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छतीसगढ़ के राममय रामनामी
सतीश जायसवाल
महानदी का उदगम छत्तीसगढ़ में है. महानदी यहां सिहावा पर्वत से निकलती है और ओडिशा में, पारादीप के पास सागर में मिलती है. उसका यह प्रवाह-पथ महानदी घाटी की संरचना करता है. महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा को एक अविभाजित सांस्कृतिक परंपरा से बांधती है. दोनों की अपनी-अपनी सांस्कृतिक विविधतायें हैं लेकिन इन का पोषण और विकास महानदी के जल से जुडा हुआ है. 
इसके तटवर्ती,छत्तीसगढ़ की तरफ के गांवों में रहने वाले 'रामनामी' समुदाय के लोग और उनके पारंपरिक मेले अपने दर्शन और अपनी दर्शनीयता के कारण दुनिया भर के समाजशास्त्रियों और मानव-विज्ञानियों  के लिये प्रबल आकर्षण का विषय बने. लेकिन यह समुदाय,इनकी चित्र-विचित्र प्रथायें और 100 बरसों से भी अधिक पुराने  हो चुके इनके पारंपरिक मेले अब अपने उतार पर है. इनकी युवा पीढ़ी अपनी उन चित्र-विचित्र प्रथाओं से खुद को अलग कर रही है, जो अब तक दुनिया भर के लोगों के लिये दर्शनीय आकर्षण बनी रही हैं. फिर भी यहां के रामनामी मेलों की परंपरा महानदी घाटी में एक ऐसे सामुदायिक आन्दोलन की कहानी कहती है जिसने एक शताब्दी की अवधि में अपने बुनियादी लक्ष्य को हासिल कर लिया. और अब यह समुदाय समाज की मुख्य-धारा  के साथ जुड़कर अपने सम्मान की जगह को सुरक्षित कर रहा है. 
रामनामी समुदाय के लोग अपने पूरे शरीर पर राम नाम अंकित करवा कर रहते हैं. पुरुष और स्त्रियां सभी. उनके माथे पर काले अक्षरों में गोदा हुआ राम नाम आसानी से पढ़ा जा सकता है. कुछ तो अपनी जीभ पर भी राम नाम गोदवा कर रहते हैं. राम नाम गोदने के लिये ये लोग दो सुइयां काम में लाते हैं. और काले रंग को अधिक पक्का और गहरा बनाने के लिये उस पर मिट्टी के तेल का काला धुंवा करते हैं. धुंवे और कालिख को लेकर ये लोग एक दोहा उद्धृत करते हैं-- धूम कुसंगति कालिख होई /लिखिय पुराण मंजू मसि सोई --'
इनके गुरु गोसांई और प्रमुख लोग रंगीन मोर पंखों वाले बांस के मुकुट धारण करते हैं. इन मुकुटों के कारण ये लोग रंग बिरंगे पंखों की केश-सज्जा करने वाले रेड इंडियनों की तरह नजर आते हैं. वैसे तो भारत में, अंडमान द्वीप-समूह तथा दक्षिण अफ्रीकी देशों के जन-जातीय कबीलों में भी वृक्षों की छाल तथा मिट्टी के नैसर्गिक रंगों से अपने शरीर को चित्रित करने और रंगने की परंपरा है. लेकिन,वहाँ यह परंपरा सजावटी होती है. धार्मिक विधि-विधान के तौर पर अपने पूरे शरीर में ईश्वर का नाम अंकित करने वाला यह, संभवतः दुनिया का, एकमात्र समुदाय है. और यह कोई छोटा-मोटा जन-जातीय कबीला नहीं है. बल्कि अब यह 10 लाख से भी ऊपर की अनुमानित जनसंख्या वाले धर्मावलम्बियों का एक संगठित पंथ है. और इसे जनतांत्रिक व्यवस्था का सबसे सशक्त अस्त्र, अर्थात मतदान का अधिकार मिला हुआ है .
मोटे तौर पर हीराकुंड बाँध के नीचे वाले, छत्तीसगढ़ के मैदानी विस्तार को 'ट्रांस-महानदी' क्षेत्र कहा जाता है. रामनामी समुदाय की जनसँख्या इसी मैदानी विस्तार में केन्द्रित है. छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जातियों में गुरु घासीदास के अनुयाइयों का बाहुल्य है. लेकिन ये लोग अपने को उनसे अलग मानते हैं. ये लोग भक्तिकालीन कवि संत रैदास के  अनुयायी होते हैं. राजनैतिक तौर पर भी ये लोग अपने को अलग और वंचित पाते हैं. इस पंथ के प्रमुखों की शिकायत है कि अनुसूचित जातियों को, मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण का लाभ सुरुजबन्सियों (सूर्यवंशियों) , सदगुरुपंथियों और सतनामियों के बीच ही बंट जाता है. रामनामी लोगों तक उसकी तलछट ही पहुँच पाती है. 
 
परसराम भारद्वाज को इस पंथ का प्रवर्तक बताया जाता है. परसराम भारद्वाज अविभाजित मध्यप्रदेश में बिलासपुर जिले के,मालखरौदा विकासखंड में एक गांव -- चारपारा के रहने वाले थे. उनके समय में इन लोगों के लिए राम- नाम का उच्चारण और रामायण का पाठ निषिद्ध था. क्योंकि ये निचली जाति के लोग थे. तब इस पंथ के प्रवर्तक परसराम भारद्वाज ने अपने लोगों को संगठित किया और इस भेद-भाव पूर्ण निषेध के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया. वह लंबा चला. लेकिन अन्ततोगत्वा 1904  में तत्कालीन मध्यप्रदेश और बरार (संयुक्त) के अंतर्गत जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा इन लोगों को 'राम-नाम' का कानूनी अधिकार दिया गया. इनके पक्ष में निर्णय देते हुए न्यायालय  ने कहा था कि ये लोग जिस राम के नाम को भजते हैं वह दशरथ पुत्र राम नहीं बल्कि निराकार ब्रह्म के प्रतीक राम हैं. 
लेकिन उस भेद-भाव पूर्ण निषेध के कारण इन लोगों के मन में ब्राहमणों के प्रति जबरदस्त विरोध की भावना घर कर गयी. रामनामी पंथ की सामाजिक संरचना में -- जन्म से लेकर मृत्यु तक और विवाह से लेकर संतानोत्पत्ति तक के सारे संस्कारों में से ब्राह्मणों की भूमिका को पूरी तरह से हटा दिया गया है. इन लोगों ने अपने इन सभी संस्कारों का ऐसा सरलीकरण किया कि इन्हें कहीं भी ब्राह्मणों पर आश्रित ना रहना पड़े. इनके यहां का हर संस्कार रामचरित मानस के पाठ से पूरा हो जाता है. मानस पाठ की इनकी विधि भी कुछ अलग होती है. ये लोग प्रत्येक पद या चौपायी के पहले और उसके बाद में भी, दो बार ''राम-राम'' जोड़कर पाठ करते हैं. लेकिन आधुनिक पीढी में तो अब 'रामचरित मानस' के प्रति भी आदर कम हो रहा है, क्योंकि इसका रचयिता एक ब्राहमण है. और इसमें जाति-भेद का वर्णन है. 
रामनामी पंथ में कथा सुनना तथा यज्ञं-हवन आदि के लिए सामाजिक निषेध है. क्योंकि इसके लिये उन्हें ब्राहमणों पर निर्भर रहना पड़ेगा. ब्राह्मणों की शरण में ना जाना पड़े इसलिए ये लोग अपने यहाँ शव-दाह भी नहीं करते,बल्कि मृतकों को मिट्टी देते हैं. और तो और, इन लोगों ने अनुसूचित जातियों के ही -- सतनामियों, सुरुजबन्सियों तथा सदगुरुपंथियों से अपने को इसलिए अलग कर लिया है क्योंकि इन्हें उनके कई संस्कार ब्राह्मण-आश्रित लगते हैं. जैसे सतनामियों में जनेऊ धारण करने की, सुरुजबंसियों में गंगा-स्नान तथा कथा सुनने की और सदगुरुपंथियों में कण्ठी धारण करने तथा मुंडन-संस्कार की प्रथा है. इस अलगाव के बावजूद इनमें आपस में, कहीं-कहीं रोटी-बेटी के रिश्ते किये जाते हैं.
आस्थावादी रामनामियों का एक विशिष्ट जीवन-दर्शन रहा है -- अर्थ न धर्म न काम-रुचि, जनि न चहौ निरबाना.. जन्म-जन्म मम राम-राम पद, यह वरदान न आना.. ''  लेकिन सुधारवादियों का मन अब इस दर्शन से उचट रहा है. 
 
रायगढ़ जिले में, एक पुरानी रियासत-- सारंगढ़ के रास्ते पर छोटा सा गांव है -- गोड़म. और गोड़म से कुछ ही दूरी  पर -- ओड़काकन है. यह-- ओड़काकन रामनामी पंथ के लोगों का प्रमुख धर्म-स्थान है. रामनामी पंथ के लोगों के लिए इस ओड़काकन का वही महत्त्व है जो सतनाम पंथ के लोगों के लिए गुरु घासीदास के प्राकट्य-धाम गिरोदपुरी का है. यद्यपि रामनामी पंथ के प्रवर्तक परस राम भारद्ववाज यहां के नहीं बल्कि चारपारा के निवासी थे. चैत्र माह में रामनवमी पर्व पर ओड़काकन में रामनामी पंथ का वृहत संत समागम होता है.  
रामनामी पंथ में वस्तुतः दो ही प्रमुख पर्व हैं-- एक, रामनवमी पर होने वाला यह वृहत संत समागम और दूसरा, पौष एकादशी से लेकर त्रयोदशी तक चलने वाला त्रि-दिवसीय वार्षिक मेला.  इनके यहाँ प्रमुख सामजिक विषयों तथा विवादों पर सामूहिक निर्णय लेने की प्रथा अभी कायम है. इनसे सम्बन्धित महत्वपूर्ण निर्णय इन दो प्रमुख पर्वों के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं. इनके यहाँ सामूहिक विवाह की प्रथा भी अभी प्रचलित है. ये सामूहिक विवाह  भी इन दोनों पर्वों पर संपन्न कराये जाते हैं. पंथ के रजिस्टर में इन विवाहों का बाकायदा पंजीकरण होता है. और प्रमाण पत्र भी दिये जाते हैं.
 
पौष एकादशी से भरने वाले रामनामी मेले के तीसरे दिन पंथ की महासभा का वार्षिक अधिवेशन भी होता है. इसी
महासभा में यह निर्णय भी लिया जाता है कि आगामी वार्षिक मेला कहां भरेगा ?   
मेले के स्थान क्रमवार बदलते रहते है. एक वर्ष महानदी के बांये तट पर तो, उसके अगले वर्ष नदी के दाहिने तट के किसी गांव में. और इसकी एक निर्धारित प्रक्रिया है. महासभा में आये हुए प्रतिनिधि आगामी वार्षिक मेला के लिए अपने-अपने गांव की तरफ से आवेदन करते हैं. आवेदन के साथ नारियल की भेंट भी चढ़ाते हैं. जिस गांव की ओर से भेंट में सबसे अधिक नारियल आते हैं, वह अगले वार्षिक मेला का दावेदार घोषित कर दिया जाता है. मेला के आयोजन में जितना भी खर्च आता है उसकी पूरी व्यवस्था पन्थ के अपने साधनों से की जाती है. 
मेला-स्थल के केंद्र में एक रामनामी स्तंभ निर्मित किया जाता है. इस स्तंभ की पूजा से मेले का प्रारम्भ होता है. और मेले की समाप्ति के बाद भी यह स्तंभ वहाँ बना रहता है. उस अवसर के स्मारक की तरह.  
इस स्तंभ को घेरकर मेला सजाया जाता है. और उसकी भी एक निर्धारित योजना होती है. पंथ के गुरु गोसाँईयो तथा भक्तों की ''चालनियाँ'' इस स्तंभ के सबसे नजदीक लगती हैं. फिर दूर-दूर से आये हुए व्यापारियों, खेल- तमाशा वालों के पड़ाव पड़ते हैं. इसके बाद ,मेला घूमने के लिए आये हुए भक्तों के शिविरों की कतारें. इन शिविरों  या तम्बुओं को, इनके यहां 'चालनी' कहा जाता है. अपने सारे बदन पर, अमिट काली स्याही से राम नाम का गोदना गोदवाये हुए रामनामी समुदाय के इन लोगों के ओढ़ने-बिछाने के कपडे भी राम नाम अंकित होते हैं. इन चालनियों पर भी, ऊपर से नीचे तक और भीतर से बाहर तक ''राम-राम'' लिखा होता है.   
किसी रामनामी मेले में दिन का तीसरा-चौथा पहर गहमा-गहमी का होता है. पंथ के लोग प्रायः सपरिवार इन मेलों में आते हैं. दोपहर बाद सोकर उठते हैं. स्त्रियां इन 'चालनियों' के पीछे फैले हुए खुले मैदान में ईंटों को जोड़कर चूल्हा बनाती हैं. और भोजन का इंतज़ाम करती हैं. फिर अपनी-अपनी  'चालनियों ' में आकर साज-श्रृंगार करती हैं. और रात पड़ने के साथ सब मिल-जुलकर, मेले में शामिल होने के लिए निकलते हैं. और मेले के साथ मिलकर मेले का हिस्सा हो जाते हैं. 
चूल्हों से उठती हुयी आग की लपक में उपकते और  लालटेन और गैसबत्ती की रोशनी जगमगाते से मेला की हलचल दूर से  दिखाई देती है. और किसी इन्द्रजाल का सा दृश्य रचती है. पूरे शरीर भर 'राम-राम' का गोदना और सर पर रंगीन मोरपंखी मुकुट धारण किये हुए रामनामी गुरु गोसांई और उनके भक्तगण अपने पैरों में घुंघरू बांधकर झूम रहे होते हैं. और मेला,ऐसे ही रात भर चलता रहता है. घुंघरुओं की आवाजों के साथ  'रामचरित मानस' का पाठ हरहराता हुआ,खुले मैदान में दूर तक फैलता चला जाता है. और एक ऐन्द्रजालिक दृश्य को अतीन्द्रिय बनाता रहता है.  
 
 
 
 
 
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