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नेहरु का चरित्र समा गया था मैं अविवाहित हूं लेकिन कुवारां नहीं भारत छोडो आंदोलन और अटल वे एक अटल थे
इस विरोध को समझें नीतीश जी
फ़ज़ल इमाम मल्लिक
 
पटना .बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यात्राएं बेतरह भाती हैं. इन यात्राओं का मकसद यों ती नीतीश कुमार के मुताबिक अपने कार्यकाल में किए गए कामों का जायजा लेना होता है. लेकिन मकसद सियासी ज्यादा होता है. पूरे गाजे-बाजे और लाव-लश्कर के साथ वे यात्रा पर निकलते हैं. तो जाहिर है कि इंतजाम तो उसी तरह का होगा. आखिर प्रदेश के राजा की सवारी आ रही है तो लाल कालीन बिछाई जाती है. सेवा-टहल के लिए हाकिम-हुक्काम से लेकर पीर-भिश्ती सब लगे रहते हैं. खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम किया जाता है. मौसम सर्दी का है तो दही-चूड़े भी मंगाए जाते हैं. वह भी कतरनी चुड़ा जो दूर से ही बमबम महके. पहले का दौर दूसरा था. तब राजा-बादशाह प्रजा का हालचाल लेने रात में भेस बदल कर निकलते थे. रात में अपने राजकाज का जायजा लेने इसलिए निकलते थे ताकि कोई उन्हें पहचाने नहीं और उनसे मन की बात कहने में हिचकिचाए नहीं. तब खूबियां भी सामने आती थीं और खामियां भी.
 
लेकिन वह वक्त और था यह दूसरा जमाना है. अब राजा सबको सूचना देकर जाते हैं. नीतीश कुमार ने भी ऐसा ही किया. वे इस बार समीक्षा यात्रा पर हैं और देख वही रहें हैं जो अधिकारी उन्हें दिखला रहे हैं. इससे पहले भी वे कई बार बिहार की यात्रा कर चुके हैं. लेकिन इन यात्राओं से न कोई नतीजा तब निकला था, न अब निकलेगा. सिवा इसके करोड़ों रुपए उनके आने-जान, झाड़-फानूस, ताम-झाम में खर्च हो जाएंगे. हो गई विकास की समीक्षा यात्रा. नीतीश कुमार भले इन यात्राओं को लेकर अभिभूत हों लेकिन सच यह है कि पहले भी इन यात्राओं के दौरान उनका विरोध हुआ था. इस बार भी उनका लगभग हर जिले में विरोध हो रहा है. लेकिन दीवार पर लिखी इबारत नीतीश कुमार नहीं पढ़ रहे हैं. या यह कहना ज्यादा सही होगी कि वह पढ़ना नहीं चाह रहे हैं.
 
 
चंपारण से लेकर कैमूर तक उनकी यात्रा के दौरान उनका विरोध होता है. उन्हें काले झंडे जगह-जगह दिखाए गए. बक्सर में तो उनके काफिले पर हमला तक हुआ. जिन लोगों ने भी हिंसा की, ठीक नहीं किया. लेकिन नीतीश कुमार की पुलिस ने फिर उन लोगों के अलावा मीडिया के साथ जो किया उसे किस तरह जस्टीफाई करेंगे नीतीश कुमार. लोग आक्रोशित हैं. नीतीश कुमार की सरकार भी जुमलों पर चल रही है. शिक्षक बेजार हैं तो किसान बेहाल. युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है. बिहार में निवेश के नाम पर ठन-ठन गोपाल. बावजूद इसके विकास के दावे. तो फिर विरोध तो झेलना ही पड़ेगा.
 
बक्सर के पास है नंदर गांव. समीक्षा यात्रा के दौरान नीतीश कुमार उस रास्ते से गुजर रहे थे. दलितों की बस्ती है. दलित चाह रहे थे कि मुख्यमंत्री उनका हालचाल भी पूछें. जिस सात निश्चय कार्यक्रम को लेकर नीतीश कुमार फूले नहीं समाते हैं, उस गांव में उस कार्यक्रम का हश्र भी देख लें. उनका वहां पहले से कार्यक्रम नहीं था या नहीं रखा गया था. उस गांव में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था, जिसे अधिकारी दिखाते तो फिर उस गांव में मुख्यमंत्री को कैसे ले जाते. फिर नीतीश कुमार तो राजा ठहरे. हर किसी की बस्ती में जाते रहें तो हो गई छुट्टी. सत्ता की हनक भी तो कोई चीज होती है. तो मुख्यमंत्री ने गांव जाना तो दूर गांव वालों से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा. लोकतंत्र में मालिक तो प्रजा ही होती है. उसे गुस्सा आया तो शुरू हो गए ईंट-पत्थर चलाना. नीतीश तो बच गए लेकिन कुछ सुरक्षाकर्मियों को चोटें आईं. कई गाड़ियों के शीशे टूटे. लेकिन नीतीश का मन फिर भी नहीं पसीजा. वे मोटर पर बैठ कर आगे निकल गए. दो किलोमीटर दूर हरियाणा फार्म पर उनकी सभा थी. वे वहां जा पहुंचे. यहां विकास गांव में बैठा उनकी राह ताकता रह गया.
 
दिलचस्प यह रहा कि नीतीश कुमार ने वहां जो कहा बहुतों को वह चुटकुला लगा. नीतीश ने कहा कि लोग उनके काम से परेशान हो गए हैं. इसलिए यह सब कर और करवा रहे हैं. लेकिन हम सत्ता के लिए नहीं सेवा करने के लिए बने हैं. नीतीश ने यह भी कहा कि सत्ता का उन्हें मोह नहीं है और वे वोट की खातिर यह सब नहीं कर रहे हैं. इस बात में सच्चाई है. वे चुनाव लड़ते नहीं हैं तो वोट की खातिर तो नहीं ही कर रहे हैं गुणा-भाग. चुनाव लड़ते तो गुणा-भाग करते भी. लेकिन उनका यह कहना कि सत्ता से उन्हें मोह नहीं है, बहुतों को चुटकुला ही लगा. कहां ज्यादा दिन हुए हैं एक गठबंधन तोड़ कर भाजपा से हाथ मिला कर फिर से मुख्यमंत्री कौन बना था, सबको पता है. फिर भी नीतीश कुमार कह रहे हैं सत्ता से मोह नहीं है. सच दीवार पर लिखा हुआ है, नीतीश कुमार को भले नजर न आता हो लेकिन लोग जानते हैं और समझते भी हैं कि जनादेश किसे मिला था और किसने इसका अपमान किया.
 
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सात निश्चय के तहत विकास कार्यों की समीक्षा यात्रा की शुरुआत चंपारण से की थी. बारह दिसंबर से शुरू हुई समीक्षा यात्रा के दौरान नीतीश कुमार को इन सभी गांवों में जाना था, जहां 2009 में वे विकास यात्रा के दौरान गए थे और विभिन्न योजनाओं की घोषणा की थी, लेकिन इस यात्रा का पहला चरण ही पूरा हो सका. प्रकाश पर्व के शुकराना समारोह की तैयारियों के कारण समीक्षा यात्रा का दूसरा चरण स्थगित कर दिया गया. पहले चरण की समीक्षा यात्रा में नीतीश कुमार को प्रशासन ने वही दिखाया, जो वे चाहते थे या यूं कहें कि सात निश्चय की योजनाओं को वहीं पर क्रियान्वित किया गया था, जहां नीतीश कुमार को जाना था. कई जगह इन्हें सख्त विरोध का भी सामना करना पड़ा. विकास यात्रा के चौथे चरण में वे बक्सर में थे. वहां से कैमूर गए. कैमूर में भी नियोजित शिक्षकों ने उन्हें काला झंडा दिखाया. लेकिन विरोध उनके लिए अब नई बात नहीं रह गई है. नीतीश इस विरोध को कुछ लोगों का जनून भर समझते हैं. लेकिन सच तो यह है कि लोग नीतीश की नीतियों से उकताए हुए हैं. कभी उनके डिप्टी रहे और अब विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव बहुत वाजिब सवाल उठा रहे हैं. तेजस्वी कहते हैं कि अगर नीतीश कुमार ने विकास किया होता तो लोगों के विरोध का सामना नहीं करना पड़ता. सियासी तौर पर भले यह बयान विपक्ष ने दिया है लेकिन नीतीश कुमार इस विरोध को समझें. नहीं तो यह विरोध वोटों में बदलेगा और आपको तब पता चलेगा जब आप सत्ता से बेदखल कर दिए जाएंगे.
 
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