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दोस्ती के नाम एक तोहफा है अमां यार

दोस्ती के नाम एक तोहफा है अमां यार

भोपाल,  जून, माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ,भोपाल में प्रसारण पत्रकारिता के फाइनल सेमेस्टर के छात्र  हिमांशु
बाजपेयी की कविताओं का पहला संग्रह "अमां यार" के नाम से अपर्णापब्लिकेशन भोपाल ने प्रकाशित किया है । हिमांशु की इस पुस्तक का विमोचन ३ जून को माखन लाल विश्वविद्यालय के वार्षिक- उत्सव प्रतिभा-२००९ के अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्रा द्वारा किया जाएगा ।
लखनऊ निवासी हिमांशु का ब्लॉग भी अमां यार के ही नाम से है (http://kavihim.blogspot.com ) सामजिक मुद्दों में रूचि रखने वाले
हिमांशु आकशवाणी भोपाल से भी जुड़े रहे हैं , और अपने फिल्मोग्राफी स्पेशल प्रोग्राम्स के लिए सराहे भी गए हैं । फिलहाल मीडिया में शुरूआती अवसर तलाश रहे हिमांशु से फ़ोन - 9981907330, और ई मेल -kavi.him@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता  है ।
अमां यार हिमांशु की उन कविताओं का संकलन है जिन्हें उन्होंने भोपाल मेंरह कर पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान लिखा है । हिमांशु की ये कविताएँ मुख्यतः एक युवा-मन की संवेदनाओं के इर्द-गिर्द घूमती हैं ।  हलाँकि अपनी इस पुस्तक के बारे में ख़ुद हिमांशु का कहना है की ये कविताएँ साहित्य के किसी मठ में शरण पाने की गरज से नही लिखी गयीं हैं , न ही इनसे हिन्दी कविता के किसी नए गोत्र का उद्भव होने वाला है , "अमां यार" को दरअसल काव्यकृति के रूप में नही बल्कि यारों की उस महफिल के रूप में देखा जाना चाहिए जो कॉलेज कैंटीन में या ऑफिस के बाहर चाय की गुमटी पर सजती है । दोस्ती के नाम समर्पित इस कविता संग्रह "अमां यार" का प्राक्कथन मशहूर शायर बशीर बद्र साहब ने लिखा है , इसके अलावा लखनऊ के विख्यात इतिहासकार डॉक्टर योगेश प्रवीण और मध्य-प्रदेश के कला कर्मी विनय उपाध्याय ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए हैं । माखन लाल विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने भी "अमां यार" के रूप में हिमांशु की कोशिश की
सराहना की है और हिमांशु की कविता के अनूठे विषयों को भी सुखद बताया है ।इन्टर्नशिप , कैम्पस प्लेसमेंट , जैसे  कुछ बिल्कुल नए विषयों वाली इस पुस्तक दो कुछ कविताएँ नीचे दी जा रही हैं -
 1-   मरासिम
 
हवाएं बहुत तेज़ चल रही हैं ,
आओ दोस्त !एक दूसरे को थाम लें...
क्यूंकि मरासिम -
ज़िन्दगी की शाख पर
पत्तों जैसे, खरे होते हैं ।
जो टूट कर गिरे ,
फिर कम ही हरे होते हैं ...

२-आतंकवाद
मैं सोंचता हूँ.....
हर विस्फोट के बाद ,
मुल्क को लगी ,चोट के बाद ।
 बेरहम दहशतगर्द !
कितना कुछ कर डालते हैं ,
और अपने गुनाह का बोझ ,
खुदा के सर डालते हैं ।
खुदा अपने आप को ,
कितना बेबस पाता होगा !
ऐसे खुदापरस्तों पर ,
खुदा बहुत शर्माता होगा

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