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साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
चंचल का चैनल

यह यू ट्यूब पर चंचल का चैनल है .इसका रुख गांव की तरफ है .चंचल चित्रकार हैं ,पत्रकार हैं ,लेखक है ,कलाकार हैं और बहुत कुछ हैं .जब हम लखनऊ विश्विद्यालय में राजनीति का ककहरा सीख रहे थे तब वे बीएचयू छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में छात्र राजनीति की दिशा तय कर रहे थे .जब देश भर में टीवी चैनल के एंकर चिल्लाते हुए गुर्राते हुए बाबा से लेकर त्रेता युग में ले जा रहे हों ऐसे में गांव और उसके समाज में क्या हो रहा है यह जानना दिलचस्प होगा .खुद चंचल के शब्दों में 'इस कालखण्ड पर एक चमकदार शब्द फेंका गया उसका नाम रखा गया ' विकास ' । विकास एक अमूर्त खेल भी है , इसे आप अपने ढंग से खेलते रहिये । सियासत ने बहुत चमकदार ढंग से इसे प्रसारित कियाऔर इसे घेर कर एक खांचे में डाल दिया जहां सड़क और बिजली का सपना आमजन की आंख में तैर गया ।। गांव का उत्पाद शहर नही गया , पर शहर का कचड़ा गांव में आ गिरा । यही बिजली ने किया । इस बिजली ने उद्योग कम दिया , कचड़े का प्रचार प्रसार खूब किया । इस तरह के जो खेल खेल जा रहे हैं उसे उघार करने के लिए कई'सिरफिरों ' ने मिल कर यू ट्यूब पर एक चैनल शुरू किया है 
'आखिरी पायदान से ' 
आज इसका पहला अंक जारी हुआ है यू ट्यूब पर । गरिआइयेगा मत । पहला झोंका है । तरतीब मिलेगी । उम्मीद है । आपकी राय चाहिए
सब्सक्राइब करिये तो बल मिलेगा । 
आखिरी पायदान से ।
https://www.youtube.com/watch?v=_OH0ury-yeU&t=0s

 

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  • चंचल का चैनल
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • क्षिप्रा-नर्मदा जोड़-तोड़
  • हमारी नदी तुम्हारी नदी
  • एक था चांद नवाब
  • सरकार और संघ परिवार
  • कब मिटेंगे फासले ?
  • जाना सुनील शाह का
  • मैं नास्तिक क्यों हूं
  • जब साठ भये तब ठाठ भये!
  • एक लींजेंड का नाम प्राण
  • कौन भगवान दादा?
  • नदियां उदास हैं
  • जेलर बाबूजी का जाना
  • एक था मैफेयर फिल्म हाल
  • एक मिथक का नाम राजेश खन्ना
  • अफ़सोस हम न होंगे…
  • किधर जा रहा है सिनेमा
  • और एक था, ज्वेल थीफ़!
  • दिल्ली - दंगा करने की साजिश
  • अब चाहिए सप्तक्रांति
  • संकट में सारस
  • अंतागढ़ चुनाव बताएगा मूड
  • राख में बदलती जिन्दगी
  • तिकरित में फंसी नर्से
  • एक विलक्षण नेता
  • रिपोर्टर ,सपादक और न्यूज़ रूम
  • तमिलनाडु के अच्छे दिन
  • याद आते है शैलेंद्र
  • मूलचंद की सुध किसी ने नहीं ली
  • और हिंदू राष्ट्र का सपना
  • यादों के सहारे
  • बिन पानी सब सून . . .
  • तमिलनाडु - जनता के पांच सवाल
  • ये वो पुस्तक मेला तो नहीं
  • चंबल मे पानी का मुददा !
  • मिट्टी की मोहब्बत में…
  • भगत सिंह को याद करने का मतलब
  • काशीनाथ के नाम खुला पत्र
  • बनारस त बनारसे रहेगा
  • मुमताज से मधुबाला
  • जंगल की पाठशाला
  • पत्रकारिता की घिसी हुई सीढिय़ां
  • मुलताई के किसानों का आंदोलन
  • अभी भी पुनर्वास के इंतजार में
  • चंबल पर फ़िदा तिग्मांशु धूलिया
  • घरेलू श्रमिकों की पीड़ा
  • चली गईं रेशमा....
  • ‘न दोस्त है न रकीब है ....
  • मन्ना डे , एक पीढी विदा हो गई
  • गाँधी ,मनु आभा और राजेंद्र यादव !
  • सबुज रंग छीट मगाय द....
  • खामियाजा भुगतती नर्मदा घाटी
  • जे युद्धे भाई के मारे भाई
  • तीन पीढ़ियां तीन दृष्टिकोण
  • केदारनाथ में तांडव
  • आपदा में लूट
  • संघ का पारम्परिक विरोध कब तक
  • बौद्ध धम्म की प्रासंगिकता
  • मस्तराम कपूर
  • यह मिजाज लोकतंत्र के खिलाफ
  • विकास का पतन
  • नफ़रत फैलाने की ट्रेनिंग
  • दलितों ने क्या चाहा था
  • आक्रोश को आवाज
  • तें देखिअ ठाठ
  • खुशबू गुजरात की
  • हरसिंगार फूलने लगे
  • दलित गुलामी का दस्तावेज़
  • पंडित जी ! प्रणाम ......
  • व्यवस्था नैतिक नहीं, राजनीतिक है
  • राम , कृष्ण और शिव
  • माओवादी भी बंटे हुए हैं
  • कौन हूं मैं
  • दिनमान ने भाषा दी है
  • हमने तराशा है फेसबुक
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  • तर्क और तथ्य दोनों गलत
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  • दुख हुआ,पर अचंभा नहीं
  • आदिवासी ने क्या हासिल किया
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  • कार्पोरेट घरानों की लूट का सवाल
  • पटेल की कहानी पर धुंध
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  • हर मोड़ पर मौत का सामान
  • माओवाद चला अमेरिकी राह
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  • पत्तियों के पीछे पहाड़ थे
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  • अभी जनता खामोश है
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  • पहाड़ी नदी की ध्वनि
  • संयुक्त राष्ट्र जाना भूल थी
  • नया कलयुगी मल्टीमीडिया
  • गणतंत्र दिवस अब राष्ट्र दिवस
  • गांधी, अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार
  • अन्ना हजारे और इरोम शर्मिला
  • राजनीति को ऐसी चुनौती
  • चराग़ ए नूर जलाओ....
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  • क्या तुम धार्मिक हो?
  • एशिया से गाजा तक कारवां
  • लोकपाल मुद्दे की प्रतिध्वनि
  • एअर इंडिया की मूर्छा टूटी
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  • बच्ची पढ़ती तो पूरा परिवार पढ़ता
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  • दुनिया का सबसे महंगा रोग
  • अब हिमालय पर बनेगी सड़क
  • यात्रा को लेकर विवाद गर्माया
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  • भ्रष्टाचार के खिलाफ फिर आक्रोश
  • समाजवादी चेतना के प्रकाश पुंज
  • सबसे बड़ा घोटाला
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  • आदर्श में तो गडकरी भी
  • बंद नही होगा ओबामा का विमान
  • फैसले पर उठे सवाल
  • ब्लॉगिंग की आचार संहिता
  • माओवादियों ने बदली रणनीति
  • विदर्भ के रास्ते पर छत्तीसगढ़
  • बिहार में बदलेगा समीकरण
  • वे लोहिया को भी भूल गए
  • पाकिस्तान का भविष्य खतरे में
  • अयोध्या पर शुरू हुई पेशबंदी
  • विभूति के उतराधिकारी की तलाश
  • नवीन ,निवेश और कांग्रेस
  • कॉमनवेल्थ का एक और पाप
  • गाँधी की खादी बाजार के हवाले
  • आम आदमी के लिए आजादी
  • स्वाधीनता आंदोलन का यथार्थ
  • 15 अगस्त 1947 का टाइम्स
  • साहित्यिक पत्रकारिता का पतन
  • जागेश्वर का मेला
  • हाजी मस्तान की जिंदगी
  • फ़्रांस की क्रांति
  • वह माओवादी नहीं पत्रकार था
  • 1984 में आप कहां थे?
  • मुनाफे के लिए जहरीली तकनीकें
  • ब्लू स्टार और भोपाल कांड
  • मंद पड़ गई विकास की गति
  • एक और विनोवा भावे चाहिए
  • राम भरोसे है चारधाम यात्रा
  • नारद निराले हैं, बेजोड़ हैं
  • ये जातीय उत्पीड़न है
  • बुंदेलखंड में तेज हुआ पलायन
  • पैसा दीजिए,डिग्रियां खरीदिए
  • माल्या, मोदी और भूख
  • धोखा हैं गंगा कार्य योजना
  • खेतों में धधक रही आग
  • एक साथ हमला बोला जाए
  • पाकिस्तान से बड़े सौदे की तलाश में
  • माओवादियों से पल्ला झाड़ा
  • बोफोर्स तोपों की खरीद
  • बारहनाजा का एक फसलचक्र है
  • कैदी वोट बैंक नहीं होते
  • मोदी का ‘जीवंत’ गुजरात
  • दस पर भारी दो महीने
  • चिदंबरम के ‘लड़के’
  • कहानी लदुना के पानी की...
  • हम पी रहे है मीठा जहर
  • यह हमारा पता है
  • आडवाणी ने बनाया -सुषमा
  • समाजवादी से पूंजीवादी हो गया
  • नगा साधु चलाएंगे हरित अभियान
  • अस्तित्व को ले कर कई सवाल
  • किस्से तो और भी है !
  • कांग्रेस में शीला ही मर्द - ठाकरे
  • विदा हो कर भी वे विदा नहीं
  • विकलांगों की नई बस्तियां तैयार
  • पर्यावरण पर अमेरिकी खतरा
  • भारत के मुसलमान मजे में हैं
  • भारत के मुसलमान मजे में हैं
  • सुरक्षित ठिकानो की ओर
  • शिवनाथ के इतिहास का राज
  • बदल गई अमदाबाद की हवा
  • प्रभाष जी ऐसे द्रोणाचार्य थे......
  • खेत बर्बाद कर रही है चीनी मिले
  • उतराखंड में वन्दे मातरम
  • यह सजा मुसलमान होने की?
  • सरकार के खिलाफ खडा होता किसान
  • साहित्य का भी गढ़ है छत्तीसगढ़
  • कचरे से बने समुद्री डाकू
  • चुनार किला संकट में
  • भुखमरी की कगार पर किसान
  • हिन्द स्वराज के सौ बरस
  • धरम के कुँए में स्वतंत्र चिंतन !
  • स्कूलों में पल रही गैरबराबरी
  • गांधी को ‘महात्मा’ मुसलमान ने बनाया
  • मीडिया पर हावी बाजार
  • इस्लाम में कोई स्वतंत्र दार्शनिक क्यों नहीं ?
  • तिरुमाली बच्चे पढने लगे हैं
  • पुनर्जन्म की पहेली
  • ‘‘लाल सलाम‘‘ का नारा
  • फिर बनेगा बांध ,बेघर होंगे लोग
  • हुसैन से थोडा निराश हूँ,-वामन ठाकरे
  • आफत में फंसे हैं आडवाणी
  • गोधरा से साबरमती लौटने की संभावना
  • शोपियां कांड के बाद
  • पहली अग्नि-परीक्षा में सफल हुए निशंक
  • नए आयाम दिखा गया लखनऊ फिल्मोत्सव
  • मीडिया का मोतियाबिंद -3
  • एजुकेशन बिल की पैकेजिंग देखिए
  • कांग्रेस बनाएगी बुंदेलखंड राज्य
  • नहीं मिल रहा अतिथि का दर्जा
  • फिर से परिवारवाद की बहस
  • कांग्रेस से बेहतर नहीं है भाजपा
  • सूखे का सामना आसानी से
  • कश्मीर में मीडिया
  • सबसे लोकप्रिय नेता जसवंत सिंह
  • जिन्ना- भारत विभाजन के आइने में
  • घट गया गन्ने का रकबा
  • वाजपेयी युग का अवसान
  • और बादलों में खो गई सड़क
  • छीना जा रहा है गरीबों का हक
  • कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता
  • लालू का भविष्य बता देंगे उप चुनाव
  • प्रतिभा का पूरा संग्रहालय थे किशोर कुमार
  • माओवादियों के बचाव में पीयूसीएल?
  • बस्तर में माओवादियों का राज
  • विवादों भरा ही रहा है बुद्धदेव का कार्यकाल
  • महिलाओं की आंखों में पलते ख्वाब
  • उत्तर प्रदेश में राजनीति के नए ध्रुव बने
  • गहराने लगा है अकाल का संकट
  • शर्मनाक है लेखकों - संस्कृतिकर्मियों की शिरकत
  • आखिरी सांस तक कॉमरेड ज्योति बसु
  • छत्तीसगढ़ के बांध सूखने की कगार पर
  • सारे दिन काम और मजदूरी एक मुट्ठी धान
  • शहीद सौरभ कालिया का नाम याद है आपको?
  • ''निशंक’’ के कंधे पर जनरल की बंन्दूक
  • रद्दी का पुलंदा है लिब्राहन कमेटी की रिपोर्ट
  • बादलों के साथ रसायनिक छेड़छाड़ खतरनाक
  • कैसे भूल गये गैर कांग्रेसवाद का नारा
  • विश्व हिन्दी सम्मेलन,एक टिप्पणी
  • साहित्यकार भी है नरेंद्र मोदी
  • हबीब तनवीर होने का मतलब
  • श्री बदरीनाथ पावन बैकुण्ठ धाम
  • भूटान तक पहुंच गई सिंगुर की आंच
  • राजनीतिक हथियार बना आइला
  • माओवाद- बैरक बनाएगा बीएसपी
  • पंजाब में सरकार निकली खलनायक
  • पंजाबियों के लिए संयम की परीक्षा
  • अर्जुन सिंह का कसूर हैं अर्जुन सिंह होना
  • बंगाल में औंधे मुंह गिरा वाममोर्चा
  • सुभाष बोस से कांग्रेस की दिक्कत क्या है?
  • जेपी की जेल डायरी
  • लाल गलियारा बनाना चाहते है माओवादी
  • हाथी नहीं रहे साथी?
  • चिंता के केंद्र से बाहर हैं बच्चे
  • गंगोत्री धाम के कपाट खुले
  • दो हजार साल पुराना हमाम मिला
  • राजनीति में अपराधियों का बोल-बाला
  • कांग्रेस को बढ़त मिलती नज़र आ रही है
  • चढ़ता पारा और उतरता सर्वजन?
  • असम पर लटकी उल्फा की तलवार
  • साहित्य का भी गढ़ है छत्तीसगढ़
  • बंगाल में चुनाव प्रचार के नायाब तरीके
  • ‘दुर्ग’ पर कब्जे की जंग
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