प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इनके भागलपुर तबादले को रोक दिया था. यह अलग बात है कि कांग्रेस को बिहार में इसकी कीमत चुकानी पड़ी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इनकी निष्ठा, वरीयता का ख्याल करते हुए डीजीपी बनाया है. इनके फैसले की बिहार खासकर भागलपुर के लोग तारीफ कर रहे है.
 
 
 
सेकुलरिज्म का आखिरी कपड़ा भी उतार दिया !
दिलीप मंडल 
नीतीश कुमार ने सेकुलरिज्म का आखिरी कपड़ा भी उतार दिया है और पूरी तरह नंगे हो गए हैं. के.एस. द्विवेदी होंगे बिहार के नए डीजीपी.द्विवेदी की कहानी भागलपुर के बदनाम दंगों से जुड़ी है. 1989 में रामशिला पूजन के बीजेपी का कार्यक्रम के दौरन हुए दंगों में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे.द्विवेदी उस समय भागलपुर के एसपी थे.इन दंगों की जांच के लिए बने न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में द्विवेदी को इन दंगों के लिए दोषी ठहराया था. जस्टिस प्रसाद कमीशन की रिपोर्ट में प्रतिकूल टिपण्णी की थी 
 
यानी "द्विवेदी सांप्रदायिक रूप से पक्षपात कर रहे थे. यह बात न सिर्फ मुसलमानों की गिरफ्तारी के उनके तरीकों से दिख रही थी, बल्कि वे उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त भी नहीं कर रहे थे."द्विवेदी ने एसपी रहने के दौरान बीजेपी के जुलूस को मुसलमान बस्तियों से गुजरने की इजाजत दी और उपद्रव होने दिया.न्यायिक आयोग की इतनी स्पष्ट रिपोर्ट के बावजूद न सिर्फ द्विवेदी की नौकरी बची रही, बल्कि अब वे बिहार में पुलिस के मुखिया भी बन गए. जबकि एक विपरीत टिप्पणी के बाद कितने अफसरों का करियर बर्बाद होते हम सबने देखा है.बीजेपी अगर द्विवेदी को डीजीपी बनाती तो शिकायत न होती लेकिन...वाह नीतीश कुमार! आह नीतीश कुमार.
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