स्वामीनाथ शुक्ल
अमेठी अप्रैल। सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद जिले के 1761 स्कूलो में बच्चो के भोजन पर सकंट खड़ा हो गया है। जिससे रोजाना करीब ढाई लाख बच्चे भूखे पेट वापस घर लौट रहे है। इस बात को लेकर बुद्धिजीवी और अभिवावक भले ही परेशान है। पर शिक्षा महकमे के अधिकारी मिड-डे मील योंजना में आने वाले सरकारी धन और अनाज की हेरा फेरी में जुटे है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से जिले के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयो के मिड-डे-मील योजना के चूल्हे बन्द पड़े है। इससे भी बुरा हाल छात्र-छात्राओं के शिक्षा का है। कही रसोइया और ग्राम प्रधानो का विवाद तो कही धन और शिक्षको का झमेला बताया जा रहा है। कारण जो भी हो पर अधिकारी बोलने से कतरा रहें है। पर जिलाधिकारी विद्य ाभूषण सिंह ने जनसत्ता से कहा कि अधिकारियो की टीम गठित कर सभी स्कूलो की शिक्षा व्यवस्था और मिड-डे-मील योजना की जांच करायी जायेगी। सर्व शिक्षा अभियान के दौर में सरकार का एक नारा है कि सब पढ़े सब बढ़े इस जुमले को साक्षरता मिशन से खुब बुलन्दी दी गई । प्राथमिक पाठशाला की दीवारों पर बना बड़ी सी पेंसिल और पास में बैठे दो बच्चो का चित्र लोगो को शिक्षा से जोड़ने के लिए जागरूक करता है। लेकिन हकीकत में यह अभियान हर कदम पर अन्तिम सांसे ले रहा है। कही एक लब्यों की
फौज गुरू द्रोण का इन्तजार कर रही है। तो कही पांडवो के लिए गुरूओं की फ़ौज है अमेठी क्षेत्र की दशा तो अजीब है। यहां सैकड़ो स्कूल शिक्षक के अभाव में बन्द पड़े है। शहरी क्षेत्र के विद्यालयों में दर्जनभर छात्रों पर चार से 6 अध्यापक तैनात किये गये है। जिले के 16 विकास खण्डो में परिषदीय विद्यालयों के 1294 प्राथमिक पाठशाला है। तथा 467 उच्च प्राथमिक विद्यालय है। जिसमें कुल 2 लाख 55 हजार 655 छात्र पंजीकृत है। इसमें प्राथमिक पाठशाला के 2 लाख 5 हजार 823 छात्र है। इसके अलावा उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 49 हजार 832 छात्र छात्रांए है। 2 लाख 55 हजार 655 छात्र छात्राओं को पढ़ाने के लिए केवल 2 हजार 372 अध्यापक तैनात है। इसके अलावा 2 हजार 242 शिक्षामित्र कार्यरत है। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 720 सहायक अध्यापक और 189 प्रधानाध्यापक छात्रों को शिक्षा दे रहे है। यानि एक अध्यापक पर मानक से 10 गुना ज्यादा छात्र है तो भला शिक्षा सबको कहां सम्भव है। नियमानुसार 30 छात्रों पर एक शिक्षक की तैनात होनी चाहिए । लेकिन जिले में शायद ही कोई ऐसा विद्यालय हो जहां यह मानक पूरा हो। इसका कारण शिक्षकों की कमी बताई जाती है। अमेठी के महुआताली विद्यालय में चार बच्चों पर एक शिक्षक तैनात है। विद्य ालय में इस समय अधिक बच्चे कक्षा एक में पंजीकृत है। इनकी तादात 11 है। कक्षा दो में एक बच्चा व कक्षा तीन में दो कक्षा चार व कक्षा पांच में महज एक -एक बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते है। महमूदपुर अमेठी प्रथम और द्वितीय तथा कटराराजा हिम्मत सिंहं, रामनाथपुर, बेनीपुर, चचकापुर, गौरीगंज, जगदीशपुर, जामों, इन्हौना, सलोन, शाहगढ़ , मुसाफिरखाना, तिलोई आदि सैकड़ों स्कूलों में दर्जन भर छात्रों पर दर्जन भर अध्यापक तैनात है पर ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल अध्यापक के अभाव में बन्द पड़े है। शहरी क्षेत्रों के आस पास वाले प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापको की भरमार है। इसमें मुन्शीगंज , बीएचएएल , एसीसी सिहंपुर , बहादुरपुर आदि क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षको की तदात लम्बी है। यहां न कोई मानक है न उच्चाधिकारियों का भय है। यहां केवल जुगाड़ और मोटी रकम के बल पर तैनाती होती है। बेसिक शिक्षा के आकड़ों से जमींनी हकीकत बिल्कुल अलग है। जिससे शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। उच्चाधिकारी कागज की नाव दौड़ाकर शिक्षा को आगे बढ़ा रहे है। सर्व शिक्षा अभियान के अन्र्तगत स्कूली बच्चो के लिए आलीशान, बिल्डिंग, ड्रेस, वजीफा, खाना, साबुन, तेल, शीशा निःशुल्क पुस्तकों आदि के लिए धन भेजा जाता है। लेकिन विद्यालयों में न तो छात्रों को बैठने की चटाई है विभागीय अधिकारी भी नही जानते है। विधान सभा चुनाव के पूर्व से विद्यालयों में दोपहर का भोजन बंद पड़ा है। बच्चे खाली पेट घर वापस जाते है। ड्रेस और बैग का पैसा भी विभाग हजम कर गया है। कई विद्यालय ऐसे है, जहां अध्यापक तैनात है। लेकिन वह स्कूल नहीं जाते लिहाजा स्कूल बन्द पड़े है। शिक्षा अध् ि ाकारियों कीे आपसी साठ गांठ से सैकड़ों शिक्षक ठेकेदारी करते है। इससे अधिक संख्या में शिक्षक अफसरानो की खुशामद करते है। तो उनके स्कूल जाने का प्रश्न ही नही उठता है। अगर शिक्षा के मानक पर नजर दौड़ाई जाय तो कक्षा चार के छात्र को 9 का पहाड़ा नहीं आता है। 6 और 7 के छात्र शुद्ध हिन्दी नही लिख पाते है और न बोल पाते है। कक्षा 5 के बच्चे दीवाल घड़ी नहीं देख पाते है। यह अमेठी के छात्रो के शिक्षा का मानक है। कम्प्यूटर शिक्षा के नाम पर केवल कागज दौड़ रहा है। यह अलग बात है। कि विद्यालयों में कम्प्यूटर भेजे गये है। लेकिन खाना और ड्रेस का पैसा कहां जा रहा है, इसे कम्प्यूटर कहां है इसका अता पता नहीं है। स्कूलो में बिजली नहीं है। जबकि कागज में छात्रों को पंखे की हवा मिल रही है। इसके एवज में लाखो रूपये खारिज किये गये है। विद्यालयों में शौचालय एक सपना है पैसा आया निकल गया लेकिन शौचालय नहीं बने है। विश्व के नक्शे में अमेठी की अलग पहचान है यहां के सांसद राहुल गांधी है। उनकी देश में अलग पहचान है। पर उनके संसदीय क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त पड़ी है पर उन्हें कोइ लेना देना नहीं है। रहा सवाल यहा के जनप्रतिनिधियों का तो उन्हे केवल अपने वोट की राजनीति से रिश्ता है। बाकी बच्चो के भविष्य से कोई लेना देना नही है।