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नदियों पर मंडराया संकट

अंबरीश कुमार 

उतराखंड में भवाली से मुक्तेश्वर की करीब पैंतीस किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा में आज से एक दशक पहले हर दूसरे मोड़ पर पानी फेंकता एक न एक झरना दिख जाता था और बरसात में तो यह संख्या और ज्यादा नजर आती ।हाल ही में जब इस रूट पर यात्रा की तो आधे से ज्यादा झरने गायब थे ।कुछ में पानी सिर्फ रिस रहा था तो कुछ सूख चुके थे यह बरसात के बाद सितंबर महीने का हाल था । इस अंचल में पानी के कई तरह के स्रोत होते है जो अलग अलग नाम से भी प्रचलित है मसलन स्रोत ,नौला और झरना आदि । इसका पानी अन्य काम के साथ ही पीने के पानी का बड़ा स्रोत भी है ।पर जबसे पानी के इस स्रोत पर संकट आया तो इससे पानी लेकर बहने वाली पहाड़ की छोटी छोटी नदियों पर भी संकट मंडरा रहा है ।खासकर गैर हिमानी नदियों पर जो ग्लेशियर की बजाय पानी के स्रोत ,चश्मे और झरने आदि से अपने को समृद्ध करती है ।अल्मोड़ा में आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले आसपास पानी के तीन सौ स्रोत या नौला होता था जबकि आज सिर्फ दस नौला बचा है और हर साल अप्रैल आते आते अल्मोड़ा में पानी का संकट शुरू हो जाता है क्योंकि कोसी नदी का पानी बहुत कम हो जाता है ।अल्मोड़ा से नैनीताल तक यह नदी करीब दो लाख लोगों के पानी की जरुरत को पूरा करती थी जो अब खुद संकट में है ।यह पानी के परम्परागत जल स्रोतों के ख़त्म होने से हुआ है ।पहाड़ के इस अंचल में करीब दो दर्जन नदियां पानी के परम्परागत जल स्रोत पर निर्भर है और जबसे जल स्रोत कम होने लगे है ये नदियां भी लुप्त होने की स्थिति में आ गई है ।कुछ नदियां तो सिर्फ बरसात में अपने नदी होने का अहसास दिलाती है बाकि समय नहीं । 
 
इसी अंचल में एक नदी बहती थी शिप्रा जो पानी स्रोत से बनती थी ।अब अगर भवाली से मुक्तेश्वर की और बढे तो श्यामखेत के पास इस नदी के उद्गम स्थल को देख कर हैरान हो जाएंगे ।पहाड़ से फूटती इसकी एक धारा के आगे एक बड़ा मकान बन चूका है और यह पहाड़ी नदी अब बगल से घूम कर जाती है ।नीचे श्यामखेत की घाटी में जहां यह नदी पहले बहती थी वहां अब सड़क है और इस नदी की धारा को मोड़कर नाला बना दिया गया है ।बाकि इस नदी के पाट और खादर के हिस्से पर अब आलीशान एपार्टमेंट बन चुके है ।यह नदी जो अब एक नाले के रूप में भवाली के बड़े नाले में जब मिलती है तो उस संगम से पहले नगर पालिका का एक बोर्ड लगा दिखता है जिसमे बताया गया है कि यह शिप्रा नदी है और इसमें कूड़ा डालना सख्त मना है ।दुर्भाग्य यह है कि इस जगह सिर्फ कूड़ा नजर आता है कोई नदी या नाला नहीं ।यह एक उदाहरण  है किस तरह पानी के स्रोत पर कब्ज़ा किया जा रहा है और उसके चलते कैसे एक नदी ख़त्म हो रही है ।दरअसल इस पूरे इलाके में अंधाधुंध निर्माण हुआ और कई बार पहाड़ काटने के लिए बड़ी मशीनों और विस्फोटको का इस्तेमाल  किया गया जिससे पानी के स्रोत ख़त्म हो गए ।पहले सड़क बनाने के लिए मजदूर पहाड़ को हाथ से काटते थे पर अब जेसीबी मशीन सीधे पहाड़ गिरा देती है । इसी सड़क पर आगे गागर के पास एक बड़ा रिसार्ट और आवासीय परिसर जब बनाया गया तो पहले जंगल साफ़ किया गया बाद में सीमेंट कंक्रीट का जंगल बना दिया गया ।नतीजतन इस पहाड़ी के पानी के करीब दर्जन भर स्रोत और झरने जिससे आसपास के गाँव वाले पानी लेते थे सब ख़त्म हो गए ।अब यह हाल है कि इस परिसर में जिन्होंने फ़्लैट या मकान खरीदा है वे टैंकर से पानी मंगाते है जिसकी कीमत करीब डेढ़ हजार रुपए प्रति टैंकर पड़ती है ।अप्रैल से जून तक इस इलाके में वैध और अवैध टैंकरों से पानी का धंधा चलता है ।खासबात यह है कि ये टैंकर आसपास के पानी के दुसरे स्रोतों से पानी लेकर बड़े लोगों और होटल आदि को बेच देते है ।इस तरह पहाड़ के गांवों में रहने वाले लोगों के पानी की भी कटौती की जा रही है ।
इन स्रोतों के ख़त्म होने से बहुत सी छोटी छोटी नदियों का पानी सूख जाता है और जब नदी सूख जाती है तो उसपर अतिक्रमण का नया सिलसिला शुरू हो जाता है ।पानी का यह संकर समूचे हिमालयी अंचल में देखा जा सकता है ठीक इसी तरह ।चाहे कश्मीर हो या हिमाचल या फिर असम अरुणाचल आदि ।
शिलांग से आगे देश का मशहूर चेरापूंजी अब ज्यादा बरसात की वजह से नहीं जाना जाता है और उसका वह ऐतिहासिक झरना भी अब सिकुड़ चुका है ।शिलांग से चेरापूंजी के रास्ते  में अब वे झरने भी बहुत कम हो गए है जो दशक से पहले हुआ करते थे ।जलवायु परिवर्तन का असर तो पड़ा है पर प्रकृति से इंसानी छेड़छाड़ का ज्यादा असर पड़ रहा है जिसका खामियाजा भी इंसान को ही उठाना पड़ेगा ।साभार -दैनिक हिंदुस्तान 
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