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मोदी का ‘जीवंत’ गुजरात

 हर्ष मंदर

वर्ष 2002 में अहमदाबाद में हुए दंगों में वह छोटी सी बेकरी जलकर खाक हो गई थी। आज आठ साल बाद भी वह बंद है। फिर से 
बनाई गई भट्टी उजाड़ पड़ी है। अब कोई भी ग्राहक वहां से आटे के बिस्कुट और ब्रेड खरीदना नहीं चाहता, भले ही अतीत में लोग उन्हें 
खूब पसंद करते होंगे। जब एक दशक पहले उन्होंने बेकरी शुरू की थी, तब उन्होंने बड़े ही गर्व के साथ उसका नाम ‘जयहिंद’ रखा था।
वे अपने पड़ोसियों से कहा करते थे, ‘लोग अपनी दुकानों के नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखा करते हैं, लेकिन हम अपने देश के 
सम्मान में अपनी बेकरी का नाम रखना चाहते थे।’ जब अब्दुल भाई और नूरी बहन ने 1992 में बेकरी और घर के लिए भूखंड खरीदा, 
तब उन्हें एक पल के लिए भी यह चिंता नहीं हुई कि हिंदुओं की बस्ती ठक्कर नगर में वे एकमात्र मुस्लिम होंगे। वे कहते हैं, ‘उस 
समय हमारे पड़ोसियों के मन में हमारे प्रति कोई भेदभाव, कोई बैर नहीं था।’ लेकिन फिर २क्क्२ आया और नफरत की आग ने सब 
कुछ बदल दिया।
छह महीने राहत शिविर में रहने के बाद जब यह दंपती अपने घर लौटे तो उनके परिवार के कई लोग लापता थे, उनकी जिंदगी भर की 
कमाई स्वाहा हो चुकी थी, लेकिन अब भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। उन्होंने सबसे पहले मिट्टी की भट्टी बनाई, कुछ पैसे उधार लिए 
और जयहिंद बेकरी शुरू कर दी। लेकिन मुस्लिम उत्पादों के बहिष्कार के चलते उनकी बनाई चीजें बिकी ही नहीं। तब अब्दुलभाई ने 
एक लकड़ी के ठेले में अपना सामान रखकर शहर के उन इलाकों में बेचना शुरू किया, जहां उनकी मुस्लिम पहचान से कोई अवगत नहीं 
था। पहले वे जितना कमाते थे, अब वे उसका एक ही हिस्सा कमा पाते हैं।
उस कत्लेआम के बाद भी उन्हें भरोसा था कि घृणा की यह आग एक न एक दिन जरूर ठंडी हो जाएगी। लेकिन अब्दुल और नूरी अब 
मोदी के ‘जीवंत’ गुजरात में हार मान चुके हैं। उनमें से अधिकांश अपने नष्ट मकानों के ऊपर फिर से छत नहीं बांध पाए हैं। नूरी जब 
अपने बर्बाद मकान को दिखाने ले जाती हैं तो उनकी आवाज कांप रही होती है। वे अब अपनी जायदाद को बेचकर किसी सुरक्षित 
मुस्लिम बस्ती में चले जाना चाहते हैं। लेकिन लोग जानते हैं कि वे अपनी जायदाद को बेचने के लिए कितने व्यग्र हैं और इसलिए 
बाजार भाव के एक हिस्से से ज्यादा कीमत नहीं चुकाना चाहते।2002 में उनका बहुत कुछ खो गया, उनका धंधा, उनका घर, पैसा जो उन्होंने अपने बच्चों की शादी करने के लिए जमा करके रखा था, लेकिन इससे भी ज्यादा अपने पड़ोसियों की मित्रता और विश्वास। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उन्होंने अपने दो बच्चों को भी खो दिया था। 28 फरवरी 2002 की सुबह से ही उनके रिश्तेदार अहमदाबाद के विभिन्न हिस्सों से हत्या, बलात्कार, लूटमार और छीनाझपटी की खबरों के साथ उनके वहां एकत्र होने लगे थे। उनके हिंदू पड़ोसी राजेंद्र जो पेशे से वकील थे, ने भी उन्हें आगाह किया, लेकिन वे इस बात पर अडिग थे कि उनके पड़ोसी उनका बाल भी बांका नहीं होने देंगे। राजेंद्र अब भी उनके एक बेटे जाहिद को अपने घर ले जाने पर अड़े हुए थे, जो उस समय बेकरी में काम कर रहा था। वे अंतत: जाहिद को अपने घर ले गए और उसकी जान बच गई।
शाम हो रही थी। अब्दुल बिस्कुट बना रहे थे और नूरी अपने भयभीत रिश्तेदारों के लिए खाना पका रही थीं। तभी दो अलग-अलग 
दिशाओं से भीड़ उस अकेले मुस्लिम घर और दुकान की ओर टूट पड़ी। कुछ पड़ोसियों ने भीड़ की अगुवाई करने वालों को समझाने की 
कोशिश की, लेकिन पुलिस वाहनों के आते ही भीड़ ज्यादा उत्तेजित हो गई। अब रिश्तेदार और परिवार के लोग अलग-अलग दिशाओं में 
भागने लगे। देर रात गए भीड़ तो छंट गई, लेकिन उसकी लगाई आग अब भी दहक रही थी। अब्दुल और नूरी अपने छोटे बेटे 
अल्लादीन के साथ राजमार्ग और फिर बस स्टैंड की तरफ भाग निकले। सब तरफ दहकती हुई आग की सर्द दहशत थी, खूनखराबे के 
आसार थे और चीखें थीं।
बस स्टैंड पर उन्हें यह देखकर राहत मिली कि उनकी दोनों बेटियां एक कोने में उनका इंतजार कर रही थीं, जो भीड़ से बच निकली 
थीं। वे पहले अपने एक हिंदू मित्र ठाकुर के घर यह अनुरोध करने पहुंचे कि वे उनकी दोनों बेटियों को अपने यहां पनाह दे दें। लेकिन वे 
घर पर नहीं थे और उनकी पत्नी ने डर से दरवाजा खोलने से इनकार कर दिया। लेकिन जब वे अपने दूसरे हिंदू मित्र रामभाई के यहां 
पहुंचे तो भाग्य ने उनका साथ दिया। उन्होंने उनका स्वागत तो किया, लेकिन वे इसे लेकर चिंतित भी थे कि भीड़ द्वारा जल्द ही उनका 
घर खोज लिया जाएगा क्योंकि कई लोगों को उन दोनों की दोस्ती के बारे में पता था। वे बाहर गए और उन्हें अर्ध सैन्य जवानों की 
टुकड़ी नजर आई, जिस पर उन्हें स्थानीय पुलिस से ज्यादा भरोसा था। वर्दी-हथियारधारी जवान इस कुनबे को मुस्लिम इलाके के एक 
जूनियर स्कूल बिल्डिंग में ले गए, जिसे उनके समुदाय ने एक राहत शिविर में तब्दील कर रखा था।
उनका पहला काम था इस विपदा के चलते बिखर गए अपने परिवार को फिर से एक साथ लाना। दो लड़कियां उनके साथ थीं। उन्हें 
जाहिद की सुरक्षा के बाबत पुन: यकीन दिलाया गया। लेकिन वाहिद और सायरा की अब भी कोई खैर-खबर नहीं थी।
दिन गुजरते गए। शिविर में पनाह लेने वाले हजारों लोगों के लिए व्यवस्थापकों ने उनके प्रियजनों की तलाश के लिए वाहनों का 
बंदोबस्त किया। सैकड़ों लोग शिविर-दर-शिविर बदहवासी की हालत में भटकते रहे। शाह आलम जैसे कुछ व्यवस्थापकों को 12 हजार से 
अधिक रहवासियों का इंतजाम करना था और उन्होंने दरगाह के बड़े दरवाजे के करीब एक यूनिट स्थापित कर रखी थी, ताकि लोगों को 
अपने गुमशुदा प्रियजनों से मिलाने में मदद की जा सके। अब्दुल और नूरी वहां मौजूद हजारों बच्चों के चेहरे परखते रहे, लेकिन उनके 
बच्चे वहां नहीं थे।
लाचार मां-बाप को अंतत: सरकारी अस्पताल के शव-गृह में मौजूद उन शवों के बीच अपने बच्चों की तलाश करने के शिविर 
व्यवस्थापकों के सुझाव को मानने पर मजबूर होना पड़ा, जिनकी अभी तक शिनाख्त नहीं की जा सकी थी। वहां अहातों में सड़े-गले शवों 
के ढेर लगे हुए थे। कई संतप्त परिजनों को इन्हीं मृतकों के चेहरे टटोलने पड़े, जिनमें से कई जले हुए थे या चाकू के घावों से बुरी तरह 
जख्मी थे। ‘हमारी हालत कुछ ऐसी थी कि हमने शवों को इधर-उधर फेंकना शुरू कर दिया और ऐसा करते समय हम यह भी भूल गए 
कि वे हमारे जैसे ही लोगों के प्रियजनों के शव थे।’ लेकिन उन्हें कहीं भी उनके बच्चे नहीं मिले।
इन आठ लंबे सालों के बाद भी उनकी तलाश अभी खत्म नहीं हुई है। और कौन जानता है कि उनकी यह तलाश कभी खत्म होगी भी 
या नहीं? वे आज भी लाचारी के साथ आंसू बहाते हैं: ‘हमें बिल्कुल नहीं पता कि उम्मीद बनाए रखें या नाउम्मीद हो जाएं..!’
 
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