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बिना बर्फ़बारी के निकल गया पौष

सुभाष तारण 

देहरादून .मध्य हिमालय के पहाड़ों की चोटियों और ऊंची घाटियों में पौष के महीने के दौरान दो चार दिनों के अंतराल में गिरने वाली बर्फ पहाड़ों के सख्त और सूखे मिजाज को नर्म और नम कर वहां जीवन की उम्मीद जगाती है. यही नहीं, सर्द सुबहों में रोज पाले की परत से उम्र दराज होने के बाद वही बर्फ आने वाले गर्म मौसम के दौरान पानी में तब्दील होकर, नीचे उतरते हुए, पेड़ पौधों, पशु पक्षियों के अलावा ढलानों, नदी घाटियों, तलहटियों और मैदानों पर आबाद बसासतों की प्यास बुझाने का आश्वासन भी होती है.

पहाड़ पर पौष इस बार बिना बरसे ही गुजर गया.छिटपुट बादलों और बूंदाबांदी के अलावा पूरे महीनें आसमान में कह़ी कोई हलचल नहीं हुई. गुजर चुके दिसंबर महीने कें दौरान मैं दो बार पहाड़ पर अपने गाँव होकर आया हूँ. दोनो बार घर की खैर खबर के अलावा बर्फ बारीश से रूबरू होने के मंसूबे भी बाँध कर गया था लेकिन दोनो बार जब लौटा तो जेहन में धूप, धूल और सूखे की वास्तविकता के अलावा और कुछ था ही नहीं.

इसी सिलसिले में कल पोष माह के अंतिम दिन अपने कुछ ईलाकाई दोस्तों के साथ जौनसार के मटियावा गाँव के बाशिंदे अजीज संजीव के गांव  जाना हुआ. बुलावा तो पिछले एक पखवाड़े से बाकी दोस्तों की तरफ से भी था और आगे भी है लेकिन नौकरी के चलते हर बार सप्ताहंत तक का सब्र करना पड़ता है.

 दिल्ली से देहरादून तक का सफर जितना थकाऊ और उबाऊ होता है, अगले रोज कालसी से उपर को जाते हुए पहाड़ की आबो हवा उसे खुशगवार बना देती है. लेकिन इस बार कालसी पार करते ही पहाड़ों का मिजाज फ़ीका नजर आया. पहाड़ों के पार जहां कभी धुला क्षितीज नजर आता था वहां  इस बार गर्दो गुबार की हवाईयां उड़ रही थी. हम लोग जब चकराता मसूरी मार्ग पर स्थित, कस्बाई शक्ल अख्तियार कर रहे माख्टी डांडा पहुंचे  तो सूरज पश्चिम में धुंए और धूल के गुब्बार से सनी सिरमौर की पहाड़ियों के पीछे डूबने की तैयारी कर रहा था. आसमान साफ था लेकिन सूखी ठंड के चलते हवा का तीखापन जानलेवा महसूस हो रहा था. हालांकि कालसी से आगे रास्तें में अक्सर उदास रहने वाली जौनसार की बस्तियों में पौष त्यौहार के चलते रौनक मिली लेकिन मौसम की खुश्की हर बात पर भारी थी.

मेरे लिए पहाड़ पर दोस्तों के साथ समय बिताना, खाना पीना, गीत बात एक ऐसा रोमांच है जो मुझे भागते दौड़ते शहर की दिनचर्या को बिसुराने में मेरी फौरी मदद देता है. बावजूद इसके एक और बात भी है, और वो है पहाड़़ों के मन भावन मौसमी तेवर. गर्मियों के दौरान जब मैदान गर्मी से उबल रहे होते हैं तब पहाड़ अपने शरणार्थियों के लिए स्वाद भर ठंडक बचाए रखता है. बरसात में जब मैदान मामूली सी बारीश से तालाबों में तब्दील होने को होते हैं तब पहाड़ कई दिनों की बारीश के बाद भी जरा सी धूप में जमीन का सारा गीलापन सोख लेते है.

पहाड़ की सर्दियों का तो कहना ही क्या. जब बादल तब बारीश, बर्फ और जब आसमान साफ तब दिलकश धूप. खालिस सपष्टवादी. वहीं शहर की सर्दियां, एक दम दोगली, वहां  रहने वालों की तरह. ना बादल ना बारीश, बस कोहरे के नाम पर हर तरफ धुंध का भ्रम. मानो सब कुछ एक साजिश के तहत हो रहा हो ताकी सर्दियों के दौरान ठिठुरती ठंड में कोई धूप न देख सके.

 

जिस महासू क्षेत्र का मैं रहने वाला हूं वहाँ पौष का अंतिम सप्ताह पौष त्यौहार के नाम से खान-पान और उत्सव को समर्पित रहता हैं. इस उत्सवधर्मी ईलाके के सभी त्यौहार और मेले परिस्थिति आधारित होते हैं. एक जमाने से लेकर साल के बाकी मौसमों में यहाँ मनाए जाने वाले त्यौहार एक या दो दिन ही मनाए जाते थे लेकिन यहाँ सर्दियां तो पूरी की पूरी उत्सव हुआ करती थी. साल के दस महीने प्रकृति से अपना हिस्सा बटोर कर सर्दियों के दो महीने के लिए पालतुओं के आलावा प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ दिया जाना यहाँ की परंपरा थी. वह इसलिए ताकी प्रकृति भी स्वयं का उपचार कर अपने आप को फिर से तैयार कर सके.

 

अफसोस, दुनिया की देखा देखी में कामयाबी के नाम पर हमारी भूख इतनी बड़ी हो गयी है कि दस महीने की जगह हमने यहाँ वहाँ जाकर ज्यादा से ज्यादा हासिल करने के लिए धरती को दुहने में दिन रात एक कर दिए. इसका हासिल पैर पैर पर हमारे और आपके सामने है. इस पौष पहाड़ों के हिस्से बर्फ नहीं आयी. मेरी बात याद रखना, बहुत जल्द बहुत सी जगहों के हिस्से पानी नहीं होगा.

सुभाष तारण 
देहरादून .मध्य हिमालय के पहाड़ों की चोटियों और ऊंची घाटियों में पौष के महीने के दौरान दो चार दिनों के अंतराल में गिरने वाली बर्फ पहाड़ों के सख्त और सूखे मिजाज को नर्म और नम कर वहां जीवन की उम्मीद जगाती है. यही नहीं, सर्द सुबहों में रोज पाले की परत से उम्र दराज होने के बाद वही बर्फ आने वाले गर्म मौसम के दौरान पानी में तब्दील होकर, नीचे उतरते हुए, पेड़ पौधों, पशु पक्षियों के अलावा ढलानों, नदी घाटियों, तलहटियों और मैदानों पर आबाद बसासतों की प्यास बुझाने का आश्वासन भी होती है.
 
पहाड़ पर पौष इस बार बिना बरसे ही गुजर गया.छिटपुट बादलों और बूंदाबांदी के अलावा पूरे महीनें आसमान में कह़ी कोई हलचल नहीं हुई. गुजर चुके दिसंबर महीने कें दौरान मैं दो बार पहाड़ पर अपने गाँव होकर आया हूँ. दोनो बार घर की खैर खबर के अलावा बर्फ बारीश से रूबरू होने के मंसूबे भी बाँध कर गया था लेकिन दोनो बार जब लौटा तो जेहन में धूप, धूल और सूखे की वास्तविकता के अलावा और कुछ था ही नहीं.
 
इसी सिलसिले में कल पोष माह के अंतिम दिन अपने कुछ ईलाकाई दोस्तों के साथ जौनसार के मटियावा गाँव के बाशिंदे अजीज संजीव के गांव  जाना हुआ. बुलावा तो पिछले एक पखवाड़े से बाकी दोस्तों की तरफ से भी था और आगे भी है लेकिन नौकरी के चलते हर बार सप्ताहंत तक का सब्र करना पड़ता है.
 दिल्ली से देहरादून तक का सफर जितना थकाऊ और उबाऊ होता है, अगले रोज कालसी से उपर को जाते हुए पहाड़ की आबो हवा उसे खुशगवार बना देती है. लेकिन इस बार कालसी पार करते ही पहाड़ों का मिजाज फ़ीका नजर आया. पहाड़ों के पार जहां कभी धुला क्षितीज नजर आता था वहां  इस बार गर्दो गुबार की हवाईयां उड़ रही थी. हम लोग जब चकराता मसूरी मार्ग पर स्थित, कस्बाई शक्ल अख्तियार कर रहे माख्टी डांडा पहुंचे  तो सूरज पश्चिम में धुंए और धूल के गुब्बार से सनी सिरमौर की पहाड़ियों के पीछे डूबने की तैयारी कर रहा था. आसमान साफ था लेकिन सूखी ठंड के चलते हवा का तीखापन जानलेवा महसूस हो रहा था. हालांकि कालसी से आगे रास्तें में अक्सर उदास रहने वाली जौनसार की बस्तियों में पौष त्यौहार के चलते रौनक मिली लेकिन मौसम की खुश्की हर बात पर भारी थी.
 
मेरे लिए पहाड़ पर दोस्तों के साथ समय बिताना, खाना पीना, गीत बात एक ऐसा रोमांच है जो मुझे भागते दौड़ते शहर की दिनचर्या को बिसुराने में मेरी फौरी मदद देता है. बावजूद इसके एक और बात भी है, और वो है पहाड़़ों के मन भावन मौसमी तेवर. गर्मियों के दौरान जब मैदान गर्मी से उबल रहे होते हैं तब पहाड़ अपने शरणार्थियों के लिए स्वाद भर ठंडक बचाए रखता है. बरसात में जब मैदान मामूली सी बारीश से तालाबों में तब्दील होने को होते हैं तब पहाड़ कई दिनों की बारीश के बाद भी जरा सी धूप में जमीन का सारा गीलापन सोख लेते है.
 
पहाड़ की सर्दियों का तो कहना ही क्या. जब बादल तब बारीश, बर्फ और जब आसमान साफ तब दिलकश धूप. खालिस सपष्टवादी. वहीं शहर की सर्दियां, एक दम दोगली, वहां  रहने वालों की तरह. ना बादल ना बारीश, बस कोहरे के नाम पर हर तरफ धुंध का भ्रम. मानो सब कुछ एक साजिश के तहत हो रहा हो ताकी सर्दियों के दौरान ठिठुरती ठंड में कोई धूप न देख सके.
 
जिस महासू क्षेत्र का मैं रहने वाला हूं वहाँ पौष का अंतिम सप्ताह पौष त्यौहार के नाम से खान-पान और उत्सव को समर्पित रहता हैं. इस उत्सवधर्मी ईलाके के सभी त्यौहार और मेले परिस्थिति आधारित होते हैं. एक जमाने से लेकर साल के बाकी मौसमों में यहाँ मनाए जाने वाले त्यौहार एक या दो दिन ही मनाए जाते थे लेकिन यहाँ सर्दियां तो पूरी की पूरी उत्सव हुआ करती थी. साल के दस महीने प्रकृति से अपना हिस्सा बटोर कर सर्दियों के दो महीने के लिए पालतुओं के आलावा प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ दिया जाना यहाँ की परंपरा थी. वह इसलिए ताकी प्रकृति भी स्वयं का उपचार कर अपने आप को फिर से तैयार कर सके.
 
अफसोस, दुनिया की देखा देखी में कामयाबी के नाम पर हमारी भूख इतनी बड़ी हो गयी है कि दस महीने की जगह हमने यहाँ वहाँ जाकर ज्यादा से ज्यादा हासिल करने के लिए धरती को दुहने में दिन रात एक कर दिए. इसका हासिल पैर पैर पर हमारे और आपके सामने है. इस पौष पहाड़ों के हिस्से बर्फ नहीं आयी. मेरी बात याद रखना, बहुत जल्द बहुत सी जगहों के हिस्से पानी नहीं होगा.
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