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गांधी की कर्मभूमि में दम तोड़ते किसान

अंबरीश कुमार
सेवाग्राम ;वर्धा मार्च । महात्मा गांधी की कर्म भूमि में कर्ज के मकड़जाल में फंसे किसान दम तोड़ रहे है। पिछले एक साल में वर्धा जिले में पांच सौ से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके है। इनमे बड़ी संख्या कपास उत्पादक किसानों की है। खास बात यह है कि कपास उत्पादकए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों से अपने खेतों को बांझ बना रहे है। एक बार इन जेनेटिक कपास बीजों को लगाने के बाद उस खेत दूसरी कोई फसल लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। इन कपास बीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसेंटो की इजारेदारी है। विदर्भ के ज्यादातर किसान मोंसेंटो के बीटी काटन बीज पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं। पराग के दुसरे परंपरागत बीज इस अंचल से ख़त्म हो चुके हैं।
विदर्भ के इस अंचल में किसानों को केंद्र सरकार की कर्जमाफी का न कोई फायदा मिला और न ही प्रधानमंत्री के राहत पैकेज का। कर्जमाफी का ज्यादातर पैसा बैंकों को चला गयाए तो प्रधानमंत्री राहत का ज्यादा हिस्सा सरकार के विभिन्न विभागों में बट गया। कपास किसान को फौरी रहात देने के लिए उन्हें अन्य व्यवसाय शुरू करने के वास्ते जो पैसा बंटाए वह कांग्रेसी नेताओं की जेब में चला गया।
महात्मा गांधी यहां 1936 में आए और कपास के किसानों के बीच बस गए थे। गांधी ने यहीं पर चरखा से सूत कांट कर स्वालंबन का नया रास्ता दिखाया था। उन्होंने अहिंसा का पाठ पढ़ाया था पर यहां के किसान आज अपने साथ ही सबसे बड़ी हिंसा कर रहे हैं। हालात पिछले डेढ़ दशक से बिगड़े हैं। जब उदारीकरण का दौरा शुरू हुआ और चरम पर आया। उसी दौर में वर्धा के एक किसान रामदास बोरानवार ने 1997 में खुदकुशी कर ली। यह विदर्भ की पहली खुदकुशी थी। इसके बाद से ही खुदकुशी का सिलसिला शुरू हुआ। पिछले नौ साल में 14 हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है। जबकी सरकारी आकड़ों में चार हजार पांच सौ किसानों की खुदकुशी मानी जा रही।
सेवाग्राम में गांधीवादी कार्यकर्ता अविनाश काकड़े ने जनसत्ता से कहा कि यहां के किसानों की बर्बादी की मुख्य वजह मौजूदा फसल चक्रए कर्ज और समर्थन मूल्य का अव्यावहारिक निर्धारण है। यहां सिंचाई की कारगी व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते कपास किसान पूरी तरह कपास के पानी पर निर्भर हैं। जबकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसेंटो के बीज काटन के लिए खेत में पानी की ज्यादा जरूरत पड़ती है। पानी न मिलने से फसल बर्बाद होती है और किसान कर्ज लेने पर मजबूर होता है। मोंसेंटो का यह दावा भी गलत है कि बीटी काटन बीजों में कीड़ा नही लगता। आसपास के खेतों में कीड़े की वजह से कपास की फसल प्रभावित हो चुकी है। इसी वजह से पानी के साथ किसान कीटनाशक के इंतजाम में लगता और महाजन का कर्ज उस पर बढ़ता जाता है।
वर्धा जिले के चिंचौली गावं में एक किसान नंदराम दयाराम धोबाले ने करीब एक साल पहले खुदकुशी की। बीते रविवार को जब उसके घर पहुंचेए तो उसका समूंचा घर एक कमरे का नजर आया। जिसमें एक तरफ चुल्हा फूंकती उसकी पत्नी सुलोचना नजर आईए तो दूसरी तरफ सहमी सी बैठी उसकी दो बेटियां। मिट्टी की दीवारों पर कई देवी. देवताओं के फोटो चिपके हुए थे। पर कोई बक्सा या सामान नजर नहीं आया। सुलोचना ने कहाए आदमी के जाने के बाद हम लोग बर्बाद हो गए हैं। कोई मदद नहीं मिली। न ही 70 हजार रूपए का कर्ज माफ हुआए जिसकी वजह से नंदराम ने जान दे दी।
यवतमालए अमरावती से लेकर वर्धा के करीब दर्जन भर गावं का दौरा करने के बाद साफ हो गया कि केंद्र की कर्ज माफी योजना हो या फिर प्रधानमंत्री का राहत पैकेज सब हवा में है। विदर्भ के किसानों की हालत में नजर रखने वाले महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैत्रा ने कहाए श् कर्ज माफी योजना से लेकर प्रधानमंत्री राहत पैकेज किसी का भी फायदा किसानों को नही मिला। पैकेज के नाम पर झांसा देने का प्रयास जरूर हुआ। प्रधानमंत्री का पैकेज तीन हजार 750 करोड़ का था। जिसमें सिंचाई के मद का भी दो हजार करोड़ रूपया शामिल कर लिया गया था। यह पैसा बाद में सिंचाई विभाग के बजट का था। बाद में यह पैसा वहां चला भी गयाए जो बांकी बचा उसमें जमकर बंदर बांट हुई। कांग्रेस के विधायक और सांसदों के रिश्तेदारों के नाम भी राहत का पैसा चला गया। क्योंकि वे भी आखिर किसान थे। बाकी जो बांचा उसमे 50 करोड़ रूपए श्री श्री रविशंकर को दिया गया ताकि किसानों के खुदकुशी से बचाने के लिए वे विदर्भ के गावों में किसानों को प्रवचन दें। यह उदाहरण है कि सरकार खुदकुशी करने वाले किसानों के साथ किस तरह काम कर रही है।
विदर्भ के किसानों के हालात का अध्यन करने यहां आए सामाजिक संस्था पीजीवीएस के अध्यन दल के सयोंजक एपी सिंह ने हेटीकुंडी गावं में कहाए श्हम लोगों ने विदर्भ में दो दर्जन गावों का दौरा किया और किसानों के हालत की जानकारी ली। जिसके बाद यह सब सामने आया कि ज्यादातर किसानों को केंद्रए राज्य और प्रधानमंत्री पैकेज का कोई खास लाभ नही मिल पाया है। जो तथ्य उभर कर सामने आए है उससे साफ है कि विदर्भ का किसान इस समय कुपोषणए भुखमरी और कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है।श्
इस बीच किसान मंच ने सरकारी नीतियों में बदलाव के लिए विदर्भ के किसानों को एक जुट कर संघर्ष की रणनीति बनाई है। किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह ने कहा कि विदर्भ के आधा दर्जन जिलों में खुदकुशी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए अब संगठन नई पहल करने जा रहा है। जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक राज्य व केंद्र सरकार के साथ.साथ प्रशसन की भूमिका भी किसानों के हित में नहीं है। प्रशासन न तो साहूकार पर अंकुश लगता है और न ही केंद्रीय योजनाओं को अमल करने का प्रयास कर्ता है। किसानों के नाम पर छुटभैए नेताओं से लेकर कांग्रेस के विधायक तक किसानों का पैसा खा रहे हैं। ऐसे में हमारा किसान संगठन अगले महीने वर्धा में किसानों की पंचायत कर नई पहल करेगा।
jansatta
 

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