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किताब की राजनीति ?

 शिव दुबे

रायपुर. कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू पर नक्सलियों के समर्थक प्रफुल्ल झा से कथित संबंधों को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई है। वास्तव में इन आरोपों में कितना दम है और इसके पीछे की राजनीति क्या है,दैनिक भास्कर ने इसकी पड़ताल की। सारे तथ्यों को सामने लाने के प्रयास किए कि इसके पीछे असलियत क्या है?
इस मामले में जो सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर दो साल बाद अचानक इस मुद्दे को क्यों उठाया गया? प्रफुल्ल झा रायपुर में लंबे समय तक पत्रकारिता करते रहे। अखबारों से जुड़े होने के अलावा झा स्वतंत्र लेखन और किताबों का संपादन करते थे। इसी के चलते उन्होंने चंद्रशेखर साहू की किताब में संपादन नौ साल पहले किया था।
तब चंद्रशेखर साहू को भी यह नहीं पता था कि प्रफुल्ल झा आगे चलकर नक्सलियों के समर्थक के रूप में काम करने लगेंगे। लिहाजा कांग्रेस ने भले ही किताब प्रकाशित होने के दो साल बाद मामले को उठाया हो लेकिन उसके हाथ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हाथ लग गया है।
प्रफुल्ल झा को पुलिस ने 21 जनवरी 2008 को नक्सलियों के हथियार के साथ गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार झा नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को बढ़ाने के काम में इन्वाल्व थे। उसके बाद से ही उससे संबंध रखने वालों पर संदेह होने लगा। पत्रकार होने के कारण झा के अनेक लोगों से संबंध थे।
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने साफ-साफ कह दिया है कि जब तक वे अध्ययन नहीं कर लेंगे तब तक कुछ नहीं बोलेंगे। श्री जोगी की राजनीति को समझने वालों के लिए यह इशारा साफ है कि वे प्रदेश कांग्रेस की राजनीति से सहमत नहीं हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेंद्र साहू का कहना है कि मंत्री पद पर जो व्यक्ति बैठा है, उसके अगर नक्सलियों से समर्थक से संबंध उजागर हो रहे हैं तो स्थिति स्पष्ट होनी ही चाहिए। उनके लेख में नक्सली साहित्य का असर देखने को मिल रहा है।
कांग्रेस की राजनीति के विपरीत इस मामले में चंद्रशेखर साहू को भाजपा संगठन और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का पूरा साथ मिल रहा है। भाजपा ने जहां कांग्रेस के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया वहीं मुख्यमंत्री ने साफ कह दिया कि ओछी राजनीति के तहत कांग्रेस आरोप लगा रहे हैं।
भाजपा संगठन ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के लिए प्रफुल्ल झा द्वारा लिखी किताब ढूंढ़ निकाली और कांग्रेस पर नक्सलियों के समर्थक होने का आरोप जड़ दिया। भाजपा संगठन ने पिछले दो दिनों से कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।
विवादित अंश : प्रफुल्ल झा या चंद्रशेखर साहू के उस लेख में लिखा है -‘‘यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि लखौली की घटना के लिए नक्सली या आतंकी कतई जिम्मेदार नहीं हैं। पर यदि ऐसी घटनाएं होती रहीं तो नक्सलियों को छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में पसरने से रोकना संभव नहीं होगा। दरअसल आर्थिक विषमता से ही नक्सलवाद पनपता है।’’ (लखौली में किसान अपनी मांगों को लेकर एकत्र हुए थे। किसानों ने लाठी चार्ज किया तो वहां स्थिति बिगड़ गई और किसानों ने हिंसक प्रदर्शन कर पुलिस पर पथराव किया और पुलिस की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया था।)
पुरानी राजनीतिक लड़ाई है
इस मामले में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अधिक है। चंद्रशेखर साहू इस बात को खुले तौर पर कह रहे हैं कि इस विवाद के पीछे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेंद्र साहू हैं। वे अभनपुर विधानसभा में अपनी हार को भुला नहीं पा रहे हैं। धनेंद्र साहू और चंद्रशेखर साहू एक दूसरे के पुराने प्रतिद्वंद्वी हैं।
पिछला चुनाव चंद्रशेखर साहू ने कड़े मुकाबले में जीत लिया। इससे पहले धनेंद्र साहू जीतते रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होते हुए भी धनेंद्र साहू चुनाव हार गए। भाजपा नेताओं की मानें तो धनेंद्र साहू अपनी हार का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर साहू पर इस तरह के आरोपों को हवा दे रहे हैं।
उनके निर्देश पर ही पूरी पीसीसी इस मामले में इनवाल्व हो गई है। उनके इस अभियान को पार्टी के सभी विधायकों का साथ नहीं मिल रहा है। बात तो अब यह भी होने लगी है कि इस मामले में प्रदेश कांग्रेस संगठन और विधायक दल में फूट पड़ गई है।
 
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