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होड़ की परंपरा

 नई दिल्ली । कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, नई दिल्ली में जसम के फिल्म समूह द ग्रुप की ओर से ‘तेभागा आंदोलन और सोमनाथ होड़ का कलाकर्म’ विषय पर चर्चित चित्रकार व साहित्यकार अशोक भौमिक का व्याख्यान-प्रदर्शन (लेक्चर डेमनस्ट्रेशन) आयोजित किया गया। यह आयोजन हिंदी के मशहूर कवि शमशेर बहादुर सिंह, जो कि एक चित्रकार भी थे, की याद को समर्पित था। ज्ञात हो कि यह वर्ष शमशेर का जन्मशताब्दी वर्ष भी है। अशोक भौमिक ने बताया कि 1946 में भारत की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने 23 साल के युवा कला छात्र सोमनाथ होड़ को तेभागा आंदोलन को दर्ज करने का कार्य सौंपा था। सोमनाथ होड़ ने किसानों के उस जबर्दस्त राजनैतिक उभार और उनकी लड़ाकू चेतना को अपने चित्रों और रेखांकनों में तो अभिव्यक्ति दी ही, साथ-साथ अपने अनुभवों को अपनी निजी डायरी में भी दर्ज किया। उनकी डायरी और रेखाचित्र एक जन प्रतिबद्ध कलाकार द्वारा दर्ज किया गया किसान आंदोलन का अद्भुत ऐतिहासिक दस्तावेज है।

अशोक भौमिक ने सोमनाथ होड़ के रेखाचित्रों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए और बीच-बीच में उनकी डायरी के अंशों का जिक्र करते हुए कहा कि 1942 से लेकर 1946 तक सोमनाथ होड़ की कला का सफर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जनांदोलनों को संगठित करने के समानांतर विकसित होते दिखता है। यही वह दौर था जब सांप्रदायिक शक्तियां भी मजबूती से सर उठा रही थीं। तेभागा आंदोलन में किसानों ने भूस्वामियों की सांप्रदायिक रणनीति का भी जोरदार जवाब दिया। किसान परिवार की महिलाओं ने भी इस संघर्ष में शानदार भूमिका निभाई। इस आंदोलन के प्रत्यक्ष अनुभव सोमनाथ होड़ के लिए आजीवन प्रेरणा का स्रोत बने रहे। उनका उस आंदोलन के केंद्र रंगपुर में जाना, एक रचनाकार का राजनीतिक गतिविधियोें और सक्रिय आंदोलनों के करीब जाने की जरूरत को आज भी रेखांकित करता है।
सोमनाथ होड़ द्वारा डायरी में एक बेहद गरीब किसान द्वारा एक जोतदार के प्रलोभन को ठुकरा दिए जाने की घटना की तुलना नेहरू के कथनी और करनी के फर्क से जिस तरह की गई है, वह एक तीखा राजनैतिक व्यंग्य है। सोमनाथ होड़ को मूल्यों के मामले में किसान एक प्रधानमंत्री से बेहतर लगता है, क्योंकि उसे घूस लेना नहीं आता- वह अपना हक लड़ कर लेना चाहता है। कार्यक्रम का संचालन युवा मार्क्सवादी विचारक पथिक घोष ने किया।
अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि इस व्याख्यान-प्रदर्शन के जरिए एक तरह से तेभागा के क्रांतिकारी किसान आंदोलन का इतिहास जीवंत हो उठा। प्रो. पांडेय ने तेभागा आंदोलन में संथाल आदिवासियों और महिलाओं की जबर्दस्त भूमिका की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि आज कला की दुनिया पर बाजार का जिस तरह कब्जा हो गया है उसने चित्रकारों की राजनीतिक भूमिका को कमजोर किया है। ऐसा नहीं है कि आज चित्रकला का राजनीतिक प्रभाव कम हो गया है, बल्कि हुआ यह है कि राजनीतिक चित्रकार कम हो गए हैं।
प्रो. पांडेय ने कहा कि आज इस देश में जब सरकार की कारपोरेटपरस्त अर्थनीति के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और जब जमीन और जंगल से किसानों और आदिवासियों को बेदखल करने के लिए सरकार जनसंहार कर रही है, तब कलाकारों का यह दायित्व है कि वे उसके प्रतिरोध में खड़े हों, उन सच्चाइयों को अपने कलाकर्म के जरिए दर्शाएं, जिनपर पर्दा डाला जा रहा है। आखिर में विचार-विमर्श के सत्र में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि सोमनाथ होड़ ने आगे चलकर किस तरह का सृजन किया व्याख्यान में इसकी झलक भी होनी चाहिए थी। कवि रोहित प्रकाश ने तेभागा और आजादी के बाद के जनांदोलनों का जिक्र करते हुए उनके चित्रकला पर प्रभाव को लेकर सवाल किया। संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने उस दौर के साहित्यकारों और कलाकारों के सौंदर्यबोध को निर्मित करने में राजनीति और संस्कृति के गहन रिश्ते की जो भूमिका थी, उसे चिह्नित किया।इस आयोजन के अंत में दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखंड के आंदोलनकारी जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा के असामयिक निधन पर शोक प्रकट किया गया। इस मौके पर मुरली मनोहर प्रसाद, अशोक वाजपेयी, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रबी, रेखा अवस्थी, कांति मोहन, अनिल सिन्हा, नीलाभ, मदन कश्यप, प्रणय कृष्ण, आशुतोष कुमार, वैभव सिंह, स्वाति भौमिक, मधु अग्रवाल, राधिका, नंदिनी चंद्रा, भाषा सिंह, उमा, वंदना, प्रदीप दास, अनुपम राय, अजय भारद्वाज, मोहन जोशी, गौरीनाथ, कुमार मुकुल, पंकज श्रीवास्तव, रोहित कौशिक, अवधेश आदि कई जाने माने साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और टेकानिया कला विद्यालय के छात्रा-छात्राएं मौजूद थे। 
प्रस्तुति : संजय जोशी 
 
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