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क्रिकेट, किताब और राजनीति

 हिमांशु बाजपेयी

अपनी बेबाक बयानी के लिए मशहूर भारतीय विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन शहरयार खान के साथ मिल कर एक किताब लिखी है।
ये किताब भारत-पाकिस्तान क्रिकेट के साठ सालों के सफ़र की पड़ताल करती है। लेकिन इस किताब के बहाने लेखकों ने दोनों देशों के राजनैतिक,सांस्कृतिक और आर्थिक हालात पर भी तल्ख़ टिप्पणियाँ की हैं। दिलचस्प बात ये है की इस किताब में दोनों लेखक डिप्लोमैटिक बिलकुल नहीं हैं।
खेल की सियासत और सियासी खेल दोनों पर बात करते हुए ये लेखक सियासतदां की तरह नहीं बोले हैं। लेकिन इतना ज़रूर है की शहरयार हों या थरूर दोनों अपने-अपने मुल्क के झंडाबरदार के तौर पर नज़र आते हैं और ऐसा नज़र आने के लिए वे मौका-बेमौका दुसरे देश पर तंज़ करने से भी नहीं चूके हैं। थरूर इस काम में शहरयार से कुछ आगे ही दिखाई देते हैं।
किताब की बिलकुल शुरुआत में ही वे पाक राजव्यवस्था पर एक फिकरा कसते हुए लिखते हैं की भारत में राज्य के पास एक फ़ौज होती है जबकि पाकिस्तान में फ़ौज के पास राज्य होता है। थरूर कारगिल युद्ध के दौरान पाक के दोहरे चरित्र को सीधे-सीधे नापते हुए लिखते हैं की वाजपेयी जब पाकिस्तान यात्रा के दौरान अपने स्वागत से अभिभूत थे तब असल में पाकिस्तान भारत की पीठ में छुरा भोकने की तैय्यारी कर रहा था।लेकिन इस बेबाक बयानी में शहरयार खान पीछे रह गए हों ऐसा बिलकुल नहीं है। क्यूंकि उन्होंने भी 2011 विश्वकप को लेकर भारत के रवैय्ये पर कड़े सवाल उठाये हैं।
खान लिखते हैं की भारत की लापरवाही की वजह से उपमहाद्वीप से इस विश्वकप की मेजबानी छिनते-छिनते बची। भारत तैयारियों को लेकर सोता रहा और अंत में आईसीसी की बैठक में मिन्नतें करने के बाद उसे अतिरिक्त मोहलत मिली। किताब में युद्धों, संस्कृति, बंटवारे, खेल आदि कई मुद्दों पर दिलचस्प बातें की गयीं हैं।
किताब का अंत किसी सुखद कहानी की तरह आशाजनक है। थरूर लिखते हैं की हम उम्मीद करते हैं की भारत-पाक के रिश्ते एक दिन अमेरिका-कनाडा की तरह स्वस्थ होंगे लेकिन मुझे मालूम है की ये मेरे जीवनकाल में नहीं होगा। वही खान लिखते हैं की क्रिकेट का खेल दोनों मुल्कों के रिश्ते सुधारने का सबसे बड़ा जरिया बनेगा।
 
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