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भारतीय मंदिरों का महाप्रसाद एमजे अकबर नपेंगे तो नरेंद्र मोदी कैसे बचेंगे? सरकार के अहंकार ने ली सानंद की जान ! गंगा के लिए मौत मुबारक़!
माया मुलायम और अखिलेश भी तो सामने आएं
अंबरीश कुमार 
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित नेता चंद्रशेखर को आंदोलन के दौर के कई मामलों में इलाहबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली और अदालत ने एक गंभीर टिपण्णी भी की .कहा गया कि ये मामले राजनीति से प्रेरित हैं .इस बीच चंद्रशेखर की एक फोटो भी सामने आई जिसमे वे काफी बीमार और व्हील चेयर पर नजर आए .दलित कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह जेल में हुई बर्बरता का असर है .इस सबके बावजूद सरकार ने चंद्रशेखर पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका लगा दी ताकि वे जेल से बाहर न आ सके .देश में और प्रदेश में भाजपा का ही राज है .जो बीते विधान सभा चुनाव में  'अहीर मुस्लिम ' के कथित गठजोड़ के खिलाफ अगड़ों से लेकर गैर यादव पिछड़ों और दलितों तक में जमीनी स्तर पर माहौल बना रही थी .माहौल बना और मायावती को दलितों ने विधान सभा से बाहर कर दिया .भाजपा को भरपूर समर्थन दिया .
उसी दलित बिरादरी का जुझारू दलित नेता चंदशेखर आज जेल में अपाहिज बना दिया गया है .और सरकार इसपर भी संतुष्ट नहीं है .वह इस दलित नेता को ही नहीं उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति को ही निपटाना चाहती है .पर इस सबके बीच दलित और पिछड़े नेताओं की चुप्पी आम लोगों को खल रही है .न तो पासवान नजर आ रहे है न उदितराज .माया ,मुलायम और अखिलेश भी खामोश है .वर्ष दो हजार नौ का लोकसभा चुनाव था .जौनपुर में इंडियन जस्टिस पार्टी के उम्मीदवार को माफिया ने मारकर बबूल के पेड़ पर टांग दिया था .तब यही उदितराज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भाग रहे थे .मदद मांग रहे थे ,अपने उम्मीदवार की हत्या का सवाल उठा रहे थे .हैरानी की बात है आज वे खामोश हैं .पर उस दौर में मुलायम सिंह ने जौनपुर में ही चुनौती दी थी .आज कोई भी विपक्षी नेता इस सवाल पर बोल नहीं रहा है . रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया पर मायावती ने पोटा लगाया तो सभी दल के राजपूत नेता एक मंच पर आ गए थे .भारतीय जनता पार्टी के नेता राजनाथ सिंह और समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह कंधे से कंधा मिलकर लड़े .सारे राजपूत नेताओं को एकजुट किया और दबाव बनाया .
यह जातीय एकता थी ,पर थी तो .जब सत्ता पक्ष बेलगाम हो जाए और विपक्ष खामोश हो जाए तो बिरादरी ही सही बचाव में तो आती है .पर चंद्रशेखर के मामले में देश के दलित पिछड़े नेताओं की ख़ामोशी दुर्भाग्यपूर्ण नजर आ रही है .राजनैतिक विरोधियों से निपटने का यह अंदाज लोकतंत्र के लिए खतरनाक है .उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों हुआ क्या क्या .शिक्षा मित्रों को लाठियों से पीटा गया ,आंगनबाड़ी महिलाओं को सड़क पर बाल पकड़ कर कूटा गया .समाजवादी पार्टी ने सवाल उठाया यह भी सही है .सपा के कंधो पर विपक्ष की जिम्मेदारी और जवाबदेही भी है .ऐसे में पासवान उदितराज को छोड़े पर अखिलेश यादव तो सामने आएं .मायावती और मुलायम भी तो कुछ बोले.
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