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कला नहीं,जिस्म बिकता है

विनय कांत मिश्र।
समाज में सार्थक संदेश देने वाली फिल्मों का दौर लगभग अब समाप्त हो चुका है। अब बॉलीबुड की रंगीन दुनिया में निर्माता गंभीर समस्या प्रधान फिल्मों पर रूपया नहीं लगाते हैं। अभी भी दर्शक के रूप में देश की जनता उन्हीं फिल्मों को पसन्द करती है जिसमें धर्म की कल्पनापरक दुनिया हो अथवा सेक्सुअलिटी याकि हिंसा का गहरा अवसाद जमा हो। जिस तरह सिनेमा के नाम पर दर्शकों के समक्ष विकृतियॉं परोसी जा रही हैं वह अवसादमूलक एवं शर्मनाक है। कलात्मक फिल्में बाज़ार में आती जरूर हैं लेकिन वे सिनेमाघरों की शोभा नहीं बढ़ा पातीं और न ही उन्हें दर्शक ही मिल पाते हैं। वे सिर्फ पुरस्कार पाने के लिए बनती हैं। फिर सिनेमा घरों के मालिकानों को हल्की फुल्की मनोरंजनात्मक फिल्मों के दिखाने से घाटे की सम्भावना कम रहती है।
निर्माता एकता कपूर की डर्टी पिक्चर सचमुच डर्टी है। व्यापक स्तर पर समाज को ‘टी वी शो सास भी कभी बहू थी’ द्वारा गहरे रूप में प्रभावित करने वाली एकता कपूर को गंदगी बेचने में अफसोस नहीं है। याद कीजिए वह दौर जब बहुएं घर के काम काज में व्यस्त रहती थीं और दादी बच्चों को कहानियॉं सुनाया करती थीं। तब बहुएं भी अपने से बड़ो का लिहाज और वहम किया करती थीं। तब स्त्रियों में सहन-शक्ति होती थी। इधर 2000 के दशक में एकता कपूर के टी वी सीरियल्स ने दर्शकों की अभिरूचियों को ‘डर्टी’-विभत्सतम बनाया है। आप किसी भी टी वी शो को देख लीजिए सबका उद्देश्य समाज की सूक्ष्मतम इकाई परिवार को ध्वंसात्मक अवस्था में ले जाना ही होता है। किसानों और मज़दूरों को रूपहले पर्दे से गायब कर दिया गया है। धार्मिक सीरियलों में आधुनिक पहनावे में लिपटी देवियॉं देह दर्शन कराती मिल जाएंगी। महाभारत सीरियल की गंगा तो याद ही होंगी। छोटे पर्दे पर व्यवसाय के नाम पर ऐतिहासिक तथ्यों से तोड़ मरोड़ किया जाता है। अतीत में दिखाए जा चुके ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ जैसे सीरियल्स को टी वी पर दुबारा दिखलाने की जरूरत है।
मदर इंडिया, पुकार और लगान जैसी सार्थक फिल्में भी बनाई जा सकती हैं। कला एवं मनोरंजन का अद्भुत सामंजस्य इन फिल्मों में दिखलाई पड़ता है। निर्देशक मिलन लूथरिया की डर्टी पिक्चर में रूपहली रंगीन दुनिया की हक़ीक़त दिखलाने की कोशिश की गई है। लेकिन इस यथार्थ के नाम पर नारी शरीर को उन्मुक्त ढंग से बाज़ारीकृत किया गया है। दरअसल फिल्म में रेशमा नाम की कैरेक्टर की पृष्ठभूमि सिल्क स्मिता है। सिल्क स्मिता अस्सी के दशक की दक्षिण की तमिल फिल्मों की महत्वाकांक्षी अदाकारा थी जिसने अपने जिस्म के बूते अपने कैरियर को बुलंदियों पर पहुूंचाया था। बाद में वह अवसादग्रस्त हो कर उसकी मौत हो गई थी। अब फिल्म का विषय ही ऐसा है जिसमें विद्या बालान के जिस्म की नुमाइश होनी तय थी, जोकि हुआ भी। बात सिर्फ विद्या बालान की ही नहीं है बल्कि जिस तरह से नारी-शरीर का सरेआम बाज़ार में बेचा जा रहा है, वह गलत है। फिल्म में नसीरूद्दीन शाह ने सूर्यकांत की को स्टार की भूमिका निभाई है। रेशमा बनी विद्या बालान ने अंतरंगदृश्य किए हैं। कहानीकार रमाकांत बने तुषार कपूर और निर्देशक इब्राहीम बने इमरान हाशमी के साथ सिल्क स्मिता का भोगा हुआ विकृत यथार्थ दिखलाया गया है। अब इस उत्पाद को बेचने का फंडा यह रहा कि 2 दिसम्बर को सिल्क स्मिता का जन्म-दिवस होता है इसलिए यह फिल्म इसी दिन रिलीज होनी चाहिए। सचमुच अब सिनेमा के नाम पर कला नहीं बल्कि जिस्म बिकता है। इसे बेचने के लिए तमाम हथकंडे भी बिकते हैं।  

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