अंबरीश कुमार
लखनऊ, मार्च। महिला आरक्षण बिल के पास होने के बाद सभी दलों का राजनैतिक संकट गहराने वाला है। ज्यादातर राजनैतिक दल महिला उम्मीदवारों के नाम पर बड़े नेताओं और अफसरों की पत्नियों को मैदान में उतारते रहे हैं। ऐसे में विधानसभा और लोकसभा के वर्गीय चरित्र भी असर पड़ेगा। चुनाव में हर दल के सामने महिला उम्मीदवारों का टोटा हो जता है। जो दल इस समय बढ़ चढ़कर महिला आरक्षण बिल की वकालत कर रहे हैं, धरातल पर उनकी राजनीति भी दोहरे चरित्र वाली रही है। बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों के लिए दस फीसदी से भी कम महिला उम्मीदवारों को टिकट दिए थे, जबकि कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी महिला रही और प्रदेश अध्यक्ष भी। बावजूद उसके सिर्फ छह उम्मीदवारों को लोकसभा चुनाव का टिकट मिला जिसमें से तीन संसद तक पहुंची। जिनमें से ज्यादातर को अपने परिवार के रसूख के चलते टिकट मिला। दूसरी तरफ आरक्षण बिल का विरोध करने वाली पार्टियां मसलन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस से पीछे नहीं रहीं। बसपा ने कांग्रेस से ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया। कांग्रेस ने जहां बड़े नेताओं और राज घरानों की महिलाओं को तवज्जो दी, वहीं सपा-बसपा ने पूर्व सांसदों और अफसरों के परिवार वालों का सहारा लिया।
यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव जसे नेता मानते हैं कि इस बिल के पास होने के बाद अफसर चलाएंगे सरकार और पत्नियां बनेंगी नेता। महिला उम्मीदवारों का टोटा पिछले लोकसभा चुनाव में इस कदर पड़ा कि उत्तर प्रदेश की चारों वामपंथी पार्टियों के मोर्चे को एक भी महिला उम्मीदवार नहीं मिली।
मुलायम सिंह यादव ने कहा, ‘इस बिल के चलते विधानसभा और संसद का वर्गीय चरित्र बदल जएगा। अगड़ी जतियों की महिलाओं को ज्यादा मौका मिलेगा और दलित, मुसलिम व पिछड़े तबके की महिलाएं पिछड़ जएंगी।’ महिला आरक्षण को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों के व्यवहारिक नजरिए का आंकलन पिछले लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी से हो जता है। मई, २00९ में हुए लोकसभा चुनाव में विभिन्न दलों ने किस तरह टिकट बांटे, यह एक बार फिर देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस ने जिन महिलाओं को टिकट दिया, उसमें सबसे ऊपर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी रहीं। सोनिया गांधी का राजनीति में पदार्पण, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद हुआ। वे इंदिरा-नेहरू परिवार की बहू हैं। रामपुर से बेगम नूरबानो को टिकट मिला जिनके पति नवाब जुल्फिकार अली उर्फ मिक्की मियां खुद सांसद रहे हैं। उनकी विरासत नूरबानो संभाल रही हैं। प्रतापगढ़ के दिग्गज नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिनेश सिंह की पुत्री राजकुमारी रत्ना सिंह को भी कांग्रेस से टिकट दिया गया और वे चुनाव जीतकर संसद पहुंची। इसी तरह पूर्वाचल के दिग्गज कांग्रेसी नेता कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय को मऊ से टिकट दिया गया था पर वे हार गईं। लखनऊ से रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया गया जो दिग्गज कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री हैं। उन्नाव से चुनाव जीतने वाली अनु टंडन देश के जने-माने औद्योगिक घराने के आला अफसर की पत्नी हैं और उनको टिकट दिलाने के लिए जबरदस्त खेमेबंदी भी हुई। यह उदाहरण कांग्रेस पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश से संसद पहुंची महिला नेताओं का है।
दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस से ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया। बसपा ने कांग्रेस के छह उम्मीदवारों के मुकाबले सात उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनमें से चार चुनाव जीती। कैसर जहां सीतापुर, सीमा उपाध्याय फतेहपुर सीकरी, राजकुमारी सिंह चौहान अलीगढ़, तबस्सुम हसन कैराना से चुनाव जीतीं। इस तरह उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा महिला सांसद बसपा की हैं। समाजवादी पार्टी की तीन महिला सांसद हैं जिनमें जयाप्रदा रामपुर, सुशीला सरोज मोहनलालगंज और ऊषा वर्मा हरदोई से चुनाव जीतीं। भारतीय जनता पार्टी ने हालांकि सबसे ज्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया पर भाजपा-लोकदल गठबंधन से दो महिलाएं मेनका गांधी और सारिका सिंह बघेल संसद पहुंची।
पिछले लोकसभा चुनाव की तस्वीर देखते हुए यह साफ है कि आने वाले चुनाव में भी राजनैतिक दलों के लिए महिला उम्मीदवारों का चयन आसान नहीं होगा। भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा-यह सही है कि महिला आरक्षण बिल पास हो जने के बाद हम लोगों का भी काफी नुकसान होगा। लेकिन कुछ समय बाद हालात बदलेंगे और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से विधानसभा और लोकसभा की नई तस्वीर नजर आएगी। मुलायम सिंह यादव और लालू यादव जसे नेता पिछड़ावाद के चलते इसका विरोध कर रहे हैं। इससे उनका राजनैतिक संकट और गहराने वाला है।
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