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राजपथ पर बेवाई फटे पैर

 अंबरीश कुमार

हाल ही में लुटियन की दिल्ली के चमचमाते राजपथ पर जब  बेवाई फटे नंगे पैर हाथ में गन्ना लिए धोती कुरते वाला किसान नज़र आया तो नव दौलतिया वर्ग ने जो कुछ हिकारत की भाषा में कहा उसे टीवी  वालो ने पुरे देश को परोस दिया था। किसान दिल्ली कोई पिकनिक मनाने नहीं आये थे ,वे देश की सबसे बड़ी पंचायत से गुहार लगाने आये थे। वे बिचौलिये की तरह मुनाफा बढाने का नाजायज हथकंडा नहीं अपना रहे थे बल्कि महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलते हुए सत्याग्रह करने आये थे।पर उस दिल्ली में जहाँ नव धनाढ्य तबका का कोई सिरफिरा अपनी मंगेतर को तंदूर में भून डाले या फिर बड़े कांग्रेसी का बिगडैल लाडला दारु न देने पर जवान युवती का क़त्ल कर दे समाज में कोई तूफ़ान नहीं आता । मीडिया के एक तबके ने भी अन्नदाता की खिल्ली उड़ाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी । पहले भारत की जो छवि विदेशी मीडिया देश के बाहर बनता था आज किसान की वही छवि देसी मीडिया देश में बनता है ।
 सिर्फ किसान ही नहीं आदिवासी ,गरीब और गाँव सभी हाशिये पर है। जल, जंगल और जमीन का संघर्ष जगह जगह चल रहा है पर मीडिया में उसे काफी कम जगह मिलती है। किसान जगह जगह संघर्ष कर रहा है ।उत्तर प्रदेश के महोबा से लेकर छत्तीसगढ़ के महासमुंद तक।बंगाल से लेकर महारास्त्र  के  विदर्भ तक  । कही पर खाद ,पानी और बिजली की मांग करता किसान पुलिस की लाठी खाता  है तो कही पर संघर्ष का रास्ता छोड़ कर ख़ुदकुशी करने पर मजबूर हो जाता है । बुंदेलखंड से लेकर विदर्भ तक किसान मौत को भी गले लगा रहे है  ।  विदर्भ के ११ जिलों में  वर्ष 2001से जनवरी २००९  तक  48०6 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। केंद्र सरकार के पैकेज के बाद औसतन दो किसान रोज खुदकुशी कर रहे हैं। ।साहूकारों के कर्ज में विदर्भ के ज्यादातर किसान परिवार डूबे हैं। इनकी मुख्य वजह वित्तीय संस्थानों और बैंकों का यहां के किसानों की उपेक्षा किया जाना है।विदर्भ में किसान जो कर्ज लेते है उसमे  ६५ से 7० फीसदी कर्जा गांव और आसपास के साहूकारों का होता है,जिसके लिए साहूकार  6० से लेकर 1०० फीसदी ब्याज वसूलता है । कर्ज भी नकद नहीं मिलता। गांव में साहूकारों के कृषि केन्द्ग खुले हुए हैं। इन्हीं से किसानों को कर्ज के रूप में बीज, खाद और कीटनाशक मिलता है। विदर्भ की त्रासदी यह है की अब् गाँव गाँव में ख़ुदकुशी कर चुके किसानो की हजारों विधवा औरतें खेत बचाने के लिए संघर्ष के रही है  । किसानो का संघर्ष कई जगहों पर अपनी ताकत भी दिखा चूका है  ।   नंदीग्राम से सिन्दूर तक किसानो के आन्दोलन की आंच वाम खेमा न सिर्फ महसूस कर चूका है बल्कि सत्ता से बाहर जाता नज़र आ रहा है। दादरी के किसान आन्दोलन ने मुलायम सिंह को सत्ता से बेदखल कर दिया।पर उस मीडिया को यह समझ नहीं आता जो मोतियाबिंद का शिकार है।
फिर भी देश के अलग अलग हिस्सों में किसान एक ताकत बनकर उभर रहा है ।कही पर किसानो के धुर्वीकरण का असर ज्यादा है तो कही कम ।पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान मजबूती से खड़ा हो जाता है तो विदर्भ का किसान निराश होकर ख़ुदकुशी का रास्ता चुन लेता है।पर वहां भी प्रतिकार के लिए किसान लामबंद हो रहा है। उत्तर प्रदेश में एक तरफ बुंदेलखंड का किसान सालो से सूखा के चलते पलायन कर रहा है तो पूर्वांचल में बाढ़ से तबाह हो गया है । गोंडा,बस्ती से लेकर फैजाबाद जैसे कई जिलों में खाद के लिए किसानी पर पुलिस लाठी भांजती है । सहारनपुर ,मेरठ ,बुलंदशहर और मुज्जफरनगर में गन्ने के खेत में आग लगाकर किसान आत्मदाह कर रहा है  । विकास की नई  अवधारण में किसान की कोई जगह नहीं बची है।शहर बढ़ रहे है तो गाँव  की कीमत पर और गाँव  के ख़त्म होने का अर्थ किसान का ख़त्म होना है।लखनऊ शहर के गाँव  ख़तम होते जा रहे है ।चिनहट के बाबूलाल के पास सात बीघा जमीन थी जो शहर से लगी थी  । लखनऊ की  विस्तार योजना में उसकी जमीन चली गई जो पैसा मिला वह शादी ब्याह और मकान बनाने में ख़तम हो गई ।जिसके बाद रिक्शा चला कर परिवार का गुजारा होता है ।बीमार पड़ते ही फांकाकशी की नौबत आ जाती है । यह उनका उदहारण है जो साल भर अपनी खेती से खाते थे और शादी ब्याह का दस्तूर भी निभा लेते थे।गंगा एक्सप्रेस वे और यमुना एक्सप्रेस वे के नाम पर हजारो किसान अपनी खेती से बेदखल होने जा रहे है।
जब दादरी में किसानो की जमीन के अधिग्रहण के सवाल पर  वीपी सिंह ने  आन्दोलन शुरू  किया तो देवरिया से दादरी के बीच उनके किसान रथ पर राजबब्बर के साथ हमने भी कवरेज के लिए कई बार यात्रा की ।कई जगह पर रात बारह बजे तक पहुँच पाते थे पर किसान सभा में मौजूद रहते। जगह जगह वीपी सिंह से किसान यही गुहार लगते की जमीन से बेदखल न होने पाए ।जमीन का सवाल किसान के लिए जीवन का सवाल है।यही वजह है की दादरी का आन्दोलन आज भी जिन्दा है और उम्मीद है की किसान अदालती लड़ाई भी जित जायेगा।यह भूमि अधिग्रहण का संघर्ष करने वाले किसानो को नई ताकत भी देगा।यह लड़ाई सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं पूर्वांचल में भी चल रही है ।गंगा एक्सप्रेस वे उदहारण है ।अदालती रोक के बावजूद जेपी समूह के कर्मचारी मिर्जापुर के गावं में पैमाइश कर खूंटा गाद रहे है ।और राजधानी लखनऊ से उन्नाव के बीच लीडा के नाम किसानो के 84 गावं अपना अस्तित्व खोने जा रहे है ।यमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के दायरे में ९५०  सौ गाँव  आ रहे है।  इसी तरह गंगा एक्सप्रेस वे २१ जिलो के कई सौ गाँव को प्रभावित करेगी ।यह सब योजनाये बड़े पैमाने पर किसानो का विस्थापन  करेंगी। 
जबकि दादरी की लड़ाई २७६२ एकड़ जमीन की थी ।दादरी आन्दोलन से जुड़े रहे भाकपा नेता डाक्टर गिरीश यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण को लेकर खेती बचाओ -गावं बचाव आन्दोलन में जुटे है ,जमीन के सवाल पर गिरीश ने कहा -किसान जमीन नहीं देगा यह तय कर चूका है।यह फैसला यमुना एक्सप्रेस वे से प्रभावित चारों जिलों के किसानो का है ।इस परियोजना से आगरा ,मथुरा ,हाथरस और अलीगढ के ८५० गावं प्रभावित हो रहे है।यह इलाका आलू की थाली कहलाता है जहाँ का किसान हर साल लाखों का आलू बेचता है।मामला सिर्फ सड़क बनाने का नहीं है ।गिरीश ने आगे कहा -सड़क के दोनों तरफ माल और रीसोर्ट बनाकर किसानो को उनकी जमीन से बेदखल करना क्या विकास  है ।  
कुछ महीने पहले नागपुर के आगे हम ऐसे ही एक गावं सीवनगावं में थे जहाँ  किसान भूमि अधिग्रहण की लड़ी लड़ रहा था ।यह इलाका संतरा पट्टी के रूप में मशहूर है । करीब  दस एकड़ खेत सामने नज़र आता है ,जिसमे संतरा लगा था ,बीच में अरहर ।पक्का घर और दो वाहन खड़े नज़र आते है  । एक मारुती वेन और एक इंडिका कार।हाथ पकड़कर किसान भुसारी ने संतरे के खेतो को दिखाते हुए कहा - हमारी दस एकड़ की खेती है। हर साल ५-६ लाख की आमदनी संतरा और अन्य फसलो से हो जाती है पर इस जमीन के बदले उन्हें करीब चार लाख मुआवजा मिल रहा है जिससे आस पास एक बीघा जमीन भी नहीं मिलेगी  ।उनका सवाल है -हम लोग क्या करेंगे? पूरा परिवार सदमे में है और यह हाल एक नहीं कई परिवारों का है।    इस गांव के आस-पास ग्यारह गांवों तिल्हारा, कलकुही, सुनढाना, रहेगा, खापरी, चिजभवन, जामथा, खुर्सापार, हिंगना और इसासनी गावों की करीब दस हजार ऐकड जमीन मेहान परियोजना की भेंट चढ चुकी है। मेहान का मतलब मल्टी मोडल इंटरनेशनल  हब एंड एअरपोर्ट होता है। जो महाराष्ट्र एअरपोर्ट डेवलपमेंट कम्पनी ने बनाया है। जिसके चलते किसानों से एक एकड जमीन पचास हजार से लेकर डेढ लाख रूपए मे ली गई और उद्योगपतियों को पचपन लाख रूपए एकड के भाव दी जा रही है। जिसके चलते आस-पास के इलाकों की जमीन की कीमत और ज्यादा बढ गइ है। जिसमें नेताओं और उद्यमियों ने बडे पैमाने पर निवेश करना शुरू कर दिया है। नागपुर से वर्धा की तरफ बढे तो किसानो के खेत पर उद्योगपतियों का कब्ज़ा नज़र आ जायेगा । सडक के किनारे-किनारे वास्तुलैंड, ग्रेसलैंड, सन्देश  रिअल स्टेट, वेंकटेश सिटी, सहारा सिटी, श्री बालाजी रिअल र्टफ जैसे बोर्ड नजर आते। सारा खेल बडे नेताओं और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का है। 
विदर्भ में किसान का बेहाल है ।अकोला ,अमरावती ,वर्धा ,भंडाराकही भी जाये किसानो की बदहाली नज़र आ जाएगी । यह वही इलाका है जहां कभी जमना लाल बजाज ने महात्मा गांधी को लाकर बसाया था। सेवाग्राम में गांधी यहीं के किसानों के कपास से सूत कातते थे। जमना लाल बजाज  भी कपास के व्यापारी थे। उस समय विदर्भ का कपास समूचे विश्व में मशहूर था और मैनचेस्टर तक जाता  था। आज वही कपास किसान खुदकुशी करने को मजबूर हैं। जवान किसान खुदकुशी कर ले तो उसकी पत्नी किस त्रासदी से गुजरती है, वह यहां के गांव में देखा जा सकता है। खेत से लेकर अस्मत बचाने तक की चुनौती झेल रही इन महिलाओं की कहानी कमोवेश एक जैसी है। अकोला के तिलहारा ताल्लुक की शांति देवी ने से बात हुई तो उसका जवाब था , 'आदमी तो चला गया, अब खेत कैसे बचाएं। खेत गिरवी है। साहूकार रोज तकाजा करता है। एक बेटा गोद में तो दूसरी बच्ची का स्कूल छूट चुका है। पच्चीस हजार रूपए कर्जा लिया था और साहूकार पचास हजार मांग रहा है। नहीं तो खेत अपने नाम कराने की धमकी देता है। फसल से जो मिलेगा, वह फिर कर्जा चुकाने में जाएगा। क्या खाएंगे और कैसे बच्चों को पालेंगे? कर्ज माफ़ी का हमे कोई फायदा नहीं हुआ है ।’ यह एक उदहारण है विदर्भ के ज्यादातर जिलों में यही नज़ारा देखने को मिलेगा ।
यही हाल छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के ओडिसा से लगे इलाके का है जो कालाहांडी जैसा ही है ।उत्तर प्रदेश की तरफ आये तो भूखे और सूखे बुंदेलखंड में अकाल से लड़ते किसानो को देखा जा सकता है।पिछले साल इसी इलाके में हमने एक किसान परिवार को राख में पानी घोलकर अपने सात साल के बेटे को पिलाते देखा।वजह पूछने पचास साल के दसरथ का जवाब था-जब अन्न नहीं बचा तो क्या करें।यह ख़ुदकुशी के पहले का चरण मन जाता है इसके बाद क्या विकल्प बचेगा।इस दर्द को वे नहीं समझ सकते जो न तो किसान को जानते है और न ही गाँव को।न वह मीडिया जो दिल्ली में अपनी आवाज उठाने आये किसान की पेसाब करते हुए फोटो छापता है।उत्तर प्रदेश के कुछ किसान ही दिल्ली गए थे ,सभी नहीं।प्रदेश में चालीस लाख गन्ना किसान है जो वोट के लिहाज से भी बड़ी ताकत है ।कांग्रेस ने जिस तेजी से किसानो की बात मानी उसके पीछे वोट की ही राजनीति थी ।कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी गाँव और किसान को राजनैतिक एजंडा बनाए हुए है और उत्तर प्रदेश का २०१२ का विधानसभा चुनाव उनके लिए चुनौती बना हुआ है ।ऐसे में गन्ना किसानो की नाराजगी कांग्रेस को भरी पड़ती।राहुल गाँधी ने प्रधानमन्त्री से मुलाकात कर दखल देने को कहा था।
उत्तर प्रदेश में करीब सवा सौ चीनी मिलें है जिनमे २४ सहकारी ,११ निगम यानि सरकारी और ९४ निजी चीनी मिले।पूरब से पश्चिम तक की यह चीनी मिले भी गन्ना किसानो का कम शोषण नहीं करती।छोटे किसान को तो गन्ने की पर्ची तक नहीं मिल पाती और वह बिचौलियों को कम दाम पर गन्ना देकर पीछे हट जाता है।छोटा किसान हर जगह नुक्सान उठाता है ।कम कीमत पर गन्ना देना और धर्मकांटा पर घटतौली यानी कम गन्ना तौल कर ठगने की कोशिश करना।इसके आलावा भुगतान समय पर न होने की दशा में ब्याज का प्रावधान है पर चीनी मिल मालिक इसके लिए भी सालों चक्कर कटवाते है।
दुसरे राज्यों में चीनी मिल मालिक गन्ना किसानो का गन्ना सीधे खेत से उठाता है पर उत्तर प्रदेश में गन्ना क्रय केंद्र  तक गन्ना किसान खुद पंहुचाता है और आगे ले जाने का पैसा भी मिल वाले काटते है ।अपवाद एकाध मिल मालिक है जो चीनी की ज्यादा रिकवरी के लिए गन्ना खेत से उठाते है।इस सब कवायद के बाद गन्ना किसान को पैसा मिलता है।चीनी का दाम आसमान छू रहा है पर गन्ना की कीमत मांगना गुनाह हो गया है। निराश होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई किसान ख़ुदकुशी कर चुके है।गन्ना किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति भी प्रभावित करते है ,यही वजह है चौधरी अजित सिंह से लेकर महेंद्र सिंह टिकैत तक ने दिल्ली में किसानो की पंचायत बुलाई ।दिल्ली जाने से पहले मेरठ में जो किसान पंचायत बुलाई गई थी उसमे अजित सिंह ने किसानो से कहा था -एक गन्ना और दो लत्ता यानि कपडा लेकर दिल्ली आ जाना ,पूड़ी - सब्जी का इंतजाम कर दूंगा।गन्ना किसान दिल्ली पंहुचा तो सड़क जाम हो गई ,हर तरफ किसान नज़र आ रहा था ।नंगे और बेवाई फटे पैरो वाला किसान दिल्ली वालो को रास नहीं आया।मुझे याद है नब्बे के दशक में जब महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली के बोट  क्लब पर डेरा डाला था तो पूरा गाँव बस गया था ।कवरेज के लिए हम दिन भर किसानो के अस्थाई गाँव में रहते जहां मवेशी भी थे और चुल्हा भी जलता था।तब भी दिल्ली वालो को किसानो का यह आन्दोलन रास नहीं आया और कहते -यह सब बोट क्लब गन्दा कर दे रहे है।      
रविवारीय जनसत्ता से 
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