पंकज कुमार पांडेय
नई दिल्ली. महंगाई के मसले पर प्रधानमंत्री की ओर से बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक आखिरकार राजनीतिक रंग में ढल गई। बैठक बुलाई गई थी इस उम्मीद में कि केंद्र और राज्य मिलकर जरूरी वस्तुओं की कीमत कम करने का कोई साझा फामरूला तलाशेंगे,लेकिन इस मौके का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिबद्धता के मुताबिक जुबानी जंग के लिए किया गया।
बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए तीन रुपए प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं और चावल की आपूर्ति करने के कांग्रेस के चुनावी वादे का मसला उठाया, तो मोदी के वार से झल्लाए वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि मुख्यमंत्रियों की बैठक का राजनीति के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
हालांकि बैठक समाप्त होते-होते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आम सहमति बनाने की कोशिश करते हुए महंगाई पर नकेल लगाने के लिए दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक समिति बना दी। इसकी अध्यक्षता खुद प्रधानमंत्री करेंगे। बैठक में प्रधानमंत्री ने पुरानी पड़ चुकी खाद्य वितरण प्रणाली को मौजूदा जरूरतें पूरी करने में अक्षम बताते हुए उसकी रूपरेखा बदलने की जरूरत पर बल दिया। हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि मुद्रास्फीति का बुरा दौर खत्म हो चुका है।
उन्होंने जमाखोरों पर कड़ी कार्रवाई के लिए चेतावनी देते हुए केंद्र की मुहिम में राज्यों से सहयोग करने को कहा।
पवार की रणनीति से भी नहीं माने मोदी
सबके निशाने पर रहे पवार ने रणनीतिक रूप से कांग्रेस नीत हरियाणा के साथ दो विपक्षी राज्य सरकारों गुजरात और पंजाब की प्रशंसा करके खुद को राज्यों के आक्रामक तेवर से बचाने की कोशिश की। पवार ने हरियाणा और पंजाब की खराब मानसून के बावजूद उत्पादन में स्थिरता के प्रयासों की सराहना की।
जबकि पवार ने गुजरात द्वारा जलसंरक्षण के प्रयास को सराहा गया। पंजाब और हरियाणा को खाद्य सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों की वजह से प्रधानमंत्री ने भी सराहा, लेकिन उन्होंने गुजरात का नाम नहीं लिया। बावजूद इसके जब मोदी का नंबर आया तो उन्होंने केंद्र पर तोहमत लगाने में कसर नहीं छोड़ी। छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह, मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान समेत कई अन्य मुख्यमंत्रियों ने केंद्र पर सीधा निशाना साधा।
शिवराज ने इस बैठक को रस्म अदायगी बताया
यूं चला संवाद : प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में वर्ष 1998 की चर्चा करते हुए कहा कि मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी पहली बार नहीं हुई है। केंद्र और राज्यों को मिलकर इस समस्या से निपटना है। बाद में मोदी जब बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने प्रतिकूल जलवायु परिस्थितयों के बावजूद वर्ष 2000-02 के बीच कीमतें बेकाबू नहीं हुईं।
गौरतलब है कि उस समय केंद्र में एनडीए सरकार थी। मोदी ने केंद्र के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि न्यनूतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की वजह से कुछ जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं।
महंगाई पर बनी केंद्र - राज्यों की कमेटी : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई के मसले पर केंद्रीय मंत्रियों और राज्यांे के मुख्यमंत्रियों को शामिल करके एक उच्चस्तरीय समिति बनाई है। यह समिति सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और खाद्य पदार्थों की कीमतों में कमी लाने के लिए उपायों पर गौर करेगी।
समिति में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के अलावा आंध्र प्रदेश, असम,बिहार,पश्चिम बंगाल,पंजाब,गुजरात,हरियाणा,तमिलनाडु,मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को शामिल किया गया है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी कमेटी के सदस्य होंगे।
केंद्र सरकार पर आरोपों के तीर
मोदी ने पवार को तो निशाने पर लिया ही केंद्र के तर्क को एक के बाद एक खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि महंगाई के लिए राज्य सरकारें और मौसम नहीं, केंद्र की गलत नीति जिम्मेदार है। रमन सिंह ने भी कहा कि महंगाई की तोहमत राज्यों पर मढ़ना ठीक नहीं है। उन्होंने जरूरी वस्तुओं के वायदा कारोबार पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
वहीं उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए केंद्र से पहल करने को कहा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी मंहगाई की ठीकरा राज्यांे के सिर फोड़ने की प्रवृत्ति को गलत बताया।
दाल नहीं पीली मटर खाओ
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाल की कमी का जिक्र करते हुए कहा कि इसे देखते हुए सरकार ने पीली मटर का आयात किया है, जो दाल का विकल्प बन सकती है।
मत चखो चीनी
बढ़ती कीमतें रोकने में कृषि मंत्री की नाकामी छिपाने के लिए एनसीपी ने नया फॉमरूला निकाला है। इसके अनुसार, लोग चीनी से परहेज करें, क्योंकि इससे डायबिटीज होती है। यह बात पार्टी ने अपने मुखपत्र ‘राष्ट्रवादी’ के संपादकीय में कही है