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मायावती का बहुत कुछ दांव पर

नेहा दीक्षित

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को देश भर में एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. हालांकि पार्टी को देश भर में हुए मतदान में 4.2 फीसदी हासिल हुए जो भाजपा और कांग्रेस के बाद सर्वाधिक थे. लेकिन ये वोट सीट में तब्दील नहीं हुए. अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में पार्टी 80 में से 33 जगह दूसरे स्थान पर रही. सन 1989 में पहली बार चुनाव मैदान में उतरी बसपा का यह सबसे बुरा प्रदर्शन था.
इस बात ने पार्टी को आत्मचिंतन पर मजबूर किया. बसपा प्रमख मायावती को समझ में आ गया कि अगर अब भी उन्होंने उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत बनाने का प्रयास नहीं किया राज्य के मतदाताओं पर उनकी पकड़ विधानसभा चुनाव तक एकदम कमजोर हो जायेगी. नतीजे आते ही मायावती ने अपने सहयोगियों से कहा कि अब वह दिल्ली के बजाय लखनऊ में बैठेंगी. 
दिल्ली के एक प्रोफेसर जो मायावती के करीबी हैं, वह याद करते हैं कि मायावती ने उनसे क्या कहा था, 'मैंने दो दिन तक खुद को कमरे में बंद कर गहराई से आत्मावलोकन किया कि आखिर इतने वोट मिलने के बावजूद गलती कहां हुई?' 14 मई को चुनाव नतीजे आये और 20 मई को मायावती ने पार्टी की सारी समितियां भंग कर दीं. अगले चार दिन तक वह प्रदेश के 75 जिलों के समन्वयकों से मुलाकात करती रहीं. उन्होंने बूथ स्तरीय फीडबैक की समीक्षा की. वह इस नतीजे पर पहुंचीं कि बसपा के दलित वोट में जाटव और गैर जाटव ने बड़ी संख्या में भाजपा का साथ दिया. मायावती खुद जाटव हैं और यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दलित समूह है जो लंबे समय से बसपा के साथ रहा है. उन्होंने पार्टी के 10 वरिष्ठ नेताओं के साथ चर्चा में उन्होंने इस बदलाव की दो वजह बतायीं. एक केंद्र में मोदी लहर और दूसरी मुजफ्फरनगर दंगों के बाद धार्मिक ध्रुवीकरण. 
भाजपा का समर्थन आधार हिन्दू वादी है जबकि बसपा ने अपने शुरुआती वर्षों में इसे नकारा. उसने दलितों का आह्वान किया कि धर्म ही उनके सदियों के शोषण का कारण है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के अनुभव ने बसपा को बता दिया कि दलितों खासतौर पर जाटवों का वोट अगर भाजपा को गया तो उसका सीधा असर पार्टी पर पड़ेगा. 
चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती तुरंत सक्रिय हो गयीं. अगले एक साल में उन्होंने पार्टी को भाजपा से लडऩे के लिए तैयार कर दिया. उनकी चिंता को इस बात से समझ सकते हं कि उन्होंने पार्टी के क्षेत्रीय समन्वयकों से उन दलितों का पता लगाने को कहा जो मंदिर जाने लगे हों. मौजूदा विधानसभा चुनाव में मायावती के लिए काफी कुछ दांव पर लगा है. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की हार और 2014 लोकसभा में पार्टी के निराशाजनकर प्रदर्शन ने पार्टी को काफी पीछे धकेल दिया. जबकि एक वक्त मायावती इतनी ताकतवर थीं कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता था. इस चुनाव में अपना खोया आधार वापस लेने के लिए उन्होंने मुस्लिमों को लुभाने की नीति अपनायी. उत्तर प्रदेश में दलितों के अलावा मुस्लिम बड़ी तादाद में हैं. कांशीराम भी इन दोनों समुदायों को साथ लाना चाहते थे. मायावती ने इस चुनाव में यह कर दिखाया है. 
उन्होंने पहली बार 99 मुस्लिमों को टिकट दिया है. माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के परिवार को पार्टी में शामिल किया गया है यानी मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश में मायावती उनके अतीत तक की अनदेखी कर रही हैं. पार्टी ने मुस्लिम और दलित मतदाताओं को साथ जोडऩे का प्रयास भी किया है. उनका कहना है कि भाजपा की 2014 की जीत के बाद दलित और मुस्लिम समान रूप से प्रताडि़त हुए. उत्तर प्रदेश में मोहम्मद अखलाक को मारे जाने और गुजरात के ऊना में गाय का चमड़ा छीलने के आरोप में दलितों की पिटाई ने उनकी इस बात को बल दिया. 
इस बीच भाजपा ने दलित आधार में सेंध लगाना जारी रखा. अप्रैल 2015 में डॉ. बी आर आंबेडकर की जयंती के अवसर पर कई चर्चायें आयोजित की गयीं और दलित नायकों ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहू जी महाराज आदि को हिंदू नायक के रूप में पेश करने का प्रयास किया गया. मायावती ने इसके प्रतिरोध में बसपा की सांस्कृतिक शाखा जागृति दस्ता के पुराने सदस्यों की तलाश शुरू की जो कांशीराम के बाद से ही लुप्त प्राय थे. उनकी इच्छा इसके जरिये भाजपा की काट करने की थी. यह योजना परवान न चढ़ सकी तो उन्होंने युवाओं पर ध्यान लगाया ताकि उनके अभियान के लिए प्रतिभाशाली युवा लेखक, संस्कृतिकर्मी सामने आयें.  इस तरह भीम जागरण सामने आया. माता के जागरण के तर्ज पर होने वाले इन कार्यक्रमों में गीत-संगीत, हंसी-मजाक सब होता है. लेकिन इन सबसे अहम है हिंदूवादी मिथकों को ध्वस्त करना.  2014 से 2016 के बीच ऐसे कई आयोजन किये गये. 
सोशल मीडिया पर भी दलित युवाओं को जमकर जोड़ा गया. उनके बीच मायावती के भाषण और साक्षात्कार वितरित किये गये. यह स्थापित किया गया कि वह इकलौती नेता हैं जो राष्टï्रीय स्तर पर मोदी का मुकाबला कर सकती हैं. सोशल मीडिया पर व्हाट्स ऐप का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जा रहा है. बसपा का मानना है कि फेसबुक और ट्विटर एलीटों के हथियार हैं. लेकिन व्हाट्स ऐप तक सबकी पहुंच है. पार्टी ने हर चार गांव के बीच एक व्हाट्स ऐप ग्रुप बनाया है. दिल्ली के युवा डिजाइनरों की मदद लेकर डिजिटल पोस्टर, वीडियो आदि तैयार किये गये. 
मायावती ने युवाओं को साथ लेने का भी प्रयास किया. उन्हें आभास हो गया था कि पढ़े लिखे शहरी दलित युवा भाजपा की ओर झुक रहे हैं. बसपा के एक विधायक कहते हैं कि ये युवा सामाजिक कारणों से उच्च वर्ग और उच्च जाति की पार्टी से जुडऩा चाहते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में खासतौर पर वे ऐसे कई दलों से जुड़े. इसका प्रतिरोध करते हुए बसपा और बामसेफ ने समता सैनिक दल, भारत मुक्ति मोर्चा, बहुजन मूल निवासी समाज और भीम आर्मी जैसे कई युवा संगठन स्थापित किये. 
मायावती ने 2014 चुनाव के बाद जो व्यापक सुधार किये वैसे ही सांगठनिक सुधार की साक्षी वह सन 1980 के दशक में हो चुकी हैं. उस वक्त उन्होंने उत्तर प्रदेश में अकेले दम पार्टी का ढांचा खड़ा किया था. कांशीराम ने उस वक्त पंजाब और मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्टï्र पर ध्यान केंद्रित किया था. पंजाब में दलितों का अनुपात किसी भी अन्य राज्य से अधिक है. बसपा के संस्थापक सदस्यों में से एक ने बताया, 'उत्तर प्रदेश में पार्टी का कोई आधार नहीं था. दलित और मुस्लिम पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के साथ थे. मायावती ने बिना किसी अनुभव के कड़ी मेहनत से यहां पार्टी को खड़ा किया.'
सन 70 के दशक में कांशीराम से मुलाकात के पहले वह शिक्षिका थीं. उन्हें भी जाति और लैंगिक भेदभाव का सामना पड़ा था. अपनी एक किताब में मायावती लिखती हैं, 'जब मैं बच्ची थी और मां के साथ बस में सफर करती थी तो लोग हमारी जाति पूछते और जब उन्हें पता चलता कि हम 'चमार' हैं तो वे अपनी सीट बदल लेते.' घर पर उनके पिता भाइयों को तवज्जो देते. उन्हें बेहतर स्कूल में भेजा जाता और निजी ट्यूशन मिलता. इस बीच उनका सामना आंबेडकर के लेखन से हुआ. उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाकर जातिगत दमन से लडऩे का तय किया. 
सन 1977 में 21 की उम्र में वह कांशीराम के संपर्क में आयीं. दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में उनके जोरदार भाषण के बारे में सुनकर वह बहुत प्रभावित हुए. सभा के मुख्य वक्ता राज नारायण उस वर्ष इंदिरा गांधी को हराकर चर्चा में आये थे. वह बार-बार दलितों को हरिजन कह रहे थे. मायावती ने माइक पाते ही राज नारायण की आलोचना कर दी. उन्होंने कहा कि वह हरिजन कहकर एक पूरे समुदाय को नीचा दिखा रहे हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि भाषण के बाद लोगों ने नारे लगाकर उनका समर्थन किया. घटना के बारे में सुनकर कांशीराम चुपके से उनके घर गये और उन्हें समझाया कि क्यों उन्हें जातिभेद से लडऩे के लिए सिविल सेवा के बजाय राजनीति में आना चाहिये. पिता के दबाव बनाने मायावती ने घर छोड़ दिया और करोलबाग में कांशीराम के एक कमरे के घर में रहने आ गयीं. यह बहुत साहसिक और जोखिमभरा कदम था. मायावती को पहली चुनावी जीत 1989 के लोकसभा चुनाव में बिजनौर में मिली. कांशीराम की तुलना में वह चुनावी राजनीति में जबरदस्त सफल रहीं. उनकी सफलता ने उन्हें वह कद प्रदान किया जो आज उनके साथ है. 
पार्टी में टिकट वितरण अक्सर विवाद का विषय रहता है. कई सदस्य आरोप लगा चुके हैं कि मायावती टिकट बेचती हैं. विधानसभा चुनाव के पहले एक बार फिर इन आरोप का दौर शुरू हुआ. हाल ही में बसपा छोड़कर भाजपा में गये नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, 'मायावती कांशीराम की विरासत को बेच रही हैं. वह दलाल हैं और उन्होंने पार्टी को धंधा बना दिया है.' टिकट बेचने के आरोप से कोई इनकार नहीं करता. एक पूर्व प्रमुख सचिव इसकी वजह बताते हुए कहते हैं  कि बसपा को कारोबारी संरक्षण उतना अधिक नहीं मिला. जेपी और वेव जैसे कुछ कारोबारी समूह सपा, बसपा दोनों के करीबी रहे. पार्टी अपने समर्थकों से आर्थिक मदद लेने की हिमायती रही है. 
बसपा की दलित-मुस्लिम एकता की नीति को भांपकर भाजपा ने आरएसएस काडर के साथ मिलकर दलित बस्तियों में बैठकें शुरू कीं. बसपा ने इस बात पर जोर दिया कि मायावती के राज में मुस्लिम अधिक सुरक्षित रहे हैं. लेकिन उसे लगातार इस धारणा से लडऩा पड़ रहा है कि वह भाजपा के साथ सरकार बनाने में गुरेज नहीं करती. शायद इसीलिए पार्टी मुस्लिम नेताओं का कद बढ़ा रही है. पार्टी कभी खुद को धर्मनिरपेक्ष नहीं कहती है. यह बात उसके खिलाफ जा सकती है. बसपा के संस्थापक कांशीराम की मशहूर उक्ति है कि हम अवसरवादी हैं. 
2007 में वह सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से सत्ता में आयीं. उस वक्त ब्राह्मïणों को पार्टी में खूब तवज्जो दी गयी. पार्टी के अनुमान के मुताबिक 18 फीसदी दलितों और 15 फीसदी ब्राह्मïणों के वोट के साथ पार्टी सत्ता में आ गयी थी. उसे 30.04 फीसदी मतों के साथ 403 में 206 सीट मिलीं. इसके बावजूद पार्टी दलितों और ब्राह्मणों को जोडऩे में लगी रही. सतीश चंद्र मिश्रा पार्टी के शीर्ष तीन नेताओं में से एक थे. उन्होंने भाईचारा समितियां बनाई. मायावती की मूर्तियां बनवाने की योजना की तमाम बुराइयों के बावजूद उनके साथ काम कर चुके पूर्व प्रमुख सचिव कहते हैं कि प्रदेश में बड़ी परियोजनाओं का चलन मायावती ने शुरू किया. इसमें भारी रिश्वत शामिल होती थी. इसके बावजूद ये परियोजना दलित चेतना के विस्तार की दृष्टिï से अहम साबित हुई.पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं से मिलने पर उनकी समझ और राजनीतिक चेतना से रश्क होता है. इससे पहले केवल वाम दलों में ही इतनी समझदार महिला कार्यकर्ता देखने को मिलीं थीं।
 
( कारवां मैगजीन से साभार, आलेख का संक्षिप्त अंश.)
 
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