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इच्छामती में कामनायें बहती हैं
सतीश जायसवाल
 
सरहद के इस तरफ बनगांव है.  यह हमारी हद है. उस पार बांग्लादेश का खुलना जिला है. वह हमारी हद से बाहर है. दोनों के बीच एक नदी है. नदी का नाम है इच्छामती. इच्छामती दोनों किनारों को छू रही है.वर्ष में एक दिन आता है जब दोनों किनारे एक दूसरे से मिलते हैं. नदी अपनी बांहें फैलाकर दोनों को बुलाती है. और लोग आ जाते हैं. उस पार के लोग इस पार आते हैं. और इस पार के लोग उस पार जाते हैं. फिर दोनों मिलकर नदी में उत्सव मनाते हैं.
 
सितंबर महीने का दूसरा पखवाड़ा बंगाल में बेहद उमस भरा समय होता है. लगभग चढ़ते क्वार के इस समय में धान की फसल पक रही होती है. और यह उनके देवताओं के जागने का समय भी होता है. यही वक्त था जब हम पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के ग्रामांचलों से होकर गुजर रहे थे. वह विश्वकर्मा पूजन का दिन था. रास्ते भर पंडाल सज रहे थे और देव प्रतिमाओं की स्थापना हो रही थी. बंगाल में दुर्गोत्सव की तैय्यारियों का समय भी लगभग यही होता है. बारिश के बादल वापस लौट रहे होते है. और कास के भूरे-सफ़ेद फूल खिल रहे होते हैं. बांग्ला फिल्म 'पथेर पांचाली' में सत्यजित रे ने इन भूरे-सफ़ेद फूलों को अनश्वर सौन्दर्य प्रदान किया है. उनसे पहले तो शायद किसी का ध्यान भी इन फूलों पर नहीं गया था. इस से पहले मैंने भी इस सड़क को कहां देखा था, जो कोलकाता से निकल कर बांग्लादेश की तरफ जाती है? और कोलकाता से बाहर निकलते ही, सड़क के दोनों किनारों पर इन भूरे-सफ़ेद फूलों के गुच्छे हवा में डोलते हुए मिलने लगते हैं.
'पथेर पांचाली' का निर्णय सत्यजित रे के लिए काफी तनाव भरा था. उनका मन बेहद उद्विग्न था. किसी एकांत की तलाश में वे महानगर से बाहर निकल कर इधर आये थे. वह इसी मौसम की बात थी. दुर्गोत्सव की तैय्यारियां चल रही थीं. 'ढाकुलिये' अपने ढाक पर अभ्यास कर रहे थे. और आस्थावादी सत्यजित रे का मन भरोसा दिला रहा था कि सब कुछ ठीक होगा. 
नदिया जिले के ग्रामांचलों से होकर गुजरने वाली यह सड़क बंगलादेश की सरहद के साथ-साथ चलती है. अपनी कलात्मक मृण्मूर्तियों के लिए प्रसिद्द कृष्णनगर इसी रास्ते पर है.  कृष्णनगर के साथ भी मेरी एक याद है. एक बार कृष्णनगर की इन कलात्मक मृण्मूर्तियों की प्रदर्शनी हमारे यहां लगी थी. उस प्रदर्शनी में एक ऐसी रूपवती मुझे दिखी जो इन कलात्मक मृण्मूर्तियों की तरह सुंदर थी. इसीलिए मैंने मन ही मन उसका नाम मृण्मया रख लिया. उसे तो अपने इस नाम का कभी पता भी नहीं चलेगा. क्योंकि इस नाम को तो मैंने अपने पास सुरक्षित रख लिया था.  अब यहां, कृष्णनगर में मैं उन कलात्मक मृण्मूर्तियों को गढ़े जाते हुए देख सकूंगा.  
वापस लौटते हुए शांतिपुर में रूकूंगा. और वहां की मशहूर टांगाइल साड़ियां खरीद कर अपने साथ ले जाऊंगा. मुझे समझ में नहीं आता कि इस तरह का ख़याल मेरे मन में क्यों आता है?  किसके लिए आता है ? क्या पता. कहीं, कोई है ही नहीं. फिर भी.शंतिपुरी तांत की साड़ियां बंगाल में और बंगाल से बाहर भी मशहूर हैं. यहां घर- घर में करघे हैं.  इन करघों पर बुनी जाती, और फिर बुन कर करघे पर से उतारी जाती साड़ियों को देखना एक पूरी रचना प्रक्रिया के साथ सीधा साक्षात्कार होगा. एक कलात्मक अनुभूति भी. 
 
इस समय तक यहां धान की  फसलें कट चुकी हैं. और अनाज के खलिहान भरे हुए दिख रहे हैं.  मिट्टी की दीवालों वाली झोपड़ियों पर ताड़ के पत्तों की छाजन है.  और मैं मिट्टी की काली दीवालों पर या लिपी हुई देहरियों पर अल्पना की आकृतियों में मन उलझाता रहा. या बाउल गान के लिए अपनी आसक्तियों को उकसाता रहा. यह मैं अकेला नहीं, बल्कि मेरी तरह के लोकासक्त जन बंगाल में पैर धरते ही बाउल गान के लिए आसक्त होने लगते हैं. या, फिर उस किसी नदी तट के लिए अपने मन को व्याकुल होने देते हैं, जिस तट को भटियाली की धुन अपने में बांध रही हो. इच्छामती का वह नदी तट अभी, पता नही, और कितनी दूर होगा ? मेरे सामने क्वांर की धूप खड़ी थी. धूप का रंग पीला पड़ने लगा था. क्वांर महीने में धूप गर्भ धारण करती है. धूप गर्भवती थी.  
अभी खेत जागे हुए हैं.  और दूर तक सोना बिखरा हुआ है.  पके हुए धान का रंग सोन-सुनहरा हो रहा था. क्वार महीने की गर्भवती धूप पके हुए धान को संतान की तरह सहला रही थी. धान की दूधिया महक हवा में फ़ैल रही थी. दूध  का भारीपन हवा को भारी बना रहा था. ये ही है -- शोनार बांग्ला !  मैंने अपना भाग्य सराहा. यह, इस पार का बंगाल है. बंगाल उस पार भी है -- ए पार बांग्ला, ओ पार बांग्ला ...'' 
बंगाल का यह सोन-सुनहरा विस्तार अखंडित है. जैसा इधर है, उधर भी वैसा ही होगा. उधर, जिधर मैं नहीं जा सकता. क्योंकि अब वह एक अलग देश है. धान के सुनहरे खेतों के बीच इतनी सी भी कोई जगह खाली नहीं छूटी  है. पता नहीं चलता कि कोई एक गांव, जो अभी थोड़ी देर पहले तक साथ-साथ चल रहा था, पीछे कहां छूट गया.  और उसकी जगह कोई दूसरा गांव कहां से साथ हो लिया ? बनगांव, ऐसे ही साथ हो लिया  नदी किनारे पहुंच कर ठहर गया. अब आगे रास्ता नहीं, नदी है.  
 
नदी का नाम इच्छामती है.  इच्छामती इधर है, उधर भी है. उसका एक किनारा इधर है, दूसरा किनारा उधर है. इधर भी बंगाल है, उधर भी बंगाल है. फिर भी बंगाल अलग-अलग है.  पता नहीं कितनी-कितनी इच्छाओं को अपने अंतस में समाये, इच्छामती नदी धूप में अकेली जल रही है. इच्छामती गहरी नदी है. नदी से भी गहरा नदी का मन है.  
नदी के इस पार मैं हूं.  उस पार कोई और संसार है.  उस पार का संसार भी ऐसा ही होगा,जैसा इस पार का संसार. इस पर मेरा अख्तियार है. वह जो मेरे अख्तियार से बाहर है, उस पार मैं नहीं जा सकता.  
वह कोई और देश है. उस पार जाने पर रोक है, इसलिए अखिल ब्रह्माण्ड का सारा रहस्य भी उस पार है. वह मुझे अपनी ओर बुला रहा है. जो अनदेखा है, वह रहस्यमय है. रहस्य का आमंत्रण दुर्निवार होता है.  दो अलग-अलग देशों में आवाजाही के नियम और कायदों से बंधा मैं तो इस पार अटक कर रह गया.  लेकिन मेरा मन ! नहीं माना तो नहीं माना. अब इस पार मैं, और उस पार मेरा मन.  
इच्छामती नदी के उस पार बंगलादेश की अंतर्राष्ट्रीय चौकी है. बीच में सड़क वाला पक्का पुल है. यह पुल नदी के दोनों किनारों को बांध कर रखे हुए है.  ये किनारे दो देशों की सरहदों भी हैं.  पुल ने जो बाँध रखा है, वह दोनों देशों की अखंडित संस्कृति है.  पुल, जो बांध नहीं पाया, वो दो देशों को बांटने वाली सरहदें हैं. सरहदें जो बांट रही हैं वो दो देशों की राजनीतिक सत्ता है.  
पुल के बीचोंबीच आकर एक ट्रक फंसा है. वह ट्रक कुछ इस तरह तिरछा होकर पुल के बीच में फंस गया है कि वहां से लांघने-फलांगने के लिए कोई सेंध तक नहीं बची है.  यहां से लौटना पडेगा. सरहद के इतने करीब पहुंच कर वापस लौटना एक असहाय अतृप्ति को उकसाने वाला था. उस पार, अपना कोई नहीं फिर भी सरहद तक पहुंच पाता  तो वहां से, उस पार के उन लोगों को देख पाता जिनसे कभी कोई मेल-मुलाक़ात तक नहीं. और ना, कभी होने वाली होगी. फिर भी.  देखना और पचानना भी तो एक किस्म के नेह-नाते से जोड़ना होता है ! वहां से आवाज़ लगा कर अपना नाम और पता उस पार के लोगों तक पहुंचा सकता, जिनके नाम और पते से मैं अजान हूं. बदले में उनकी मिली-जुली आवाजें अपने साथ ले आता. बस, यही एक संतोष होता जो मेरे साथ आता.
सरहद के इस तरफ बनगांव है.  यह हमारी हद है. उस पार बांग्लादेश का खुलना जिला है.  वह हमारी हद से बाहर है.  दोनों के बीच एक नदी है.नदी इच्छामती है. इच्छामती दोनों किनारों को छू रही है. फिर भी दोनों किनारे अलग-अलग हैं.
लेकिन वर्ष में एक दिन आता है जब दोनों किनारे एक दूसरे से मिलते हैं. नदी अपनी बांहें फैला कर दोनों किनारों को बुलाती है. उस पार के लोग इस पार आते हैं. और इस पार के लोग उस पार जाते हैं. फिर दोनों मिलकर नदी में उत्सव मनाते हैं. वह 'इच्छामती उत्सव' का दिन होता है. उस दिन दोनों देशों के बीच कोई सरहद नहीं होती. सूर्योदय से सूर्यास्त तक के लिए अंतर्राष्ट्रीय सीमा खोल दी जाती है. भारत और बांग्लादेश, दोनों मिलकर प्रतिवर्ष 21 फ़रवरी को इस 'इच्छामती उत्सव' का समारोह करते हैं. राजनीतिक विभाजनों से परे यह एक सांस्कृतिक उत्सव होता है. और इसके लिए दोनों तरफ के लोगों को पूरे वर्ष भर प्रतीक्षा होती है. 
दोनों तरफ के लोग रात रहते ही नदी-तट पर पहुंच कर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं. शायद कामना करते होंगे कि इस सुबह की कोई शाम ना हो. लेकिन शाम होती है और सूर्यास्त के साथ उनको लौटना होता है. तब नदी कितनी अकेली हो जाती होगी ? 
इच्छामती गहरी नदी है. नदी से भी गहरा, नदी का मन है. गहरी नदी पर ऊंचा पुल है.  पुल पर से नदी दूर दिखती है, लेकिन एकदम सामने है.नदी अपनी आंखों के ऐन नीचे है, लेकिन कहीं और लगती है.  धूप में जलती हुई एक नदी अकेली, अपने में गुमसुम-गुमसुम. मुझे लगा कि शायद मैं नदी को कुछ-कुछ समझ पा रहा हूँ. खूब गहरे मन वाली नदी कभी, अपने मन से भी गहरे, किसी प्रेम में हारी होगी.  प्रेम में हारी हुई नदी का जल एकदम स्थिर था. उस थिरे हुए जल में अपनी डोंगी लिए हुए एक मछुआरा, जाने कब से बैठा था. बिना हिले-डुले . क्वांर की सीझती धूप में अपना बदन जलाता. मालूम नहीं किसके लिए ? उस थिरे हुए जल में बंसी डाले बैठा वह मछुआरा जल से भी स्थिर था. शायद वह समय था और स्मृतियों की पहरेदारी पर था.  
 
मछुआरे का ऊपरी बदन खुला हुआ था. और धूप में जल-जल कर उसका रंग काला पड़ चुका था.  धूप से बचने के लिए उसने खजूर के पत्ते और सींकों से बनी हुई ताईवानी हैट पहन रखी थी. पुल पर से देखने पर उसकी हैट दिखाई दे रही थी. उसका चेहरा नहीं दिख रहा था. जिसका चेहरा नहीं दिख रहा था, वह कोई भी हो सकता था. यहां तक कि  वह, मैं भी हो सकता था. या मेरा एकाकी मन. कहीं ऐसा तो नहीं कि उस पार से वापस लौटता हुआ मेरा मन बीच नदी में अटक गया. और किसी प्रेम में हारी हुई नदी की इच्छा को फिर से जगाने लगा ? शायद, कोई पुराना प्रेम- गीत गुनगुनाने लगा. 
 
उस समय तक मैं सुनीता वर्मा से नहीं मिला था. मिला होता तो कहता कि चलो, देखो कैसे एक नदी चित्र हो जाती है, चित्र गीत बन जाता है औरइच्छाओं को जगाने लगता है. सुनीता वर्मा चित्र बनाती हैं. चित्र बनाते-बनाते, पता नहीं कैसे, उनका मन धातु -शिल्प के पास चला आया. सुनीता का धातु-शिल्प मैंने देखा तो वह मुझे 'कल्प-तरु' दिखा. 'कल्प-तरु' में मैंने कच्चे फल देखे. क्या सुनीता भी कोई नदी हुई ? 
 
इच्छामती एक मत्स्यगंधा नदी है.  नदी की देह-गंध बनगांव में व्यापी हुई थी. लेकिन वहां किसी सत्यवती-शांतनु की कोई पौराणिक गाथा नहीं. बल्कि मिट्टी  की कच्ची दीवालों पर ताड़ के पके पत्तों और तिनकों की छप्परों से ढंके हुए घरों वाला बनगांव है. बनगांव, भारत- बंगलादेश.सरहद पर आखिरी भारतीय गांव है. लेकिन यहां वही बांग्ला बोली जाती है जो उधर बोली जाती होगी. उधर से आने वाले लोगों का पहरावा बिलकुल इधर के लोगों की तरह का  है. दोपहर का वह समय हरहराती हुई भूख का था. भूख के उस समय ताड़ के पके पत्तों और तिनकों की छप्परों वाली एक छोटी सी होटल में मछली और भात का भोजन मिला. शायद उस पार भी ऐसा ही भोजन मिलता. उस पार भी ऐसा ही कोई होटल होगा ! 
 
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