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जो नब्बे पार है

खुशवंत सिंह 

कोलकाता से छपने वाले अखबार ‘द टेलीग्राफ’ की स्मिता वर्मा ने एक बेहतरीन प्रोजेक्ट के लिए मुझे याद किया। वे नब्बे से निन्यानवे वर्ष तक के उन लोगों के लिए एक श्रंखला लिखना चाहती थीं, जो आज भी न केवल सक्रिय हैं, बल्कि समाज में एक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। उनकी फेहरिस्त में सबसे ऊपर जोहरा सहगल का नाम था, जो इसी माह अपनी सौवीं वर्षगांठ मनाएंगी। अन्य महत्वपूर्ण नामों में इब्राहीम अलकाजी, रवि शंकर, सैयद हैदर रजा, केजी सुब्रमण्यन शामिल हैं। जाहिर है, इस खाकसार का नाम भी इस फेहरिस्त में शुमार किया गया है।
जोहरा अद्भुत महिला हैं। उनके पास उर्दू शायरी का नायाब संग्रह है और उन्हें कई रचनाएं तो आज भी याद हैं। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि उन्हें इस उम्र में भी इतनी सारी चीजें कैसे याद रह जाती हैं। उन्होंने जवाब दिया कि बचपन से उनकी सुबह जल्दी उठने की आदत रही है। वे सुबह की पहली किरण फूटने से पहले उठ जातीं, घर की छत पर जातीं और गोल-गोल घेरे में घूमते हुए उर्दू की नज्में दोहराती रहतीं। इस तरह उन्हें सैकड़ों नज्में जुबानी याद हो गईं।
जोहरा की बहन उजरा बंटवारे के बाद पाकिस्तान चली गई थीं। 40 साल तक दोनों बहनों की मुलाकात नहीं हुई। आखिरकार 1980 के दशक में वे मिलीं। ला मेरिडियन होटल की संचालक हरजीत कौर चरनजीत सिंह ने ‘एक थी नानी’ नामक एक नाटक में इन दोनों बहनों को एक मंच पर लाने के लिए अथक प्रयास किया था। 
दोनों बहनों के जीवन से प्रेरित यह नाटक दर्शकों में बेहद लोकप्रिय रहा है। पता नहीं, इस नाटक पर कोई फिल्म बनी है या नहीं। यदि अभी तक एेसा नहीं हुआ है तो जल्द ही इस पर फिल्म बनाई जानी चाहिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। अक्सर मैं यह भी सोचता हूं कि नाटकों के लंबे-लंबे संवाद याद करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियां आखिर किस जुगत से ऐसा कर पाते होंगे।यूं तो मिर्जा गालिब के अनेक शेर मुझे भी जुबानी याद हैं। एक समूह तो योजना बना रहा है कि मैं गालिब की गजलों का पाठ करूं और उसकी रिकॉर्डिग की जाए। योजना यह है कि मेरे द्वारा गजलों का पाठ करने के बाद हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका जिला खान अपनी मधुर आवाज में गालिब की कुछ गजलों का गायन भी करेंगी।
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एक अदद ख्वाहिश : हमारी कई ख्वाहिशें ऐसी होती हैं, जो ताउम्र पूरी नहीं हो पातीं। मेरी भी ऐसी ही कुछ ख्वाहिशें हैं। इन्हीं में से एक है जंगल में किसी चीते को देखना। मैं कभी कार्बेट पार्क नहीं जा सका। कहा जाता है कि कार्बेट में चीते को सड़क पार करते शर्तिया देखा जा सकता है। अनेक लोग हाथी की पीठ पर बांधे गए किसी हौदे में बैठकर यह नजारा देखते हैं। मैं कार्बेट तो नहीं जा सका, लेकिन मैंने तेजपुर की डॉ लक्ष्मी गोस्वामी के मेहमान के रूप में काजीरंगा में जरूर एक दिन बिताया है। 
हम दोनों हाथी की पीठ पर कसे एक हौदे में जा बैठे थे। हाथी की पीठ घोड़े की पीठ से दोगुनी चौड़ी होती है। कुछ देर तक हाथी की सवारी करने के बाद मेरा बुरा हाल हो गया था। हमने अपनी सैर के दौरान गैंडे, जंगली भालू और कई तरह के हिरण देखे, लेकिन चीता तो हमें खैर तब भी नजर नहीं आया।जब मैं भोपाल में रहता था, तब मुझे इस बात का यकीन था कि मैं चीते को कभी न कभी जरूर देखूंगा। सांची के पास एक छोटी-सी झील थी और माना जाता था कि वहां चीते पानी पीने आते हैं। वहां काफी तादाद में हिरण थे। इस तरह वहां चीतों की भूख और प्यास दोनों को मिटाने का इंतजाम हो जाता था। मैंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर झील के पास एक दरख्त पर मचान बंधवाया और चीते को देखने की आस में हम लोग वहीं बैठ गए। चांदनी रात थी। हिरण वहां आकर प्यास बुझाते रहे, लेकिन पूरी रात कोई चीता नजर न आया। झल्लाहट में हमारे एक साथी ने एक हिरण मार गिराया। अगले दिन हमने लंच और डिनर में हिरण का गोश्त खाया, अलबत्ता उसका स्वाद मुझे बहुत पसंद नहीं आया।मेरे एक रिश्तेदार हैं वाल्मीक थापर, जो रणथंभौर के पास एक होटल संचालित करते हैं। वह पर्यटकों में बहुत लोकप्रिय होटल है। वाल्मीक कहते हैं कि आस-पड़ोस के जंगलों में रहने वाले चीतों से उनकी दोस्ती-यारी है। चीते को देखने की चाहत में कई लोग उनके होटल में ठहरते हैं और मुझे बताया गया है कि उनमें से कभी कोई निराश होकर नहीं लौटा। लेकिन अब मैं बहुत बूढ़ा हो चुका हूं और लगता नहीं कि इस जन्म में जंगल में चीता देखने की मेरी ख्वाहिश कभी पूरी हो सकेगी। मुझे टीवी पर चीतों को देखकर या उनके बारे में पढ़कर ही काम चलाना होगा।चीतों के बारे में मेरी सबसे प्रिय कविता अंग्रेज कवि विलियम ब्लैक (1757-1827) की ‘टाइगर टाइगर बर्निग ब्राइट’ है। पंजाब यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएशन पाठच्यक्रम में ब्लैक की यह कविता शामिल की गई थी। शायद, देश के अन्य विश्वविद्यालयों के पाठच्यक्रमों में भी इसे जगह मिली हो। लेकिन मुझे नहीं लगता कि विलियम ब्लैक ने भी अपने जीवन में कभी जंगल में चीते को साक्षात देखा होगा।
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  • पहली अग्नि-परीक्षा में सफल हुए निशंक
  • नए आयाम दिखा गया लखनऊ फिल्मोत्सव
  • मीडिया का मोतियाबिंद -3
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  • कांग्रेस बनाएगी बुंदेलखंड राज्य
  • नहीं मिल रहा अतिथि का दर्जा
  • फिर से परिवारवाद की बहस
  • कांग्रेस से बेहतर नहीं है भाजपा
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  • कश्मीर में मीडिया
  • सबसे लोकप्रिय नेता जसवंत सिंह
  • जिन्ना- भारत विभाजन के आइने में
  • घट गया गन्ने का रकबा
  • वाजपेयी युग का अवसान
  • और बादलों में खो गई सड़क
  • छीना जा रहा है गरीबों का हक
  • कोई अख़बार जवाब भी नहीं देता
  • लालू का भविष्य बता देंगे उप चुनाव
  • प्रतिभा का पूरा संग्रहालय थे किशोर कुमार
  • माओवादियों के बचाव में पीयूसीएल?
  • बस्तर में माओवादियों का राज
  • विवादों भरा ही रहा है बुद्धदेव का कार्यकाल
  • महिलाओं की आंखों में पलते ख्वाब
  • उत्तर प्रदेश में राजनीति के नए ध्रुव बने
  • गहराने लगा है अकाल का संकट
  • शर्मनाक है लेखकों - संस्कृतिकर्मियों की शिरकत
  • आखिरी सांस तक कॉमरेड ज्योति बसु
  • छत्तीसगढ़ के बांध सूखने की कगार पर
  • सारे दिन काम और मजदूरी एक मुट्ठी धान
  • शहीद सौरभ कालिया का नाम याद है आपको?
  • ''निशंक’’ के कंधे पर जनरल की बंन्दूक
  • रद्दी का पुलंदा है लिब्राहन कमेटी की रिपोर्ट
  • बादलों के साथ रसायनिक छेड़छाड़ खतरनाक
  • कैसे भूल गये गैर कांग्रेसवाद का नारा
  • विश्व हिन्दी सम्मेलन,एक टिप्पणी
  • साहित्यकार भी है नरेंद्र मोदी
  • हबीब तनवीर होने का मतलब
  • श्री बदरीनाथ पावन बैकुण्ठ धाम
  • भूटान तक पहुंच गई सिंगुर की आंच
  • राजनीतिक हथियार बना आइला
  • माओवाद- बैरक बनाएगा बीएसपी
  • पंजाब में सरकार निकली खलनायक
  • पंजाबियों के लिए संयम की परीक्षा
  • अर्जुन सिंह का कसूर हैं अर्जुन सिंह होना
  • बंगाल में औंधे मुंह गिरा वाममोर्चा
  • सुभाष बोस से कांग्रेस की दिक्कत क्या है?
  • जेपी की जेल डायरी
  • लाल गलियारा बनाना चाहते है माओवादी
  • हाथी नहीं रहे साथी?
  • चिंता के केंद्र से बाहर हैं बच्चे
  • गंगोत्री धाम के कपाट खुले
  • दो हजार साल पुराना हमाम मिला
  • राजनीति में अपराधियों का बोल-बाला
  • कांग्रेस को बढ़त मिलती नज़र आ रही है
  • चढ़ता पारा और उतरता सर्वजन?
  • असम पर लटकी उल्फा की तलवार
  • साहित्य का भी गढ़ है छत्तीसगढ़
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