ताजा खबर
साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
सिनेमा का मॅर्डर

विनय कांत मिश्र

हिन्दी पट्टी के लिए बॉलीबुड, सिनेमा परोसने का कार्य करता रहता है। इधर हाल के वर्षों में हिन्दी फिल्मों में महिलाओं के साथ जोर जबर्दस्ती की घटनाएं बढ़ी हैं। उन्हें फिल्मों में बिकाउ बनाने की कोशिशें तेज हुई हैं। स्त्री देह के साथ हिन्दी फिल्में एक कल्पना लोक रचती हैं। फिल्मों द्वारा सृजित कल्पना लोक समाज में भयावह वातावरण का निर्माण करता है। वैसे कला एवं फिल्में समाज का आईना होती हैं। फिर भी कभी कभी फिल्में, समाज को दिशाहीन भी बनाती हैं। यह काम तब और अधिक होता है जब फिल्म के निर्माता-निर्देशक का उद्देश्य महज मुनाफा खोरी हो। हिन्दी फिल्मों में हत्याएं तो होती हीे रहती हैं। फिल्मों में मर्डर के दृश्य दिखाए जाने का कारण समाज में आम हो चुकी हत्याएं हैं। प्रतिदिन सुबह ऑख खुलने पर समाचार पत्रों में दो से तीन खबर हत्याएं की तो होती ही हैं। हममें समाचार पत्रों, कला एवं फिल्मों के द्वारा कत्ल की खबरों को पढ़ने, देखने और सहने की आदत डाली जा रही है। हालिया प्रदर्शित फिल्म मॅर्डर भी एक सिरफिरे कातिल के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में नायक अर्जुन भागवत बना इमरान हाशमी भी बार बार ह्यूमन ट्र्ैफिकिंग का मुद्दा उठाता हुआ नज़र आता है। मानव जिस्म की तस्करी का मुद्दा अहम है लेकिन जिस तरह से फिल्म मर्डर 2 मेें इस मुद्दे को उठाया गया है; वह क्रूरतम है। फिल्म मर्डर में खलनायक द्वारा पहले जिस्म फरोशी के लिए ले आकर और बाद में स्त्री वेश में पूरे श्रृंगार के साथ एक एक कर कॉल गर्ल्स के कत्ल को कहीं से भी मुनासिब नहीं ठहराया जा सकता है। जिस तरह से इस फिल्म में नायक और खलनायक दोनों स्तरों पर नारी देह का भरपूर इस्तेमाल किया गया है, उससे फिल्म के सार्थक उद्देश्य पर सवाल खड़े होते हैं। दरअसल पुरूष वर्चस्व वादी सोच ने इस फिल्म का बंटाधार ही किया है। फिल्म में स्त्री के संघर्ष को कहीं भी सफल नहीं होने दिया गया है। 
             इस फिल्म का एक महत्वपूर्ण किरदार रेशमा है। वह पूरे फिल्म के कथानक को गति प्रदान करती है। उसी की वजह से फिल्म के भ्रष्ट नायक का दिल बदल जाता है। लेकिन जिस तरह से संघर्षशील रेशमा का अंतिम समय में कत्ल कर दिया जाता है; उसकी कोई जरूरत नहीं थी। जिस तरह से इस फिल्म में रेशमा को एक कॉलेज की छात्रा और कॉल गर्ल के धन्धे में संलिप्त दिखलाया गया है; वह भी बेहद आपत्तिजनक है। निर्मला पंडित के किरदार को लाल बत्ती के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। मर्डर 2 में निर्मला पंडित नपुंसक है। वह धीरज पांडे बने प्रशांत नारायण को जिस तरह एक मंत्री के बाहुबल पर छुड़ा कर ले जाती है, वह नपुंसक हो चली व्यवस्था पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है। लेकिन जिस तरह से निर्मला पंडित को मानसिक रूप से विक्षिप्त सीरियल किलर धीरज पांडे के कुकृत्यों से बेखबर दिखाया गया है, वह दर्शकों को आसानी से नहीं पचती। दरअसल हिन्दी पट्टी में प्रदर्शित होने वाली फिल्में अपने वास्तविक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पा रही हैं। इसका कारण फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों का लक्ष्य भारी मुनाफा कमाना होता है। इस चक्कर में वे समाज के समक्ष सेक्स और हिंसा परोसते हैं। हिन्दी सिनेमा के बदलाव में भट्ट कैम्प की प्रमुख भूमिका रही है। आपको मॅर्डर याद होगी। सन् 2004 में प्रदर्शित इस फिल्म ने अधिकांश भारतीय हिन्दी जनता का रचना आस्वाद बदल दिया था। तब नारी देह के रूप में मल्लिका सेहरावत का इस्तेमाल किया गया था। भारत भी दुनिया के अन्य देशों के साथ इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में था। महेश भट्ट की मर्डर के बाद जिस तरह से हिन्दी फिल्मों में जिस्म नुमाइशी का खुला खेल चला उससे परिवार के साथ बैठकर फिल्म देखने की अवधारणा समाप्त होती चली गई। फिल्मों में कथानक को आगे बढ़ाने के लिए जानबूझ कर अश्लीलता परोसी जाने लगी।  हिंसा और सेक्स की घटनाओं से परिपूर्ण फिल्में कौन सा सामाजिक हित साधना चाहती हैं, यही समझने की जरूरत है। कहीं न कहीं फिल्म जगत का ताल्लुक अपराध की दुनिया से भी है। पिछले दिनों कुछ हिन्दी फिल्म निर्माता पकड़े भी गए थे। तो इस तरह से अपराधियों के साठ-गॉठ से समूची हिन्दी पट्टी की सोच को विकृत किया जा रहा है। आप मर्डर 2 को देखिए तो पाएंगे कि इस फिल्म में सेक्स, गाली-गलौज और हिंसा का जबर्दस्त सहारा लिया गया है। इस फिल्म का किरदार कोई भी भ्रष्ट, बेईमान पुलिस अफसर हो सकता है। जैक्लिन फर्नांडिज के रूप में इस फिल्म में विदेशी बाला का जबर्दस्त इस्तेमाल हुआ है। मानव देह की तस्करी को रोकने के लिए प्रिया बनी मॉडल जैक्लिन के देह की नुमाइश पर सेंसर बोर्ड की भी निगाह नहीं गई। लिवइन रिलेशनशिप के संबंधों को रूपहले पर्दे पर दिखलाकर इस तरह के संबंधों के जायज ठहराने की मानसिकता काम कर रही है। दरअसल साहित्य, कला और सिनेमा की दुनिया स्वप्निल होती है। काल्पनिक दुनिया होने के बावजूद सिनेमा, कला और साहित्य का दूरगामी असर होता है। मर्डर 2 में सीरियल किलर धीरज पांडेय बने प्रशांत नारायण का चरित्र खौफनाक है। जिस तरह से इस फिल्म में एक एक कर 11 महिलाओं की निर्ममता पूर्वक हत्याएं करवा दी जाती हैं उससे निर्माता-निर्देशक और पटकथा-संवाद लेखक की पुरूष वर्चस्व वादी सोच उजागर होती है। आने वाले दिनों में महिलाओं के साथ उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ेंगी। वैसे खबरों के मुताबिक पिछले वर्ष मुम्बई में एक सीरियल किलर पकड़ा गया था, जिसने समुद्र तट पर निर्ममतापूर्वक आठ हत्याएं की थी। वह मानसिक रूप से विक्षिप्त था। इसकेे बावजूद इस तरह की खबरों का विज्ञापन नहीं होना चाहिए। अभी बीते रविवार को जनादेश संवाददाता ने परिवार परामर्श केंद्र में एक मामला राम सागर और शांति का देखा, जिसमें पति राम सागर ने अपनी पत्नी के जिस्म को ब्लेड से काट दिया था। पूछने पर नाटकीय अंदाज में अपने को बेगुुनाह बतला रहा था बिल्कुल मर्डर 2 के धीरज पांडे की तरह। इस फिल्म में देवत्व बनाम राक्षसत्व के मुद्दे को पुरजोर ढंग से उठाने की कोशिश की गई है। कई विषय-वस्तु को एक साथ समेटने की कोशिश में फिल्म औंधे मुह गिर पड़ी है। यह फिल्म किसी विदेशी फिल्म की अनुकृति है। इसमें भारतीय रंग को घोलने की कोशिश की गई है। दरअसल इस तरह की फिल्मों एवं कला का समाज पर नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह का असर पड़ता है। सकारात्मक असर कम जबकि नकारात्मक असर अधिक होता है।     
    गौरतलब है कि इस फिल्म के विषय में मुकेश भट्ट ने खुद कहा है कि यह फिल्म दक्षिण कोरियाई चुग्यिओग्जा से प्रभावित है। दोनों में सूक्ष्म अंतर है। इस फिल्म के पोस्टर दूसरी दक्षिण कोरियाई फिल्म बैड ग्वाय से प्रभावित हैं। हकीकतन इसे हम निठारी कांड से भी जोड़कर देख सकते हैं। इधर हिन्दी सिनेमा की अवनति हुई है। अब तो हिन्दी फिल्मों के नाम तक भी गाली से शुरू होने लगे हैं। ब्ड्ढा होगा  तेरा बाप, पर गौर फरमाइए। पहले जिस हिन्दी बिरादरी  के लिए मदर इंडिया, उपकार और लगान जैसी सार्थक  फिल्में बनती थीं वहॉं अब डेल्ही बेली, चिल्लर पार्टी और मर्डर 2 जैसी मसाला फिल्में बन रही हैं। सिनेमा और मनोरंजन के नाम पर जो फिल्में हिन्दी पट्टी के समक्ष परोसी जा रही हैं; वह भयावह हैं। मर्डर 2 पूरी तरह से नारीवादी विमर्श के खिलाफ खड़ी होती है। पूरी फिल्म नायक और खलनायक दोनों को स्त्रियों के खिलाफ प्रयुक्त करती है। जिस तरह से मॉ एवं स्त्री समुदाय के खिलाफ गाली का अभद्र प्रयोग किया गया है, वह कत्तई कथानक की मॉंग नहीं हो सकती है। कला एवं फिल्में समाज के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती हैं। वह मनोरंजन के साथ साथ समाज को दिशा देने का कार्य भी करती हैं। इसलिए सिर्फ मुनाफाखोरी को बढ़ावा देने वाली फिल्में प्रतिबंधित होनी चाहिए। जनादेश संवाददाता के पूछने पर कला एवं नाटक समीक्षक दिल्ली विश्वविद्यालय के महेश आनंद ने बतलाया कि कला और साहित्य का मकसद समाज के सकारात्मक पक्ष को उजागर करना होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाला वक्त हमें नहीं बकसेगा। दरअसल कला एवं फिल्मों का उद्देश्य जिन्दगी की समझ में नया एंगल देना होना चाहिए; लेकिन वह दृष्टि एवं सोच सकारात्मक होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो हिन्दी सिनेमा का मर्डर तय है।                  
 
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
Post your comments
Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.