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गांव ,किसान और जंगल
अंबरीश कुमार 
लगातार यात्रा के चलते लिखना कम हो पा रहा है । कल लौटे और कल मुंबई के लिए निकलना है वह भी ट्रेन से ,आरक्षण कन्फर्म हो गया तब ।फिर पुणे में समाजवादी समागम और एनएपीएम का सम्मलेन ,वापसी फिर मुंबई होते हुए ।अभी अमिताभ श्रीवास्तव ने बहराइच की यात्रा पर टिपण्णी कि तो लगा कुछ और लिख दिया जाए ।वैसे भी जंगल से अपना लगाव कुछ ज्यादा है और इस अंचल के जंगल में कई बार आना हुआ है  ।निशानगाढ़ा के 1857 के आसपास बने अंग्रेजो के शिकारगाह में भी रुका तो कतरनिया घाट में जंगलात विभाग के डाक बंगले में भी। दो साल पहले नया साल इन्ही जंगलों में बिताया था क्योंकि यह जगह गुजरात के मशहूर गिर के जंगल से ज्यादा खुबसूरत है ।यहां की जैव विविधिता  भी अद्भुत है ।जानवर और पक्षी तो देखते बनते है ।कल ही ड्राइवर को बता रहा था कि पिछली बार दिसंबर के अंत में जब आया तो भारी बरसात में जंगली मुर्गे ,हिरन और कई तरह के जानवर रास्ते भर सड़क पर ही दिखे ।पर इस बार नहर के किनारे कोई जानवर रात में नही मिला ।
बहरहाल सरदार गुरुनाम सिंह के यहां रात खाना शुरू हुआ तो उनके एक भाई बाहर ले जाकर कान में बोले ,सर कुछ ड्रिंक वगैरह ? मैंने कहा , नहीं ।दरअसल वहां का माहौल ही ऐसा नहीं था कि इस तरह का आयोजन ठीक लगे ।सरदार जी के भाई और पिता के साथ भरा पूरा परिवार खाने के इंतजाम में लगा था ।जिस जगह बैठे थे उसी खेत की अरहर की दाल, सब्जी और पाकिस्तानी बासमती चावल ।समूची थाली खेत कि थी और घी मक्खन भैसों का ।वे बड़ी जोत के किसान है पर रहन सहन लगता है छोटे बड़े सभी किसानो का एक जैसा ही होता है ।बहुत सामान्य सा पक्का घर और वैसा ही सामान्य सा फर्नीचर ।सोने के लिए खटिया भीतर भी थी तो बाहर भी ।बाथरूम वगैरह घर से अलग ।
ज्यादातर सब्जियां खेत पर ही होती और कुछ की लतर ये जंगल से लाते ।बोले - जी एक हरा हरा फल जैसा होता है जिसपर छोटे छोटे रोयें निकले रहते है वह सब्जी बड़ी अच्छी लगती है तो जंगल से उसकी लतर लाकर लगा दी और वह भी तैयार हो गई ।यह इलाका काला नमक का है पर जबसे सरदारजी का आगमन हुआ है वे अपने नए प्रयोगों से आसपास के किसानो को भी समृद्ध कर रहे है ।वे पाकिस्तानी बासमती बोते है जिसकी कीमत करीब दो सौ रुपए किलो हरियाणा पंजाब में मिल जाती है जबकि काला नमक का बाजार नहीं मिलता ।और उत्तर प्रदेश में किसानो से बाजार का कोई संबंध विकसित ना हो पाए यह प्रयास हर सरकार ने किया है जिसका नतीजा यह है कि तराई की इस उर्वरा जमीन का किसान भी बहुत गरीब है । पंजाब के किसान का नजरिया अलग होता है और पूर्वांचल के किसान का अलग ।
यह बात हरित स्वराज की सभा में आए ज्यादातर किसानो को देख कर लगा भी जो पिछड़ी और दलित जातियों के थे ।वे मायूस से दिखते है ।वजह गरीबी और खेती किसानी से जीवन गुजर नही हो पाना ।रास्ते में बहुत से बच्चे तालाब के उथले पानी में कुछ तलाशते मिले तो सविता ने पूछा कि ये क्या तलाश रहे है तो मैंने बताया कि मछली ।कुशीनगर में इसी तरह बच्चों को कीचड़ से सिधरी मछली तलाशते देखा था ।इस जंगल के इलाके से जब लखनऊ लौट रहे थे तो बहुत से अद्भुत महल दिखे खैराबाद में एक तो मंदिर की तरह ।इसी तरह एक भव्य दरवाजा भी दिखा रूमी दरवाजे जैसा ।रास्ते में महिलाएं पूजा की थाली लिए तालाब जाती मिली तो सविता ने उनसे बात की पता चला मनिचिंता देवी की कोई पूजा हो रही है ।
अभी तराई के पुराने साथी रामेन्द्र जनवार ने एक टिपण्णी की है जिसके साथ इस लेख को विराम दे रहा हूँ ।
 
अँबरीष जी मेरे बाबा के बाबा राजा महेश सिँह ने 1857 मेँ बेगम हज़रत महल का साथ दिया था...बेगम की हार और बरास्‍ता लखीमपुर नेपाल निकल जाने के बाद अपनी रियासत गँवाकर राजा महेश सिँह नेँ अपने 5 साल के बच्‍चे अभिमान सिँह ( मेरे परबाबा ) और उस बच्‍चे की सौतेली माँ के साथ अँग्रेजोँ से बचकर इन्‍हीँ तराई के जँगलोँ मेँ भटकते हुए आखिरी साँस ली..बाद मेँ सौतेली माँ ने बच्‍चे की परवरिश के लिए हमारे खानदानी पयागपुर के जनवार राजा से मदद लेकर उनसे मिली कुछ गाँवोँ की जागीर से अभिमान सिँह की परवरिश की....यह जँगल हमारी देह मेँ बसा है...हमारी आत्‍मा मेँ है...हमारे पुरखोँ ने अँग्रेजो से लडकर हारने के बाद इन्‍ही जँगलोँ मेँ आखिरी साँसे ली है....हालाँकि पावागढ ( गुजरात ) से गजनबी से लडाई के बाद वहाँ से बहराइच ( भिनगा ) आए हमारे पूर्वज बरार शाह ( अँग्रेजी मैं वारियर शाह ) ने यहाँ से गोँडा तक जो जनवारोँ की 7 रियासतेँ बनाईँ उनमे राजा महेश सिँह के अलावा बलरामपुर , पयागपुर आदि सबने अँग्रेजोँ का ही साथ दिया था...मुझे राजा महेश सिँह का वँशज होने पर गर्व है...और इस बात की खुशी भी कि हमारे मित्र अँबरीष जी भी उन जँगलोँ मेँ भटक आए...
 
 
 
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