दिनेश शाक्य
इटावा,मई । राष्ट्रीय पक्षी मोर की प्रजाति खतरे मे है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मोर बहुतायत में पाए जाते हैं लेकिन अब राष्ट्रीय पक्षी मोर पर संकट है। फसलो की रखवाली के मद्देनजर खेतो मे डाले जाने वाले कीटनाशक मोर के बडे दुश्मन बन गए है। आम तौर पर देखा गया है आज कल बाजार मे बेचे जाने वाले कीटनाशक बडी ही तीव्रता वाले आ रहे है। किसान इन्ही कीटनाशक का इस्तेमाल अपनी फसलो को सुरक्षित रखने के लिए कर रहा है। आज यही कीटनाशक मोरो की मौत का सबसे बडा कारण बना हुआ है। इटावा जिले के उसराहार इलाके में राष्ट्रीय पक्षी मोरों के कई जोडों के मरने की खबर ने वन विभाग को हरकत में ला दिया है। करीब डेढ दर्जन मोरो की मौत ने वन अमले को सकते मे ला दिया है। वन अधिकारियों की माने तो ऐसा लगता है कि फसलों में डाले जाने वाले कीटनाशक के सेवन कर लेने से मोरों के मरने का अनुमान लगाया जा रहा है। उन्होने ग्रामीणों से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि इस इलाके में शिकारी सक्रिय नहीं है। इसलिए इसे अभी शिकारियो की करतूत नहीं कहा जा सकता है।
इटावा मे एक अर्से से मोरो के मरने के मामले सामने आते रहे है और वन अमला हर बार अपनी ओर से मरे हुए मोरो को पोस्टमार्टम कराने के साथ साथ किसानो के खिलाफ मामला दर्ज करके इतिश्री कर लेता है। लेकिन आज तक किसी भी के खिलाफ कार्यवाही ना करना यह बताता है कि वन अमले मे कोई हिम्मत नही है। तकनीकी तौर पर मोरो के मरने वाले पशु चिकित्सको की ओर से हमेशा मोर को बिसरा सुरक्षित रखने के साथ परीक्षण के लिए कोई भी टेस्ट रिर्पोट नही आ पाती है। इसी का फायदा मिलता है कीटनाशक का इस्तेमाल करने वालो के खिलाफ कोई कार्यवाही नही कर पाता है वन अमला। प्रभागीय वन निदेशक सुदर्शन सिंह ने मोरों के मरने वाले गांव का दौरा करने के बाद बताया कि किसानों ने अपने खेतों में जिन कीटनाशक को फसलों को सुरक्षित रखने के लिए डाला है उसी वजह से इन मोरों के मरने की घटना हुई है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वन अघिकारी सही रिपोर्ट नहीं दे रहे है। बताते चले कि इटावा मे मोरो की खासी तादाद है जिनको इटावा के खेतों की ओर बागो में आसानी से भ्रमण करते हुए देखा जा सकता है। इसी को लेकर इटावा में हर साल मोरों की गणना भी कराई जाती रहती है जो कि सिर्फ एक औपचारिकता भर ही समझी जाती है।
सोसायटी फार कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव डा राजीव चौहान का कहना है कि इटावा मोरो की बहुतायत का एक बडा केंद्र बना हुआ है। लेकिन किसानो की ओर से अपनी फसल की अधिक से कमाई के कारण कीटनाशक का इस्तेमाल करने के कारण मोरो की जान मुश्किल मे फंसी हुई है। रोज मोरो की मौत पर्यावरण प्रेमियों को चिंतित कर रखा है। कहने को तो हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर है। लेकिन दिनोदिन विलुप्ति के कागार पर पहुंच रहें मोरों की प्रजाति की तऱफ से सरकार निरंतर लापरवाह बनी हुई है। मोर के अद्भुत सौंदर्य के कारण भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया। भारत में मोर को शुभ माना जाता है। हिंदू धर्म में तो इसका विशेष स्थान है। भगवान कृष्ण के मुकुट में लगा मोर का पंख इस पक्षी के महत्व को दर्शाता है। महाकवि कालिदास ने महाकाव्य मेघदूत में मोर को राष्ट्रीय पक्षी से भी अधिक ऊंचा स्थान दिया है। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारे देश में सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट आई है। इसका असर पवित्र माने जाने वाले इन मोरों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। इटावा जनपद के ताखा, ऊसराहार, भरथना, बकेवर और जसवंतनगर क्षेत्र में मोरों के मरने का यह अनवरत सिलसिला आज भी जारी है।
राष्ट्रीय पक्षी समेत अन्य प्रजातियों के विलुप्त होते पक्षियों का अस्तित्व बचाने के लिए तमाम जतन करने में लगी हुई है। वहीं सुबे में एक ऐसा तबका भी है जो न सिर्फ विलुप्त हो रहे पक्षियों का शिकार करते हैं साथ ही उनके अंगों का व्यवसायिक इस्तेमाल भी खुलेआम करते हैं। हम यहां बात कर रहे हैं मोर पंख की।इटावा के़ बाजारों में इन दिनों दर्जनों युवकों की टोलीभारी मात्रा में राष्ट्रीय पक्षी मोर के पंखों से बने सामानों की बिक्री करते हुए दिखाई देते है। महज पांच से लेकर पचास रुपए तक के दाम देकर आप मोर पंख से बनी वस्तुओं को बड़े ही आसानी से ले सकते हैं।