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अन्ना हजारे ने तोडा राहुल का करिश्मा

अंबरीश कुमार 
लखनऊ अप्रैल । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के युवा चेहरे राहुल गांधी की नई राजनीति को अन्ना हजारे के आंदोलन ने पलीता लगा दिया है । जिस तरह शहर से गांवों की तरफ अन्ना हजारे की मुहिम की हवा फ़ैल रही है वह कांग्रेस के लिए तो शुभ संकेत नही है है । उत्तर प्रदेश का राजनैतिक माहौल फिर गर्माने लगा है । राहुल गांधी ने नौजवानों को जहां कांग्रेस से जोड़ा वही वे गांवों में गए और दलित की पूड़ी सब्जी खाकर नया राजनैतिक संदेश दिया था । पर अब माहौल बदल रहा है । अन्ना हजारे तो दिल्ली में बैठे है पर उनका अभियान जगह जगह शुरू हो चूका है । लखनऊ में धरना प्रदर्शन के बाद कैंडिल मार्च निकला जा रहा है तो छोटे छोटे कस्बों में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध शुरू हो गया है । यह विरोध आगामी विधान सभा चुनाव में किसी को जितने के लिए आगे आए या न आए कांग्रेस के खिलाफ वोट में बदल सकता है । यह चिंता कांग्रेसियों के माथे पर दिखने लगी है ।
कांग्रेस ने बीते लोकसभा चुनाव में देश के इस सबसे बड़े सूबे में बसपा समेत सभी दलों को झटका देते हुए रिकार्ड सीटे हासिल की थी खासकर पिछले डेढ़ दशक में । तभी से यह माना जाने लगा था कि अगली बार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता की मजबूत दावेदार होगी । पिछले चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी से अपनी नाराजगी जताते हुए कांग्रेस का समर्थन किया था जिसका असर लोकसभा की तीस से ज्यादा सीटों पर पड़ा । पर बाद की घटनाओं ने कई समीकरण बदल दिए । बाबरी ध्वंस पर कांग्रेस के रुख से मुस्लिम समुदाय का नजरिया बदला तो स्पेक्ट्रम घोटालों से पार्टी की साख और खराब हुई । इससे पहले कांग्रेस ने जब आपातकाल लगाया तो भी उत्तर प्रदेश में ही ज्यादा तीखा विरोध हुआ था और बाद के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी समेत कांग्रेस के सभी उम्मीदवारों का सूपड़ा साफ़ हो गया था । इससे उत्तर प्रदेश के राजनैतिक मिजाज का अंदाजा लगाया जा सकता है । इसके बाद बोफोर्स के मामले में भी पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब कांग्रेस को छोड़ अभियान छेड़ा था तब भी इसी उत्तर प्रदेश में नारा गूंजा था - राजा नही फकीर है ,देश की तकदीर है । फिर कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा था ।
अब अन्ना हजारे के रूप में नई पीढी को गांधी जैसा एक नेता नजर आ रहा है । नई पीढी ने न तो गांधी को देखा है और न ही जयप्रकाश नारायण को । उन्होंने देश भर में बवंडर की तरह उठता कोई आंदोलन भी नही देखा । लखनऊ के धरना स्थल पर एक अंग्रेजी स्कूल की बारहवीं की छात्रा निवेदिता कई घंटों से बैठी लोगों को सुन रही थी । आंदोलन के बारे में पूछने पर निवेदिता ने कहा -हम लोगों को पहली बार लग रहा है कि यह आदमी देश को बदल देगा ।हम लोगों को राहुल गांधी से बहुत उम्मीद थी पर कांग्रेस पार्टी के नेताओं पर अब भरोसा नही रहा । अन्ना हजारे को पूरे देश का दौरा वैसे ही करना चाहिए जैसे कभी गांधी ने किया था । तभी कुछ हो पाएगा । हमारे प्रदेश का तो और बुरा हाल है । सारे अपराधी राजनैतिक दलों में है ।बसपा की सरकार है ,महिला मुख्यमंत्री है पर महिलाये तक सुरक्षित नही है ।
कमोवेश ऎसी ही प्रतिक्रिया ज्यादातर जगहों पर मिल रही है । नए लोग इस आंदोलन से ज्यादा जुड़ रहे है । मामला यह नही है कि लोकपाल बिल को लेकर आंदोलन कब तक चलेगा । इस आंदोलन के बाद अन्ना हजारे का कद इतना बढ़ चुका होगा कि कोई भी मुद्दा सामने आया तो अन्ना हजारे के एलान पर देश के लाखों नौजवान सामने आ जाएंगे ठीक वैसे जैसे जयप्रकाश आंदोलन में देश भर के नौजवान जुट गए थे ।सामाजिक कार्यकर्त्ता रामकिशोर ने कहा -जब राजनैतिक दलों से भरोसा उठ जाए तो यही होता है ।राहुल गांधी से देश के नौजवानों को उम्मीद नजर आई थी और उत्तर प्रदेश ने पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हाथोहाथ लिया था पर जिस तरह भ्रष्टाचार के एक के बाद एक मामले सामने आए उससे सभी का मोहभंग हुआ । यही वजह है कि अन्ना हजारे के सामने आने से सभी को लगा कोई तो है इस देश में । अन्ना की जरुरत आज उत्तर प्रदेश में ज्यादा है ।दिल्ली का आन्दोलन जब कामयाब हो जाए तो अन्ना को उत्तर प्रदेश का रुख करना चाहिए । कांग्रस तो जो कर रही है वह सामने है पर इस प्रदेश में तो और बूरा हाल है ।
jansatta
 

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