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बर्फ़बारी-हिमालय को मिलता है नया जीवन
अंबरीश कुमार 
जनवरी के पहले हफ्ते के खत्म होते होते ज्यादातर हिमालयी राज्यों में भारी बर्फ़बारी हुई तो आसपास के सैलानी उन इलाकों की तरफ चल पड़े जहां बर्फ गिर रही थी ।दिल्ली से कोई शिमला की तरफ निकला तो कोई मसूरी नैनीताल की तरफ ।इन पुराने हिल स्टेशन जाने में अब वक्त भी कम लगता है और पांच से छह घंटे में उतराखंड के दोनों पहाड़ी सैरगाह तक पहुंचा जा सकता है । शिमला पहुंचने में कुछ समय और लगता है पर कश्मीर के श्रीनगर तक हवाई यात्रा तो घंटे सवा घंटे की ही है।दरअसल आम लोगों के लिए पहाड़ी सैरगाह में बर्फ़बारी देखना काफी रोमांचक लगता है ।पर यह बर्फ़बारी समूचे हिमालय क्षेत्र को पुनर्जीवन देती है ।किसान और बागवान को बर्फ़बारी का बेसब्री से इंतजार रहता है ।हालांकि पहाड़ पर बर्फ़बारी से स्थानीय लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है ।बिजली कई कई दिन तक गायब हो जाती है ।नल का पानी जम जाता है । सड़क पर बर्फ जम जाने के बाद सब्जी भाजी से लेकर दूध दही तक की सप्लाई प्रभावित हो जाती है । सैलानी तो होटल में जेनरेटर की रौशनी में रह लेता है पर ज्यादातर लोगों को अंधेरे में रहना पड़ता है ।इस सबके बावजूद वह इस बर्फ़बारी का स्वागत करता है ।
हिमालयी नदियों को नया जीवन मिलता है तो समूचा पहाड़ रिचार्ज हो जाता है।कश्मीर में झेलम नदी जिसे कश्मीरी व्यथ कहते है उसका जल स्तर लगातार नीचे जा रहा था।हाल के कुछ दशक में झेलम में इतना कम पानी कभी नहीं रहा।श्रीनगर में झेलम का पानी न सिर्फ कम होता जा रहा था बल्कि यह नदी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है।भारी बर्फ़बारी से झेलम को जीवन मिला ।ऐसी बहुत सी पहाड़ी नदियां हैं जिन्हें बर्फ़बारी से जीवन मिल जाता है ।हिमाचल ,उतराखंड से लेकर पूर्वोत्तर तक .दरअसल मैदानी इलाकों में बागवानी का जो चक्र होता है वह हिमालयी अंचल में ठीक उल्टा हो जाता है।मैदानी इलाकों में लोग फलदार पौधे बरसात में लगाते हैं तो पहाड़ पर सेब ,नाशपाती ,आडू खुबानी आदि के पौधे बर्फ पड़ने के बाद लगाए जाते है ।सेब नाशपाती जैसे फलों के लिए यह बर्फ़बारी वरदान होती हैं क्योंकि साल में कम से कम साठ दिन इन पौधों को शून्य डिग्री का तापमान जरुर चाहिए होता है।इस तापमान में जमीन में रहने वाले हानिकारक कीट खत्म हो जाते हैं।यही वजह है कि सेब के बागवान बर्फ़बारी का बेसब्री से इंतजार करते हैं।जो सेब कुछ दशक पहले तक सिर्फ कश्मीर घाटी में ही ज्यादा होता था वह अब सबसे ज्यादा हिमाचल प्रदेश में होता है ।उतराखंड की फलपट्टी जो भवाली ,रामगढ़ ,सतबुंगा और मुक्तेश्वर तक फैली हुई है उसमे अब फिर से विदेशी प्रजाति के हाई ब्रीड सेब को लगाया जा रहा है ।एक दौर में यहां सेब काफी होता था पर मार्केटिंग की समस्या और कोई प्रोत्साहन न मिलने की वजह से सेब की जगह बागवान आडू लगाने लगे जिसकी खाड़ी देशों में ज्यादा मांग है।यह बात अलग है कि कुमायूं अंचल के किसान और बागवान करीब एक दशक से बंदरों से परेशान है।शहरी इलाकों से बंदर पकड़ कर फल पट्टी में छोड़ दिए जाते है ।और सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती है ।पर इस सबके बावजूद बागवानो को बर्फ़बारी का इंतजार रहता है।इस बार अगर शिमला में पच्चीस साल का रिकार्ड टूटा तो उतराखंड में भी उन इलाकों में बर्फ गिरी जहां दो दशक से बर्फ नहीं गिरी थी ।इस वजह से पानी के परम्परागत स्रोत भी रिचार्ज हो जाएंगे तो नदियों को भी पानी मिलेगा ।पहाड़ पर हर साल गर्मियों में पानी का संकट पैदा हो जाता है।पिछले दो दशक में पहाड़ पर पहाड़ी कम मैदानी लोग ज्यादा जा रहे है ।हिमालय के खूबसूरत द्रश्य जिस भी जगह से दिखते हैं उन सभी जगहों पर मैदानी लोगों की रिहाइश बढ़ रही है ।दूसरे होटल और रिसार्ट भी बढ़ रहे हैं।इस वजह से ऐसे इलाकों में बेतरतीब निर्माण हो रहा है और पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है।ज्यादातर होटल रिसार्ट वाले पानी के परम्परागत स्रोत को खत्म कर निर्माण कर देते है जिससे पानी का संकट और गहरा जाता है ।मार्च अप्रैल आते आते पहाड़ पर पानी के टैंकर दौड़ने लगते है ।ऐसा नहीं कि ये कहीं और से पानी लाते हैं ये भी पानी के परम्परागत स्रोत से पानी लेते है जिससे आम लोगों के पानी का हिस्सा भी घट जाता है ।ऐसे में पहाड़ के लोग बरसात और बर्फ़बारी के ही भरोसे रहते हैं ।बरसात अगर कुछ कम हुई हो तो बर्फ़बारी से उसकी भरपाई हो सकती है।साभार - हिंदुस्तान 
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