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कोंकण के एक गांव में

सतीश जायसवाल 

एक तरह से अच्छा हुआ कि आज यहां ' दापोली बंद 'रहा.और आने-जाने के लिए कोई साधन, सवारी उपलब्ध नहीं थी.क्या करते, दिन भर यहीं, कर्दे में समंदर के साथ रहे.जी भर समुद्र को जिया.आसपास पांव-पैदल भटके. सैलानी मन लेकर भटकते रहे.बिल्कुल बिंदास.सुबह का नाश्ता तो रिसोर्ट में ही किया.लेकिन.भोजन की तलाश में गांव में भटके.कोंकण का अपना बिल्कुल पारंपरिक भोजन मिल जाये तो कोंकण के किसी गांव में होने की अनुभूति उसके साथ जुड़ जाए.कुछ इसी ख्याल के साथ.
जब से यहां पर्यटकों का आना-जाना शुरू हुआ है, घरों के लिए घरेलू आमदनी का एक सिलसिला भी खुला है.कुछ घरों ने पर्यटकों को अपने घर पर भी ठहराना शुरू किया है.ऐसे पर्यटक वहां की स्थानीयता को गहरे से अनुभव करना चाहते हैं.ऐसे घर अपने यहां घरेलू भोजन भी कराते हैं.
शाम भी ऐसे ही बेपरवाह से गुजरती.लेकिन वह रसिका के नाम हो गयी.रसिका के घर चाय भी एक किस्से की ही तरह की बात हुई.वह अलग से.
रात का भोजन एक घर में पहले से तय था.कोंकण का अपना देसी-घरेलू भोजन.उनके यहां मोदक भी मिल गया और कल के लिए पूरण पोड़ी का भी इंतज़ाम हो गया.
इसके बाद तो कविता होनी ही थी. रिसॉर्ट के ठीक सामने समुद्र है.इतने सामने कि उसका हरहराना यहां तक सुनाई देता है. थोड़ा ठहर कर सुनें तो उसकी सांसें तक सुनाई में आ जाएं. यहां कविता हो रही थी और सामने समुद्र बोल रहा था.हम समुद्र को सुन रहे थे और समुद्र हमारी कविता के साथ था.
सिद्धेश्वर सिंह से एक विचार रखा था.समुद्र पर लिखी हुई कुछ सुन्दर कविताओं का पाठ समुद्र के पास जाकर किया जाए.कुछ कविताएं वह अपने साथ लाये थे.कुछ.हमने अपनी जोड़ ली.एक बहुत अच्छी और कुछ अलग सी बात भी हुई. अमृतसर की राजेश जोशी अमेरिका में रहती हैं.समुद्र को.संबोधित उनकी एक सुंदर कविता मुझे दिखी.मैंने आग्रह किया कि उसे वह अपनी आवाज़ में भेज दें.उन्होंने बात मानी.वह कविता भी पढ़ी गयी.उसी समय बारिश भी आई.समुद्र बारिश में नहाया.हम सब कविता में.
 
पश्चिमी घाट की सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला बहुत दूर तक अरब सागर का पश्चिमी किनारा पकड़कर चलती है.गोआ तक चली जाती है. रत्नागिरी जिले का दापोली इसी पश्चिमी पट्टी का एक गांव है. यहां समुद्र भी है.पहाड़ भी है.दापोली एक अकेला नहीं बल्कि इस पट्टी पर कई गांव 10-10, 15-15 किलोमीटर के दायरे में फैले हुए हैं.और एक ग्राम-समूह की रचना करते हैं.
हरणे भी इसी ग्राम-समूह के भीतर है.यही कोई 10-12 किलोमीटर पर. हरणे कभी एक अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह रहा.आज, मछली की एक बड़ी मण्डी.और मछुआरों का एक गांव है. तमिल उपन्यासकार तग्ज़ी शिवशंकर पिल्लै का एक मशहूर उपन्यास है "चेम्मीन." हिन्दी मंट अनुदित होकर आया है - मछुआरे. 
उसमें मछुआरों का जैसा गांव वर्णित है, वैसा ही कुछ यहां के लिए भी मुझे लगा था. उससे बहुत अलग भी नहीं मिला. कोई कहानी होगी, कोई प्रेम कहानी होगी तो उसकी टोह लेनी होगी.और यहां डेरा डालकर बैठना होगा. लेकिन हम तो एक दिन का थोड़ा सा समय अपने साथ लेकर आये हैं.इसमें बाहर से देखा जा सकता है.भीतर की घुस-पैठ मुमकिन नहीं.बाहर रंग-बिरंगी नौकाओं की एक पूरी बस्ती है.क्या इस गांव के मछुआरे इन्हीं नावों में घर बनाकर रहते होंगे ? मैंने किसी से पूछा नहीं.ना मुझे इसका जवाब चाहिए. मुझे तो अपने से उलझे रहने के लिए कुछ चाहिए था.वह मिल गया.समुद्र किनारे की जमीन पर अपने जाल सुधारते, फैलाते मछुआरे भी मिले.लेकिन उनके साथ भी कोई बातचीत नहीं हुई.ना किसी ने किसी का नाम पूछा.ना किसी ने बताया.
यहां समुद्र बहुत शोर करता हुआ मिला.पहाड़ से बार-बार टकराता और फिर लौटकर दूनी ताकत से टकराता.पता नहीं क्यों. फिर सब कुछ सफेद फेन-फेन होता हुआ. दूर तक फैलता हुआ.दृश्य रचता हुआ.
 
समुद्र के बीच शिवाजी का बनवाया हुआ किला खड़ा है-- अविचल. चट्टानों के बीच, पत्थरों का किला --स्वर्णदुर्ग.किले में कोई नहीं, कुछ नहीं.किसी बहुत पुराने खालीपन का रहवास इसके भीतर बना हुआ है.बाहर खुला हुआ दरवाज़ा है.जिससे होकर खुली हुई आव-जाही का रास्ता है.हम भी उसी से होकर भीतर गए.भीतर कोई देख-भाल नहीं.बाहर कोई सूचना, कोई ताकीद नहीं कि यह किला कब का है, किसने बनवाया और इसको नुकसान पहुंचाने वाले को क्या दण्ड दिया जाएगा ? समुद्री लहरें बाहर इसकी दीवारों को रात-दिन चोट पहुंचा रही है.और भीतर समुद्र का नमकीन पानी नुकसान पहुंचा रहा है.
 
यह किला दापोली से दिखता है.कल रात जब हम सब वहां समुद्र किनारे चहल-कदमी कर रहे थे तब सिद्धेश्वर सिंह को इसकी छाया दिख गयी थी.लेकिन मैंने प्रकाश स्तम्भ से होने वाली लाल रंग की रोशनी को देखा था.और उस तरफ किसी बंदरगाह का अनुमान किया था. बंदरगाह और किसी भी समुद्री रास्ते पर पड़ने वाला प्रकाश स्तम्भ, पता नहीं कैसे मेरी अनुभूतियों का हिस्सा हो गए ? तब से, जब मैंने कोई समुद्र देखा भी नहीं था.
किले के दरवाजे के भीतर वह प्रकाश स्तम्भ मिल गया, कल रात जिसकी रोशनी मुझे दापोली से दिखी थी. सिद्धेश्वर हम सबसे पहले वहां पहुंचकर किले के दरवाजे पर ऐसे खड़े मिले जैसे पुराने दिनों के समुद्री नाविकों ने अपनी खोजी हुई जमीन पर विजेता मुद्रा में अपने पैर धरे होंगे..
 
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