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दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे
अरुण कुमार त्रिपाठी
नई दिल्ली .पुण्य प्रसून वाजपेयी के एबीपी न्यूज चैनल छोड़ने की खबर तो पुरानी हो गई लेकिन उसका जख्म ताजा और गहरा है.वह हमारी पत्रकारिता को सालता रहेगा.बहुत से लोग उस जख्म पर यह कह कर पपड़ी बिठाने में लगे हैं कि उनके `मास्टर स्ट्रोक’ कार्यक्रम का टीआरपी नहीं आ रहा था.चैनल को विज्ञापन मिलने बंद हो गए थे.इस बीच करीब 50 करोड़ का घाटा लग गया था ऐसे में कोई मालिक कैसे किसी पत्रकार के सरकार विरोधी कार्यक्रम की ऐय्याशी को सह सकता है.इस पूंजीवाद तर्क के साथ सोशल मीडिया पर यह मार्क्सवादी तर्क भी बहुत चल रहा है कि कोई उस समय क्यों नहीं बोला जब हिंदुस्तान टाइम्स से चार सौ पत्रकार निकाले गए.यह भी कहा जा रहा है कि लाखों का पैकेज पाने वाले इन पत्रकारों की चिंता क्यों की जाए जबकि वे कारपोरेट के ब्रांड हैं.कोई कम तनख्वाह पाने वालों की चिंता क्यों नहीं करता.इन दोगली दलीलों के बीच उन मूल प्रश्नों को कुचला जा रहा है जो लोकतंत्र और इंसानियत के लिए बेहद जरूरी हैं.वह प्रश्न है आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी का.
यह बात बहादुर शाह जफर के 1857 के फऱमान में भी कही गयी थी कि खुदा ने इनसान को जितने नियामतें बरकत की हैं उनमें सबसे कीमती नियामत आजादी है.इसे पाकिस्तान के मार्क्सवादी शायर फैज अहमद फैज ने अलग ढंग से कहा था ---
मता-ए लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है 
कि खूने दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने
जबां पर मोहर लगी है तो क्या कि रख दी है
हर एक हल्का-ए- जंजीर में जुबां मैंने
इसी बात को दमदार तरीके से अपने ट्विटर संदेश में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने लिखा हैः---
मैंने तो पहले ही कहा था कि चैनल दर चैनल भटक लूंगा, लेकिन अपनी पत्रकारिता के मास्टर स्ट्रोक की सच्चाई की दस्तक देना नहीं छोड़ूंगा.सत्ता की तलवारें भी मेरी पत्रकारिता का सिर कलम नहीं कर सकतीं।
आजादी का यही जज्बा है जो देश के तमाम पत्रकारों को बेचैन किए हुए है.जिन्हें नहीं बेचैन किए है और वे अब भी आपातकाल की वर्षगांठ मनाते हैं, सेमिनार करते हैं, उस पर अपनी पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं और सरकार से पेंशन लेते हैं उन्हें शर्म आनी चाहिए.यह सवाल नहीं है कि जिन्होंने कभी आपातकाल में यातना सही थी वे आज किन स्थितियों में हैं और कितनी मलाई खा रहे हैं.सवाल यह है कि वे अभिव्यक्ति के सवालों पर कितने मुखर हैं या कितने मौन हैं.अगर मौन हैं या घुमा फिर कर दलील दे रहे हैं या कह रहे हैं कि पहले क्यों नहीं बोले, जब मैं निकाला गया तब क्यों नहीं बोले उनके लिए यही कहा जा सकता है कि वे नए दौर में आडवाणी जी की भाषा में रेंगने लगे हैं.
एबीपी न्यूज से सिर्फ मास्ट्रर स्ट्रोक कार्यक्रम के प्रस्तोता पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ही इस्तीफा नहीं दिया है.उनसे पहले वहां के मैनेजिंग एडिटर मिलिंड खांडेकर ने भी 14 साल की सेवा के बाद इस्तीफा दे दिया.हालांकि मिलिंद वाजपेयी की तरह वामपंथी झुकाव वाले पत्रकार नहीं हैं.उनकी निष्ठा दक्षिणपंथ और संघ के साथ ही है लेकिन हालात यह हैं कि वे भी नहीं सह पाए.अब वहां रजनीश आहूजा नाम के एक संघ करीबी पत्रकार को संपादक का जिम्मा दे दिया गया है.मिलिंद ने इसलिए इस्तीफा दे दिया क्योंकि उनसे प्रबंधन ने कहा था कि वे वाजपेयी के मास्टर स्ट्रोक कार्यक्रम को रोकें.प्रबंधन ने इसलिए कहा था कि क्योंकि सरकार उनके कार्यक्रम से नाराज थी.सरकार नाराज इसलिए थी क्योंकि उनके कार्यक्रमों में सरकारी योजनाओं की सख्त समीक्षा होती थी.उनके कार्यक्रमों में उस तरह का हिंदू मुस्लिम एजेंडा नहीं होता था जैसे कि एबीपी न्यूज समेत देश के तमाम राष्ट्रीय चैनलों में होता है.मास्टर स्ट्रोक के एक कार्यक्रम में मोदी के एक कार्यक्रम में महिला व्दारा की गई तारीफ को प्रायोजित सिध्द किया गया था.वाजपेयी ने सिध्द किया था कि उससे झूठा बयान दिलवाया गया.यह स्टोरी प्रधानमंत्री की योजनाओं से लाभान्वित होने वाले लोगों पर आधारित 20 जून को हुए एक कार्यक्रम के बारे में थी.उस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की चंद्रमणि नाम की एक महिला ने कहा था कि जबसे वह धान की खेती छोड़कर कस्टर्ड एपल की खेती करने लगी है तबसे उसकी आमदनी दोगुनी हो गई.मास्टर स्ट्रोक ने यह दिखाया कि महिला को ऐसा कहने के लिए सिखाया गया था.
सूत्रों के अनुसार इस पर केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने ऐतराज किया ऐतराज करने वालों में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन भी थीं.उनका कहना था कि कुछ मीडिया घराने प्रधानमंत्री की योजनाओं को बदनाम करने में लग गए हैं.जबकि वास्तव में वह महिला सीताफल के उत्पादन के बारे में बात कर रही थी और उसने सीताफल का टोकरा उठाया भी था.इस बिना पर उन मंत्रियों ने प्रबंधन पर कार्यक्रम बंद करने का दबाव डाला और जब कार्यक्रम बंद नहीं हुआ तो उसके प्रसारण में तकनीकी दिक्कतें आने लगीं.कार्यक्रम चलते चलते ठहर जाता था.तस्वीरें धुंधली आने लगती थीं.आवाज बंद हो जाती थी.देखने वाले का मजा बिगड़ जाता था और वह रिमोट दबा कर दूसरे चैनल पर चला जाता था.
पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ ही अभिसार शर्मा को भी आफ एअर कर दिया गया क्योंकि उन्होंने रिलायंस पर गैस चोरी के आरोप और उसके मुकदमे के फैसले के बारे में फेसबुक पर कुछ लिख दिया था.इस तरह के दबावों के चलते एबीपी न्यूज से रत्ना शुक्ला और राजेंद्र चौधरी पहले ही छोड़ चुके हैं और वाजपेयी के साथ आई टीम और मिलिंद खांडेकर के दर्जनों साथियों के छोड़ने की चर्चाएं हैं.
इस घटना पर कांग्रेस पार्टी की तरफ से कहा गया है कि मोदी के राज में सब कुछ हो सकता है लेकिन आजादी नहीं रह सकती.दीपक शर्मा जैसे पत्रकारों ने अपनी पोस्ट पर लिखा है कि सुधीर चौधरी प्रधानमंत्री के ड्राइंग रूम में और पुण्य प्रसून वाजपेयी बाहर.
अस्सी और नब्बे के दशक की इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू और स्टेट्समैन की पत्रकारिता ने कभी बोफर्स तोप सौदे में दलाली, कभी एचडी डब्लू पनडुब्बियों में दलाली के बहाने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को घेर रखा था.लेकिन उनके संपादकों का हटवाने का कोई कार्यक्रम राजीव गांधी ने नहीं चलवाया.भले ही कांग्रेसी कुछ टुच्ची किस्म की हड़ताल करवाने और झूठी खबरें प्लांट करवाने की कोशिश करते थे.तब दहिया ट्रस्ट और सेंट किट्स की खबरें चलवाई गई थीं जो विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुध्द थीं. इंडियन एक्सप्रेस तो जिनेवा स्थित पत्रकार चित्रा सुब्रहमण्यम के माध्यम से धारावाहिक चला रहा था.कभी बोफर्स कंपनी के मालिक मार्टिन अर्दबो की डायरी तो कभी गुरुमूर्ति का लेख तो कभी मानिक डाबर और राम जेठमलानी की टिप्पणी.रामजेठमलानी प्रधानमंत्री से रोज दस सवाल पूछते थे.राजेंद्र धोड़पकर रीडिफ्यूजन कंपनी के विज्ञापनों का मजाक उड़ाते हुए कार्टून बनाते थे.वह इंडियन एक्सप्रेस में पेज एक पर छपता था.सोचिए तत्कालीन मालिक रामनाथ गोयनका पर उस समय कितना दबाव रहा होगा.एक्सप्रेस के सरकारी विज्ञापन बंद हो गए थे.लेकिन लालाजी अपनी बिल्डिंग के किराए से अखबार चला रहे थे.यानी रीयल एस्टेट के माध्यम से फोर्थ एस्टेट की आजादी बचा रहे थे.उसी दौरान एक्सप्रेस में बोनस के मुद्दे पर जबरदस्त हड़ताल हुई और उसमें काम करने जा रहे लोगों पर तेजाब और धारदार हथियारों से हमला किया गया.लेकिन पत्रकार तब भी नहीं दबे.तब इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक दिया----दम है कितना दमन में तेरे देख लिया और देखेंगे.हालांकि उस हड़ताल के बारे में भी ट्रेड यूनियन और वामपंथी आंदोलन की तरह तरह की व्याख्याएं थीं.लेकिन इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि अभिव्यक्ति की आजादी और सत्ता से टकराने के साहस के मामले में वह पत्रकारिता श्रेष्ठ थी.क्या आज किसी मालिक और पत्रकार में इतना साहस नहीं है कि वैसा माडल खड़ा कर सके?
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