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बर्फ़बारी से बचेंगी हिमालयी नदियां

अंबरीश कुमार 

संकट से जूझ रही हिमालयी नदियों को बर्फ़बारी से काफी उम्मीद है है ।कश्मीर ,हिमाचल से लेकर पूर्वोत्तर के हिमालयी राज्यों और देशों में भी । भारत के इन राज्यों में जब बर्फ गिरनी शुरू होती है तो मैदानी इलाके के लोगों के लिए यह पर्यटन से जुड़ा मुद्दा होता है । बर्फबरी  का मोटा अर्थ उनके लिए पहाड़ी सैरगाहों पर होने वाला जश्न और माहौल होता है । बर्फ़बारी की जानकारी मिलने के बाद  दिल्ली से तो लोग अक्सर श्रीनगर ,शिमला ,दार्जिलिंग ,नैनीताल मसूरी जैसे पहाड़ी सैगाहों का रुख करते हैं । पहाड़ी सैरगाहों के ह्प्तल उद्योग को भी बर्फ़बारी का बेसब्री से इंतजार होता है ।पर पहाड़ के लोगों के लिए बर्फ जीवन दायिनी है ।पहाड़ पर बर्फ़बारी ठीक से नहीं हो तो पानी संकट मैदान तक गहरा सकता है । दूसरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था भी जिस खेत बागवानी पर निर्भर रहती है वह भी बर्फ़बारी का ही इंतजार करती है । दरअसल पहाड़ के मशहूर फलों जैसे सेब ,नाशपाती ,अखरोट ,खुबानी से लेकर कीवी चेरी तक अच्छी बर्फ़बारी से ही बड़े आकार तक पहुंचते है । इन पहाड़ी फलों के अच्छी पैदावार के लिए जरुरी है कि साठ से नब्बे दिन तक का तापमान शून्य से नीचे रहे । यह तभी संभव है जब कई बार बर्फ़बारी हो । बर्फ़बारी ठीक से जब होती है तो यह तापमान भी मिल जाता है और शून्य से नीचे तापमान पर कई तरह के हानिकारक कीड़े मकोड़े भी खत्म हो जाते है । यह तो एक वजह है ।
पर सबसे ज्यादा जरुरी भूजल स्तर को बनाए रखना और हिमालयी नदियों को रिचार्ज करना होता है । अच्छी बर्फ़बारी से से हिमालयी नदियां जो ग्लेशियर से निकलती हैं उन्हें भी जीवन मिलता है और जो गैर हिमानी नदियां है उन्हें भी भूजल स्तर बढ़ने से ताकत मिलती है ।पिछले कुछ दशकों से पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और जंगल की कटाई के चलते बरसात और बर्फ़बारी कम होने लगी है ।इसका सीधा असर हिमानी और गैर हिमानी नदियों पर पड़ने लगा है ।हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली नदियां जैसे गंगा और यमुना को भी रास्ते में पड़ने वाली गैर हिमानी पहाड़ी नदी नाले पानी देकर उनका प्रवाह बढाते रहते थे । पर जब बर्फ़बारी कम हुई तो भूजल स्तर भी गिरा और हिमानी नदियों के साथ गैर हिमानी नदियों पर काफी बुरा असर देखने को मिला ।
पिछली गर्मियों में कौसानी में हमने गरुण गंगा और गोमती नदी को देखा और समझा । जून के महीने में गरुड़ गंगा सूख गई थी । हालत यह थी कि इस नदी से चलने वाले तीन घराट बंद हो गए थे । गांव के लोगों को   गेहूं की पिसाई के लिए काफी दूर जाना पड़ रहा था । गांववालों को यह चिंता भी सताने लगी है कि पानी की किल्लत और तो नहीं बढ़ जाएगी। इस अंचल में बर्फ़बारी और  बारिश कम होने से नदियां संकट में आने लगी हैं।गरुड़ गंगा का जलस्तर अप्रैल आते-आते काफी नीचे गिर गया था । जिससे थाकला गांव के घराट सूख गए थे । इन घराटों में थाकला कोहिना पोखरधार सिम्पुर और हराणी गांव के करीब एक हजार लोग निर्भर हैं। वे गेहूं की पिसाई करते हैं। मडुवा की पिसाई घराटों में अच्छी होती है। लेकिन नदी का जलस्तर कम होने से लोग परेशान थे । ठीक ऐसी ही स्थिति गोमती नदी की नजर आई । 
 
कौसानी से भवाली की तरफ चले तो कोसी गोला समेत कई छोटी नदियां अब अप्रैल आते आते सूखने लग जाती है । इसकी एक वजह पहाड़ में बर्फ़बारी और बरसात का कम होना माना जा रहा है तो नदियों में होने वाले अवैध से स्थिति और गंभीर होती जा रही है । बरसात का पानी तो फ़ौरन बह जाता है पर बर्फ़बारी की वजह से पानी धीरे धीरे जमीन में जाता है ।इससे भूजल स्तर बढ़ता है । बर्फ़बारी कम होने या कई बार न होने की वजह से भूजल रीचार्ज नहीं हो पाता । जैसे ही गर्मियां शुरू होती हैं पानी का संकट गहराने लगता है ।कौसानी में हमने देखा कि जून में  गर्मी बढ़ने से गरुड़ गंगा और गोमती नदी का जलस्तर घट गया था । गरुड़ गंगा में मात्र 6 और गोमती में मात्र 11 क्यूसेक पानी रह गया है। इन नदियों का नदियों का जलस्तर घटने से 24 से अधिक गांवों में जल संस्थान की योजनाओं से नियमित पानी की सप्लाई नहीं हो पा रही है। गांव के लोगों ने यह भी बताया कि गरुड़ गंगा और गोमती नदियों में धड़ल्ले से खनन कार्य हो रहा है, जिससे नदियों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इन नदियों को क्षेत्र की लाइफलाइन माना जाता है। खनन से नदियों में बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। नदियों में पानी की मात्रा भी लगातार घट रही है। तैलीहाट, गागरीगोल, बैजनाथ और घांघली क्षेत्र में खनन अधिक मात्रा में किया जा गया था ।
कमोवेश यही स्थिति अब दूसरे प्रदेशों में भी नजर आती है ।कश्मीर में भी बर्फ़बारी पिछले दो दशक में कम हुई तो इसका असर भी दिखने लगा गई । कश्मीर के श्रीनगर में चाहे डल झील हो या वूलर झील या फिर झेलम नदी । बर्फ़बारी की कमी का असर इन सब पर दिखने लगा है । अप्रैल मई में तो हब्बाकदल पुल से नीचे बहती झेलम एक बड़ा नाला नजर आती है । गंदे काले पानी का नाला । वजह पानी की कमी और सीवेज को नदी में बहाना । पानी की कमी कम बर्फ़बारी और बरसात की वजह से हो रही है । दरअसल पहाड़ी अंचल में जंगल की कटाई तेजी से हुई और विकास के चलते प्राकृतिक संसाधनों को काफी बेदर्दी से उजड़ा गया । यह सभी जगह हुआ ।कश्मीर ,हिमाचल से लेकर उतराखंड और पूर्वोत्तर तक में । पहाड़ी अंचल की नदियों और झीलों पर इसका ज्यादा असर पड़ा ।नैनीताल झील पिछले पांच साल से पानी के संकट से जूझ रही है । यही स्थिति भीमताल की भी हो चुकी है । कुमायूं अंचल के कई शहरों में भी बर्फ़बारी अब हर साल नही होती । जिसकी वजह से पानी का संकट इस अंचल में बढ़ रहा है ।इसलिए हिमालयी राज्यों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा ।दरअसल यह मुद्दा सिर्फ हिमालयी राज्यों का ही नहीं मैदानी इलाकों का भी है ।अगर पहाड़ी नदियां सूखने लगी तो मैदानी इलाकों तक पानी पहुंचेगा कैसे ।बेहतर हो समय रहते सरकार इस बारे में एक कार्य योजना लागू करे और पहाड़ पर पर्यावरण को बचाया जाए । जंगल को काटने से बचाया जाए ताकि समय पर भरपूर बर्फ़बारी हो तो बरसात भी ।
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