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वे एक आदर्श समाजवादी थे

 अरुण कुमार त्रिपाठी

अस्सी के दशक के मध्य में लखनऊ के पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी संस्थान में आचार्य नरेंद्र देव पर एक गोष्ठी हो रही थी। उस गोष्ठी में दिल्ली से सुरेंद्र मोहन जी आए हुए थे। आचार्य जी पर चर्चा के दौरान ही टिप्पणीकार के मुंह से अचानक यह सवाल निकल गया कि आचार्य नरेंद्र जैसे लोग समाजवादी आंदोलन में थे, यह तो तथ्य है। पर उससे बड़ा रहस्य है कि क्या खाकर आचार्यजी जैसे लोग पैदा होते हैं। मेरे मुंह से निकले इस सवाल को सुरेंद्र मोहन जी ने पकड़ लिया। उन्होने उस सभा से यह सवाल मेरे हवाले से बार-बार पूछा कि आखिर क्या खाकर आचार्यजी जैसे लोग पैदा होते हैं? आज हम वैसे विद्वान और त्यागी, तपस्वी लोग क्यों नही पैदा कर पाते? बाद में यह सवाल पूरी सभा एक-दूसरे से पूछती नजर आई। जो लोग प्रारम्भ में उस प्रश्न को हल्के में ले रहे थे वे भी गंभीर हो गए। मुझे लगा कि सुरेंद्र जी मुझ जैसे युवा का उत्साहवर्धन करने के लिए उस बात को बार-बार उछाल रहे हैं। लेकिन जब उन्होंने लखनऊ से दिल्ली लौटते समय मेरे कंधे पर हाथ रखकर वही सवाल दोहराते हुए कहा कि तुम्हे नही मालूम कि तुमने भोलेपन में कितनी बड़ी बात उठा दी, तब मुझे उनकी संवेदनशीलता का एहसास हुआ।
आज जब सुरेंद्रजी नही है तो मुझे फिर वही सवाल दोहराने की इच्छा हो रही है। मैं पूरे समाज और राजनीतिक बिरादरी के सामने वह सवाल नए संदर्भ में उठाना चाहता हूं कि  आखिर क्या खाकर सुरेंद्र मोहन जी जैसे लोग पैदा होते हैं?  बिडंबना यह है कि मेरे इस सवाल को जोर से उठाने वाला आज उनके जैसा कोई नही है। शायद उसके पीछे छुपी उस निश्छल नैतिक राजनीतिक भावना की वाहवाही भी कोई नही करेगा। उस परंपरा में अगर कोई बचा है तो सच्चिदानंद सिन्हा, जो 85 वर्ष की उम्र में मुजफ्फरपुर जिले के मोनिका गांव में एम्बेस्टस की फैक्ट्री के खिलाफ आंदोलन छेड़े हुए हैं। पर सच्चिदानंदजी ज्ञान और नैतिकता की गहरी झील है, जिनके पास आपको खुद जाना पड़ेगा। जबकि सुरेंद्रजी ज्ञान की गंभीरता से लदे हुए बादल थे जो स्वयं ही टहल-टहल कर हर संघर्ष, हर आंदोलन, हर विचार गोष्ठी और प्रेरणा के भूखे हर व्यक्ति का गला तर करते रहते थे। सुरेंद्रजी के बारे में तुलसी दास की वह चौपाई ठीक ही बैठती है कि- बरसहिं जलधि भूमि नियाराई, जथा नवंहि बुधि विद्या पाई। सुरेंद्रजी सचमुच ऐसे ही थे जिन्हे ठहराव पसंद ही नही था और घमंड जिन्हें छू भी नही पाया था। वे समाजवाद के मेघदूत थे, जिन्हे धरती के उस कोने  का पता मालूम था जहां उनकी जरुरत होती थी।
देश के किसी कोने में, दिल्ली के सभागार में उनको आमंत्रित किया गया हो तो शायद ही कभी हो कि वे न पहुंचे हों। कई बार अपने फूलते दम को साधते हुए वे समाजवादियों और आदोलनकारियों में संघर्ष का दम भरते रहते थे। सांस का दम उनमें भले न बचा हो लेकिन संघर्ष और लोगों से संवाद करने का दम उनमें आखिर दम  तक बचा हुआ था। आखिरी बार उनको ट्रेड यूनियन लीडर ब्रजमोहन तूफान की शोकसभा में ट्रेड यूनियन  नेताओं के साथ एक मंच पर देखा था। वे और राजेंद्र सच्चर काफी भावुक होकर बोले लेकिन इसके बावजूद सुरेंद्रजी ने साबित कर दिया कि वे समाजवादी आंदोलन व विचार के चलते फिरते इन्साइक्लोपीडिया हैं। प्रज्ञा सोशलिस्ट पार्टी की किस गोष्ठी, सम्मलेन  या प्रर्दशन का आयोजन कहां हुआ, उसमे किसने क्या कहा, यह सब उन्हे वर्ष, महीना, तारीख के साथ याद रहता था। किस अधिवेशन में कौन सा प्रस्ताव पास हुआ और उस पर किसने क्या आपत्ति की, यह भी उन्हें बखूबी याद रहता था। वे इस बात से भी वाकिफ रहते थे कि इस दुनिया में समाजवादी आंदोलन में कहां, क्या चल रहा है और नई प्रेरणा के सूत्र यूरोप या लैटिन अमेरिका में कहां से निकलते हैं।
 सुरेंद्र मोहन समाजवादी आंदोलन की विभाजक खाईयों को अपने विचार, कर्म और सक्रियता से पाटते रहते थे। वे जानते थे कि आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया के मतभेदों के पेंच क्या हैं और उन्हें सुलझाते हुए आज के समाजवादी आंदोलन को किस तरह ताकत दी जा सकती है। इसीलिए वे कभी जनता दल(एस) में सक्रिय हो जाते थे तो कभी सोशलिस्ट फ्रंट बनाते थे। उन्होनें और लोगों की तरह समाजवाद शब्द को छोड़ने के बजाय उसे निरंतर अर्थवान बनाया और उसे किसी भी संकीर्णता से बाहर निकाला। वे अगर एक तरफ नमर्दा बचाओ आंदोलन के साथ खड़े रहते थे तो दूसरी तरफ संसद पर हमले के आरोपी प्रोफेसर गिलानी के साथ खड़े होने में भी झिझकते नहीं थे। उनके समाजवाद में समाजिक समता, न्याय  के साथ-साथ व्यक्ति की स्वत्रंता और  गरिमा के लिए महत्वपूर्ण जगह थी। लोहिया जन्मशती समारोह से लेकर अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले की आलोचना करने के लिए वे निर्भीक तरीके से उपस्थित रहते थे। उनकी निष्ठा का, साहस का आलम यह था कि एक बार ‘कैश फॉर न्यूज’ पर चल रही गोष्ठी में उन्होंने एक बड़े पत्रकार पर साफ उंगली उठा दी। उनका कहना था कि आप अखबार के मालिक भी हैं,एक पार्टी  के प्रवक्ता  भी हैं और संपादक भी हैं, भला बताइए इस तरह पत्रकारीय  निष्ठा कैसे बचेगी? दुबली-पतली काया के धनी सुरेंद्रजी के इस साहस को देखकर पूरी सभा अवाक रह गई और वे सांसद-संपादक निरुत्तर।
सुरेंद्र मोहन की नैतिकता उन्हें यह साहस देती थी। दिल्ली के पटपड़गंज की सहविकास सोसाइटी के सामान्य घर में रहने वाले सुरेंद्र जी कभी बस में सफर करते दिख जाते थे तो कभी ऑटों में। बाद के दिनों में वे जरुर कार का सहारा लेने लगे थे जिसे व्यक्ति या संघठन उन्हें उपलब्ध कराता था जो उन्हें सुनना या उनसे प्रेरणा लेना चाहता था। वे एक आदर्श समाजवादी थे और उनका यही आदर्शवाद उन्हें राजनीति में कोई ठोस और व्यावहारिक कामयाबी हासिल नही करने देता वे सांसद भी रहे और खादी ग्रामोद्योग आयोग के समक्ष भी पर इस दौरान उन्हे नौकर शाही से काम कराने का जो मौका मिला था उसे वे व्यवहार से परिणति नही कर पाए। यह एक आदर्शवादी समाजवादी की पराजय भी है और विडंबना भी, सभंवतः सच्चे समाजवादी की कमजोरी  भी। समाजवादी आंदोलन की सांगठनिक और व्यावहारिक विफलता के कारण इसमें देखे जा सकते हैं। वे बादलों की तरह विचारों की जल वर्षा तो कर सकते हैं पर उसे संभाल कर अपनी खेती नही कर सकते। सामाजिक कार्यकर्ताओें के सहज मित्र सुरेंद्र मोहन कभी-कभी आंदोलनकारियों पर इसी नाते झुंझलाते भी थे वे कहते थे कि हर गोष्ठी में वहीं 20-25 चेहरे होते हैं, इससे आप लोग क्या कर लोगे। इससे न तो क्रांति होगी न समाजवाद आएगा।
इन विडंबनाओं के बावजूद आज के दौर में जिस तरह समाज की प्रमुख संस्थाओं में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का घुन लग रहा है, उसमें सुरेंद्र मोहन सामाजिक नैतिकता के दीप स्तभं थे। उनके होने से हमें नैतिक होने के लिए बाध्य होना पड़ता था और अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा होना पड़ता था। इसीलिए यह सवाल पूछने का फिर मन कर रहा है कि आखिर क्या खाकर सुरेंद्र मोहनजी जैसे लोग पैदा होते हैं? 
 
 
 
 
 
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